पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३३५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विक्रमादित्य २८५ .. इन विक्रमादित्यके पितामह तैलपने मालवके राजा . देने लगे। प्रन्धकार विद्यापति विहणने इस विपरणको मुझका पराजित और निहत किया। उस समय भोज- विस्तृतरूपसे वर्णन किया है। जो हो, अच्छे शुभक्षण राज बालक थे। मोजचरितमें लिखा है, कि भोजने जवान मौर शुम-लग्नमें वे पैदा हुए । इस पुत्रका असाधारणरूप होकर राजशासन मारम्भ किया। एक दिन अभिनयमें | लायण्य और देहज्योति देख नृपतिने उसका नाम विक- मुझेको अन्तिम दशाका चित्र देख उसके मनमें प्रप्तिशोध ! मादित्य रखा । इनके और भी बहुसेरे नाम पाये जाते हैं- लेनेको इच्छा बलवती हुई। फलतः भोजने बहुतेरे सामान्तों) जैसे विक्रमणक, विक्रमणकदेव, विक्रमलाञ्छन, विममा के साहाय्यसे चालुषयपतिको भी मुजेको हो दशा कर दित्यदेव, विक्रमार्क, त्रिभुवनमल्ल, कलिविक्रम थौर पर- .दो। अाफ्टर भाण्डारकरके मतसे उससे पहले ही तैलप- माडिराय । इसके बाद बैलोक्यमलको तृतीय पुत्र उत्पन्न को. मृत्यु हुई थी। सुतरां उक्त प्रथम विक्रमादित्यने । हुआ! उसका नाम जयसिंह हुआ। ...मोजके हायसे मानवलीला संघरण की है। विक्रमादित्यके सौन्दर्याको देख कर सका विस . . .. १५ विक्रमादित्य । आकृष्ट होता था। उनका यह रूपलामण्यमय शैशव ..चालुपयवंशमें और भी एक. प्रवल पराक्रान्त राजा | देहमें गसाधारण विक्रमके विह दिखाई देते थे। शैशव- हो गये हैं। ये पूर्वोक विक्रमादित्यके भ्राता जयसिंहके कीड़ामें ही उसके भारी वीरत्वका परिचय पाया आने .पीत सामेश्वर आदवमलके पुत्र थे । कवि विद्यापति | लगा। राजहंसोंके पोछे पीछे दौड़ते हुए उनको पकड़ने विहणरचित विक्रमाचरितान्धमें इस नृपतिको जीवनी में प्रवृत्त होने थे। फे सम्यन्धमें इस तरह लिखा है- पिञ्जरायद्ध सिंहशायफे साथ खेल करते थे। वाल्य उनके पिताका नाम माइयमल्ल था, वे लोफ्यमल्ल मी! कालमें हो उन्होंने धनुर्विद्या भादिकी शिक्षा ग्रहण की। इसका दूसरा नाम है। ये बड़े घोर पुरुष थे और इन्होंने सरस्वतीकी कृपासे काथ्यादि शास्त्रों में भी उनको यथेष्ठ बहुत देशों पर अधिकार किया था। किन्तु इतने धैभव | हान था। 'गौरवका अधिपति होने पर भी और अपत्याभायमें इन ____इस तरह उन्दोंने धनुर्वेद गादि विविध विधानिशा. का वित्त विषण्ण था 1 चे राजपाट परित्याग इस- में विक्रमादित्यका बारकाल बीता। यौवनमें पदार्पण का मार मन्तियों पर सौंप. पुनमाप्तिके लिये पतोक करते ही उनको समरको प्रवृत्ति प्रमशः बलवती हो साथ शिषको भाराधनामें प्रवृत्त हुए और दोनों ने कठिन., उठो। नृपति लाक्पमल्लने पुत्रको युवराजपद पर साधना की। एक दिन प्रातःकाल राजा लोफ्यमलने / अभिषिक्त करनेको इच्छा प्रकट की। किन्तु विद्यायिनय. प्रगातपूजाफे समय यह देववाणी सुनो, कि "तुम्हारे" सम्पन्न विक्रमादित्यके जेठा माई सोमेश्वर के रहते उन कठिन तपश्चर्यासे शिवजी प्रसन्न हुप हैं। महादेवके पद पर विकाका अधिपति होना नितान्त असत था। परसे तुम्हें सोन पुत्र होंगे। इनमें मध्यम पुत्र हो शौर्याः । .ऐसा ही उन्होंने प्रचार भी किया। उन्होंने स्पष्ट हो कदा, कि यो प्रभाव भीर गौरवमें मतुल्य और अद्वितीय होगा। इस पद पर मेग अधिकार नहीं। उसके एकमात्र अधिकारी पार्वतोपति शङ्खरका माशीर्वाद विफल नहीं हो सकता। मेरे जेठे माई ही हैं। उनके पिताने कहा, "भूतगायन यथासमय उनको पहला पुल उत्पन हुमा। इस लड़के नानीपतिके विधानानुसार भोर जन्मनक्षत्रादिक प्रभाव. का नाम सोमेश्वर रखा गया, इसका दूसरा नाम गा से यौवराज्यपदका तुम्हारा हो अधिकार स्थिर है। किन्तु भुवनेगल्लइसके बाद रानीको फिर गर्म हुमा । इस | विक्रमादित्य रस असङ्गन और मसमोचीन प्रस्ताव पर • बार उनको गर्भावस्था में बड़े आश्चर्याजनक स्वम दिवाई सहमत नहीं हुए। राजाने पाइले सोमेश्वरको ही युर- राज पद पर अधिष्ठित किया। किन्तु उनका चित्त • R.C. Bhandarkar's Early History of the } विक्रमादित्य प्रति भासक था। पपि विक्रमादित्य .Dekkan, p.82, . . . . . युवराज पद पर अमिपिक न हुए, तथापि ये राज का Vol, xxI, 12