पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४६२

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विद्यापति विहण-विद्याभट्ट . पे चैतन्यदेयके पूर्ववत्तौ चण्डिदासके समसामयिक पश्चिमको ओर यात्रा कर दी। इसी समय हाइलपति थे। चैतन्यदेवके सम्प्रदायमें इनको पदावलियों का कर्ण के साथ इनका परिचय हुआ। महावीर कर्णने इनका बहा दादर है। चैतन्यदेव भी इन पदावलियो का बड़ा | बहुत सत्कार किया । कर्णकी सभा कविने बहुत दिन : मादर करते थे। जो हो, विद्यापति विहार प्रदेशके कवि | विताया था। यहां इन्हो'ने कविगङ्गाधरको परास्त किया और गौरव हैं। और रामचरितापपायक नामक एक काव्य की रचना की। ... २एक दुयंक ग्रन्थकार, वंशीधरके पुत्र । इन्हों ने | बोचमें ये सीतापतिको राजधानी पोध्या जा कर कुछ । १६८२ ई०में चैद्यक रहस्यपद्धतिको रचना को । इनका दिन ठहरे थे। . . . बनाया हुआ चिकित्साञ्जन नामक और एक नथ मिलता कल्याणपति सोमेश्याने कर्णको परास्त या विनाश किया था। पीछे कर्णको सभाका परित्याग कर कवि विद्यापति बिहण-कल्याणके चालुफ्पराज विक्रमा | पश्चिम भारतकी ओर चल दिये। धारा और महिल. दित्यका सभाकं एक महाकवि । विक्रमादेवरित. वाडका राजसमाका समृद्धि तथा सोमनाथ माहात्म्य काव्य और चौरपश्चाशिकाका रचना फर पे प्रासद्ध हो ने हा कायको पश्चिमकी ओर आकृष्ट किया था। जो गये हैं। हो, दुर्भाग्यवंशतः धारा नगराका दर्शन तथा घारापति विकमालचरितके १८३ सर्गमें कयिने अपना जैसा पण्डितानुरागा भोजराज के साथ इनका साक्षात् लाम परिचय दिया है, उससे जाना जाता है, कि काश्मीरको न हुआ। पेमालयके उत्तरसे होते हुए गुजरात चले प्राचीन राजधाना प्रबरपुरसे डेढ़ कोस दूर खाममुम्न गये। अणहिलवाइको राजसभामें शायद इनको आदर. नामक स्थान है। यहां कुश गान मध्देशो प्रहण नहीं मिला, मालूम हाता है, इसी कारण कधिने गुजरा .. घंशमें कविने जन्मग्रहण किया । गोपादित्य नामक एक तियाकी अभद्रताको समालोचना का 1. सामनाधका राजा यक्ष कार्य करानके लिये मध्यदेश से इनके पूर्वपुरुषको । दर्शन कर आप दक्षिण भारतकी ओर अग्रसर हुप तथा काश्नीर लाये । इनके प्रपितामह मुक्तिकलश और रिता. रामेश्वर तक स्थानों का भाग्ने परिदर्शन किया। मह राजकलश .दोनों ही अग्निहोत्रा और घेदपाठमें रामेश्या दर्शनके बाद ये उत्तरको ओर आ कर . . विशेष पारदों थे। इनके पिता ज्यटकलश भो एक चालुक्य राजधानी कल्याण नगर में पहुंचे। यहां राजा - . चैयाकरण थे। उन्होंने महाभाष्यको रोका प्रणयन की। विक्रमादित्यने इन्हें विद्यापति” था. पण्डित राजपद दे . इनकी माताका नाम नागदेवी था। छोटे भाई राम | कर सम्मानित किया। मालूम होता है, कधिने इस भीर आप दोनों हो फघि और पण्डित थे। विहाने कल्याण राजधानी में ही जीयनकी शेषरावस्था विताई थी। काश्मीरमे हो लिखना पढ़ना सीखा था। प्रधानता चारों विद्यापति विहगकी जीवनी पढ़नेसे ज्ञात होता है, येद, महाभाष्य पर्यन्त व्याकरण और मलङ्कारशास्त्र में | कि ११वों सदी के तृतीय चतुर्थाशमें इनका साहित्य- इनकी अच्छी व्युत्पत्ति थी। जोवन और देशभ्रमण समाप्त हुआ। विक्रमादित्य : लिखना पढ़ना समाप्त करके पे देशभ्रमण और | त्रिभुस्नमल १०७६ ई०से प्रायः ११२७ ई. तक कल्याण हिन्दू राजाओंकी सभामे अपनी कविता और विद्याका | में अधिष्ठित थे। इसो समय योग विद्यापतिका परिचय देने के अभिप्रायसे घरसे निकले। पहले पे जन्म-1 कल्याणपुरम मा कर रहना माना जायेगा। भूमिका परित्याग कर यमुनातटसे होते हुए पवित्र तीर्थ विद्यापतिस्वामी-एक प्राचीन स्मार्श। स्मृत्यर्धसागरमें मथुरामे पहुँचे। इसके बाद इन्होंने गङ्गाको पार कर इनका मत उद्धत हुआ है। . ... कमोजमें पदार्पण किया। कनोज में कई दिनोंको पथपर्य विद्यापुर ( सं० क्लो. ) नगरभेद। (भारतीय ज्योतिःशास्त्र) टन केश दूर कर पे पहले प्रयाग और पं.छे वनारस आये | विद्याभट्ट-एक पण्डित । इन्होंने विद्याभट्टद्धति नामक ... थे। बनारससे फिर पूर्वदिशाको न जा कर इन्होंने ' * चेद वा बुन्दलखएहका नाम दाहल है। .. ...