पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/३६८

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१२ 'विजयनगरम् मायाका ददल गया। किन्तु १८वीं शताब्दी में पारं-! नगरका कुछ मशज म्पनीने मारी । दार परियर्शन होने के कारण पशुपतिराजनके ऐति हापिलो जमीन" नामसे निर्दिए किया। ... दामिक प्रधान्य परियति हुगा। इमरान इस सम विजयनगरमको समन्दारीका मा माधम राज्य और उसके अधीग मामग्नोंका सित बहुत कम हो गया। 'प्रेजोंने उम पर पेशास दाना भूमाग एकल परांमान विजयागगरम जिलेके बराबर है। कर दिया। राजाको ६ लाख रुपया सालाना पेजम म यिम्तीर्ण भूमाग. शासक राजा भी अधीन रद देना कएसे स्वीकार करना पड़ा था और इसी में राज्यको नर्स से सत्ययान् धे। उनको कुछ णजालमें फसना पड़ा। सन् १८०२०में म राजपंगफे सर्वप्रधान ध्यान मीना गोर माग्य यहाँ चिस्यायो बन्दोवस्त हुमा । उससे यह धागा, सुलतान नामसे सम्मानित होते थे। ये यथार्यमें विज्ञगा. कि उस समय यह जमोदारी २४ परगने गार १५: पर गज अधीन थे। किन्तु बलदर्पसे पुष्ट हो कर प्रामों में विभक थी। उस समय इस तालुकास्य५ . ये उस विषयमें विशेष लक्ष्य नदी रणते थे। जय विजय- 'लाप्न नियत थो! .... . .. " नगरराज अपने प्रमु विगायत्तनपति के साथ साक्षात् | ___रामा विज्ञपरामके पुत्र नारायण बापूने सन् १७१४ . करने माते तय महामान्य ईटइण्डिया कम्पनो उनके ई०में राज्याधिकार किया और सन १८४५० कामो- सम्मानके लिये १६ सम्मानसून तोपोंकों सलामी | धाममें परलोक-याला को। उस समय उनको सम्पत्ति शागतो धो। १८४८०ने यह सोग मण्या घट कर १३ / विशेषरूपसे ऋणमस्तं थी । उसके राज्य काल प्रा . हो गई। यशफे मम्मामस्वरूप ये मोज भो राजदत उपाधि समयसे मप्रेज गयर्नमेएटना उममें मुग परिशोध करने के - मोग करते माने। ' . लिपे स्वहस्तमें शासनमार प्रहण किया। वन परयत्ती । पर्न माग समय यह जमीन्दारी निरम्यायो बन्दोयम्त उत्तराधिकारी रामा विजयराम गतिरामने पूर्णहा . ' के अधिकारमुक्त होनेसे उसके राशत्यस कुछ गरि- प्राणफे परिशोधनके लिये.७ वर्ष राक ऐसी समस्या 'यसन हुगा है सहो, किन्तु यधाम इस राज्यघंशको | जारी रयो । मन्तमें सन् १८५२ ६० मिष्ठर होमियरसे। पंगत मर्यादाका विशेष लाघय नही हुआ है। मन उन्होंने राज्यमार प्रण किया और ये स्वयं कार्य परि.. १८६२९०में प्रेज गयर्नमेण्टने उनका मत्य मोकार चालन करने लगे। इस समपसे इस यिसपनगरम् राय' कर फिर रामोपाधि शन को और साधारण मेमो' को धोद्धि हुई है और राजस्स भी प्राय: २० साम या 'दारको अपेक्षा उप-सम्मानका अधिकार दिया है। पसूल होने लगा है। . . . . . . 'मृत रामा पिपरामरा मावालिंग पुत्र नारा- ; राजा बिजयराम गजपतिराज पर उथ शिक्षित, - यणयाचूने पनामफे युद्धपे बाद पराज्यसे भाग पायंत्य सदाशय गौर भरताकरण गच्छे पक्ति ।में शिम . जमीदारीका आध्य प्रहण किया। ' उiकोले सामन्तोंने कामे राजमार्ग परिचालन और प्रशामोकामासम करते मजाक विगद विद्रोहयहि प्रभ्यलित करनेकी चेष्टा थे, उम तरहसे मारतो भन्याग्य स्थानों के देगी राजामों में की। अप्रेगोंने पहले दो याममाचार पाकर या कारभोग समकक्षी न हो सके। यह यथार्थ दो उस समय उसका प्रतिकार किया था। इसके बाद मो . उश पदके उपयुका पात्र थे। मन् ८६३ में पड़े लाट के माप राजानी भोरम मग्धिको बात चलने लगी। को व्यवस्थापकममा (licgislatire Council of India) 'राजाने पर फिदाय भारमसमर्पण पिया। उम: पं.सास्य मनोनित हुए । 'मन् १८६४ ने । समय ने उसके सस्य गीर म्याधिकारको गमपण, 'उमफे मागरणों पर प्रसन्न होकर जमको महारानी परमा एक समदयो गो। स समयले पार्थस्य शघि मोर 'हिज हारनेम (uis flighness)का-सम्मान सरदार फिर रामा गघाम म रहे । मंजमरकारने प्रदान किया । "मके बारx.c.s:Iको पाधि उनका शासनमार महापा रखा इस मयिम से विभूपिम रिप गये । सन् १८-6 महारानी .