पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३१५

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पवाशए। विकारत्व-विकिर २६६ · है। दोपकी समाप्ति, खरायो । ६ दोप, चुराई ।। अत इत्यं । ताप्नो, जलयड़ो, इससे काल मान का शान ७'मनकी वृत्ति या प्रकृति । ८ उपद्य, हानि। होता है, इसीमे इसको विकालिका कहते हैं। विकारत्व (सं० लो०) विकारस्य मावः त्व। विकारका विकाश ( स० पु०) वि.काश-दोप्तो घम् । १ प्रकाश । भाव या धर्म । । २प्रसार, फैलाव । ३ माकाश । ४ विषमगति । ५ विकारमय (सं० वि०) विकारस्वरूपे मयट् । विकार- | प्रस्फुटन, खिलाना। ६ एक काथ्यालङ्कार, इसमें किसी । स्वरूप। वास्तुका बिना निजका आधार छोड़े अत्यन्त विकसित विकारयत् ( स० वि०) विकार अस्त्यर्थे मतुप मस्य प। होना वर्णन किया जाता है। किसी वस्तुको वृद्धि के विकारयुक्त, विकृत । लिये उसके रूप आदिमें उत्तरोत्तर परिवर्शन होना । विकारिता (सं० स्रो०) विकारिणो भावः तल-टाप् । (त्रि.) निर्जन, एकान्त । 'विकारित्व, विकारका भाव या धर्म । विकाशक ( स० वि०) धि काश्यति यि-काश ल्यु । विकारिन् (सं० वि०) वि-य-णिनि । विकारयुक, ! १ प्रकाशक । २ विकाशन । 'विकारविशिष्ट । विकाशन ( स० क्लो०) वि काश ल्युट । प्रकाश, प्रस्फु. विकारो (स नि०) १ विकारयुक्त, जिसमें विकार हो। टन, खिलना । २. क्रोधादि मनोविकारोंसे युक्त, दुध वासनावाला। विकाशिन् (स० वि०) विकाशोऽस्यास्तीति विकाश- (पु.)३ साठ सवत्सरोंमसे एक संवत्सरका नाम।। होन। विकाशशोल, खिलनेवाला । विकार्य ( स० वि० ) धि र पयत् । १ विकृतिप्राप्त व्य । विकापिन् ( स० वि० ) विकाप अस्यर्थ इनि। विकाश. २ व्याकरणोक्त कनकारकभेद । व्याकरणके मतसे कर्म-शोल, खिलनेवाला। कारक तीन प्रकारका होता है, निवा, विकार्य और विकास (सं० पु० ) वि-कस घम् । १ विकाश, खिलना। प्राप्य । विकार्य कर्मके फिर दो भेद , प्रकृतका उच्छे- २ प्रसार, फैलाय । ३ एक प्रसिद्ध पाश्चात्य सिद्धान्त । ...एक और प्रकृतिका गुणान्तराधायक । यधा-काष्ठ इसके आचार्य डानिन नामक प्रसिद्ध प्राणिविज्ञानयेसा भस्म करोति' काष्ठ भस्म करता है, यहां पर प्रकृतका हैं। इस सिद्धान्तमें कहा है, कि आधुनिक समस्त सृष्टि (फाटेका) उच्छेद होने के कारण 'प्रकृतिका उच्छेदक' | और उसमें पाये जानेयाले जीव जन्तु तथा वृक्ष मादि विकार्य कर्म हुमा। 'सुवर्ण' कुण्डल' करोति' सोनेका एक हो मूलतत्वसे उत्तरोत्तर निकलते हैं। ४ किसी कुंएडल बनाता है। यहां पर प्रकृति (सुवर्ण) रूपान्तरित पदार्थाका उत्पन्न हो कर मन्त या भारम्मसे भिन्न भिन्न हो जाने के कारण 'प्रकृतिका गुणान्तकाध्यायक' विकार्य रूप धारण करते हुए उत्तरोत्तर बढ़ना, क्रमशः उन्नत 'कर्मा ! " ' : होना। यिकाल ( स० पु०) वियदः कार्यानह काला दैव-विकास (दि० सी०) सराव जमीनमें होनेवाली एक प्रकार. पैनादिकका विरुद्ध काल, ऐसा समय जब देवकार्म की घास। इसको पत्तियां दूधको भांति पर कुछ बड़ी या पितृकार्य करनेका समय बीत गयां हो, सार्यकालका | होती हैं। चौपाप इसे बड़े चायसे पाते हैं। समय। इस कालमे देव और पैतृ कर्म निषिद्ध बताया विकासन (स० क्लॉ०) वि.कसल्युट । प्रकाशन, मस्फुटन, • गया है, इसीस इसको पिकाल करते हैं। पर्याय- खिलना। , साय, दिनान्त, सायाह, सायम्, उत्सव, विकालक। विकासना (हिं० कि० ) १ विकसित होना, खिलना । '२ सिफाल, दे। २कट होना, जाहिर होना। यिकालक ( स० पु० ) पिकाल पय साथै कन् । विकाल, विकासिता ( स० स्रो०) विकासिनो भाया तल साए । सायकालं यिकासीका भाव या धर्म, यिकाशन । विकालिका (सं० प्रा० ) विशातः कालो पपा, कन टापि ! विकिर ( स०,०) विकिरति मृत्तिकानि भोजनामिति Vol, xxI, B8