पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४३१

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विधा- 'मादित्यादि नवग्रह धौर इन्द्रादि दशदिक्पालोंकी पूजा । होगा ! गुरु अवहित चित्तसे शिष्यको पाठ दें। शिष्यके करके विष्णु मा ध्यान, पीछे विशेषार्थ और मनसादेवीकी | अध्ययन आरम्भ करने पर गुरु उसे 'अध्ययन करो' ऐसा पूजा कर ध्यानको अन्तमें तीन बार विष्णुको पूजा करनी ! कह कर पढ़ाना शुरू कर दें तथा दूसरे दिनके लिये होगी। अनन्तर विष्णुको प्रणाम करके लक्ष्मोका ध्यान पाठ यहाँ तक रहा, कह कर पढ़ाना समाप्त कर दें। और पूजन करे । पीछे सरस्वतीका ध्यान करके पूजा ब्राह्मण वेदाध्ययनके आरम्म तथा समाप्ति में प्रणवका करनी होती है। एतत्राद्य ओं सरसत्यै नमः' इस | उच्चारण करें, क्योंकि भारम्मकालमें प्रणयका उच्चारण प्रकार पूजा करनेके वाद-, नहीं करनेसे अध्ययन धीरे धीरे नष्ट हो जाता है । अध्य- "भों भद्रकाल्यै नमो नित्यं सरस्वत्यै नमो नमः। यनकी समाप्ति प्रणवोच्चारण नहीं करनेसे पाठ याद वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च ॥" नहीं रहता। पवित्र कुशके भासन पर बैठ कर तथा दोनों इस मम्तसे तोन वार पूजा करे । इसके बाद शपत्या. हाघोंसे कुश पकड़ कर तीन बार प्राणायाम करने के बाद नुसार रुद्र, स्यविद्या और नवग्रहको पूजा करनी होती प्रणवोच्चारणके योग्य होता है। है। अगन्तर वालक गासन पर बैठ और चन्दनादि लेप ___जो ब्राह्मण उपनपन दे कर शिष्यको यक्षविद्या कर पुष्पाञ्जलि द्वारा उन देवताओं की पूजा करे। । और उपनिषदफे साथ समप्र घेदशास्त्रका अध्ययन , पूजाके याद पालक पश्चिमकी ओर मुंह करके बैठे।। कराते है, उन्हे भाचार्ग और जो जीविकाफे लिये घेदका गुरु पूर्वमुम्ब बैठेऔर 'ओं तत्मत्' उचारण कर शिला-! एकदेशमान अथवा वेदाङ्गका अध्ययन कराते हैं, उन्हें नएड या तालात भादि पर बालकका हाथ पकड़ खड़ीसे उपाध्याय कहते हैं। जन्मदाता और वेददाता दोनों ही आकारसे ले कर क्षकार पर्यन्त सभी अक्षरोंको लिखा। पिता हैं, किन्तु जन्मदाताको अपेक्षा घेददाता पिता हो तथा तीन यार उन गारों को पढ़ावें। इस प्रकार | श्रेष्ठ हैं। क्योंकि, द्विजोंका द्वितीय वा ब्रह्मजन्म ही सर्वात लिखना पढ़ना हो जाने पर बालक गुरुको प्रणाम करे। । शाश्वत है। वेदपारग आचार्य सावित्री द्वारा ययाविधि इसके बाद गुरु दक्षिणान्त करके दक्षिणा प्रहण और जो जन्म प्रदाग करते हैं, घही जन्म सत्य है । उस जन्मके याद शच्छिद्रावधारण तथा चैगुण्यसमाधान करें। पाद और जरामरण नहीं है। चाहे थोड़ा हो या बहुत, विद्यारम्भके दिन वालकको निरामिप भोजन करना जो वेदशान दे कर उपकार करने हैं उस उपकारफे कारण चाहिये । (कृत्यतत्व) शास्त्रानुसार उन्हें गुरु जानना होगा। वह गुरु सांपेक्षा मन्यादिशास्त्र में लिखा है, कि ब्राह्मणादि तीनों वर्ण, माननीय है। शिष्यको अन्तःकरणसे सुधपाधि द्वारा उपनयन संस्कार के बाद गुरुगृहमें जा कर जीवनमा चतुर्थ. उन्हें परितृप्त करना चाहिये। उपनोत द्विज गुरुकुलमें भाग विद्याशिलामें बिता । गुरु शिष्यको उपनयन दे कर रहते समय चेदप्राप्ति की योग्य तपस्या करेंगे। भग्नोन्ध. पहले उसको आयोपान्त शौच शिक्षा देवे तथा आचार- नादि नाना प्रकारको तपस्था द्वारा तथा विधियोधित आग्निपरिचर्या और सन्ध्योपासना भी सिखा ! अध्य. विविध प्रकारके सावित्रादि प्रतानुष्ठान द्वारा उपनि- यनकालमें शिष्य शास्त्रानुमार आचमन करके इन्द्रियः। पके साथ समस्त वेदाध्ययन करना द्विजातियोंका संयमपूर्वक उत्तराभिमुम्नमें ब्रह्माजलि करके पवित्र धेशमे कर्त्तव्य है। धैठे। (अध्ययन काल में मृताञ्जलिपुटसे • गुरुके समोप शिष्य जव गुरुगृही रह कर वेदविद्या सीखे, तद उसे उनका नाम ब्रह्माक्षलि है। ) चेदाध्ययनफे आरम्भ मौर, कुल नियमोंका पालन करना होगा। विद्याधी ब्रह्मचारी अवसान कालमें शिष्यको प्रतिदिन गुरुके दोनों चरणोंकी | गुरुगृहमें इन्द्रिय संयम करके आत्मगत अदृष्ट वृद्धिफे चन्दना करनी चाहिये। उत्तान दक्षिणहस्त ऊपर और | लिपे निम्नोत नियमोंका प्रतिपालन करें। वे प्रति दिन उत्तान पामहस्न नीचे करके दक्षिण हस्त द्वारा गुरुका | स्नान करके शुद्धमावस देव, ऋपि योर पितृतर्पण, देव. दक्षिणपाद तथा यामहस्त द्वारा वामपद स्पर्श करना[, पूजा तथा सायं और प्रातःसमाधि द्वारा योम करें।