पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३३२

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२८२ विक्रमादित्य . गुलराजवंश देखो। दानका काम पैसे दी जारी रमा। इसके बाद मनोहित मारतको जोत कर विक्रमादित्यको उपाधि प्रहण को . नामके एक वौद्धाचार्यने सपने दमामको एक लाख स्वर्ण शकारि विफमादित्य की तरह उन्होंने भी सन १६ में मुद्रा दान की है। इस धानके विपप यिफमादित्यको एक नया संवत्सर चलाया था। फलतः यही ऐतिदा . मालूम हुमा, कि इयांयश हो दौद्धाचार्यने ऐसा सिकोंकी दरिमें गुप्तकाल या गुप्तसंवत् कहा जाता है। किया है, इस पर उन्होंने नाना तरहके छलका माधय गुप्तवंशफे इतिहासमें वह नाम चाद्रगुप्त विक्रमादित्यक लेकर उसको बहुत तरहसे तड़किया। उससे मनो.) नामसे प्रसिद्ध है। नेपालको गामसे प्रसिद्ध हैं । नेपालको लिच्छवी रामकुमारी हित मनमें बड़ी चोट लगी और इसके लिये ही उनकी कुमारपेयीफे साथ उनका विवाह हुमा था। सम्भपता मायनस घटना के कुछ दो दिन बाद विक्रमादित्य नेपालियों की सहायतासे ये उत्तर भारत के अधोबरपुर ने अपना राज्य सो दिया। इसके बाद जो राजा हुमा, थे। मालूम होता है, कि इसी कारणसे उनके चलाये । उसको समा मनोहित के शिष्य यसुर्वन्धु विशेषरूपसंसिपके पर उनके नामफे साप कुमारी 'कुमारदेवो तया... सम्मानित हुए थे। "लिन्यया" का नाम दिखाई देता है। अध्यापक मोक्षम्लरने उक विक्रमादित्यको उजपिनो- पति शिलादित्य प्रतापशीलके पूर्वपत्ती विक्रमादित्यका उक्त 'कुमारदेवा' के गर्भस चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के ना स्वीकार किया है। फार्गुसन और मोसमूलरफे मत- औरससे समुद्रगुप्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुभा। उन्होंने से सन् ५३० ६०में उक्त विक्रमादित्यका राज्यांयसान अपने वाहुवलसे पितृराज्य के बाहर सारे भायर्यापर्रा भार . हुमा था । किन्तु यह मत हम समीचीन नहीं सम- दाक्षिणात्यफे अधिकांश पर अधिकार कर रिया था। झते। चीन-पौद्धशास्त्र मतसे सासे ८५० वर्ष पहले / उनके दो प्रबल प्रतापसे शक प्रभाव बहुत कम हो गया । युद्धका निर्यात हुमा। सुतरां चीनपरिमार्जकके इस मतसे था। उनकी : शिलालिपिसे मालूम होता है, कि '. धायस्तीराज विक्रमादित्यको इंसाको दूसरो और तिसरो | मालवगण.भो उनके समयमें प्रवल थे, किन्तु गुप्तसम्राट शताब्दीका मनुष्य कहा जा सकता है । ५यों शताब्दीमे को अधीनता स्योकार करने पर वाध्य हुए थे। शा. पारियाज फाहियान भारत-परिदर्शनके लिपे माया धिकारकालमें मालयके मधिषासो शिर उठानेका सु . पास समय उसने श्रावस्तीका ध्यसायशेष देखा। गवसर पा न सके । इसी कारण उनकी जातीय महालि था। इससे भी प्रमाणित होता है, किश्रावस्तीको समृद्धि कोई शिलालिवि नहीं पाई जाती । गुप्ताधिकार फे समय, अर्थात् इस्सोको यो शताग्दोफे पूर्य हो बिर्फ विस्तारफे साथ मालयमें बहुतेरे पराकान्त सामराजे मादित्य वर्तमान थे। ऐसे स्पलमें ईसोफे ६ठों दिखाई देते थे, घे गुप्तसम्राटको अधीनता स्वीकार करने शताग्दीके उज्जयिनीपति दर्पविक्रमादित्यको श्रावस्ती. पर मो शौर्यवीर्यमें बहुत होम न थे। उनको ओशिला. पति विक्रमादित्यफे साथ भमित करना नहीं को शालिपियां पाई गई हैं, उनमें उनके जातीय मम्युइपका सातो । घोनपरिमाजफ दियोनसियांगने यो शताछो- निदर्शन 'मालयसंपत्' का प्रयोग किया गया है । में मालयमें माकर शिलादित्यका विवरण संद किया तक मालवाटपापक मितनो शिलालिपियां मावित था । पद मालवाति और धायस्सोको दूसरा समे हुई है, उनमें विजयगढ़को स्तम्मलिपि ही बहुत प्राचीन भाते थे। १० सम्मयतः इसके कुछ समय पहले ही माल वासियोंकि फिर जातोप जोयनका मभ्युपप हुमा था। गुप्तपंशीय प्रथम चन्द्रगुप्तने शहाको हरा मौर उत्तर ! . सघाट समुद्रगुप्तके मौरस मोर सादेको गर्भसे Mixtulter's India what enn it teachus: p. 289.. Real's Si-Pu-Ki,Tol, ip,2GI. . ___ • Dr. Fleet's Gupta Inscriptions, p.253. प्रमादित्य