पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४७५

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. विद्यत् । से तटतटखना विद्युत् प्राणियों को एकाएक भय देते। प्रकारको है। पृहत्संहितामें विद्युल्लता, विद्युहामन् हुए जीव मोर इन्धनके ढेर पर गिरती है। मादिशब्दों का प्रयोग देखनेसे मालूम होता है, कि वह - यह उलका अन्तरीक्षमा ज्योति पदार्थ मानी जाती| सब शब्द विभिन्न प्रकारकी विद्युत्में ही आरोपित है। ज्योतिशास्त्र में धिषपंप, उल्का, अशनि, विद्युत् गौर हुए हैं। उन्हें आधुनिक वैज्ञानिकको Sintous, तारा ये पांच प्रकारके भेद लिखे हैं। इनसे उनका भनेकramilied, meandering मादि अनेक प्रकारको विद्युत् भेद देखे जाते हैं। अनि नामक वन मनुष्य, गज, अश्व (lightening) समझने में काई भूल न होगा। विष्णुपुराण. मृग, पापाण, गृह तक और पश्यादि पर जोरसे शब्द में (१।१५) कपिला, गतिलोहिता, पोता और सिता नाम- रतामा निस्ताधिो पर गिरनेसे वह चपकेकी की चार प्रकारको विद्युत्का उल्लेख है। श्रीधरस्वामोने तरह घूम कर उस जगहको फाड़ देता है। विद्युत् हठात् लिखा है, कि तुफानफे समय कपिला, प्रखर ग्रीष्मकाल में ' तट-तट शब्द करके प्राणियों को भयभीत तो कर देती अतिलोहिता, वृष्टि के समय पोता और दुभक्षके दिन है, पर यह साधारणता जीव और इन्धनके ऊपर गिरतो सिता नामको विद्युत् दिखाई देती है। है तथा उसी समय उसको जला देती है। विदुयुनका माधु.नक वैधानिकों के मतसे मेघ ही विद्युतका आकार कुटिल और विशाल है। पकमान कारण है, किन्तु सभी अध्यापक इसे मानने को 'विद्युत् और मानि प्रायः एक दी है, किन्तु मरुति- तैयार नहीं। परन्तु उन्होंने परीक्षा करके देखा है, कि विशेषको पृपय ता निमरण करके उनके दो विभाग निर्देश समुद्र और स्थल भागको ऊपरयाली पायुकी तडित् । किये गये है। ज्योतिर्वितश्रेष्ठ उत्पलने अशनि शब्दका (Electricity) एक भावापन्न नहीं है, किन्तु जलके पापी. 'अर्थ "अश्मवणमुल्का मेदो पा" लगा कर सन्देहको दूर भूत होते हो उसमें तड़ित दिखाई देती है तथा मेघको कर दिया है। सतपय इन्हें पर्शमान Jeteorites या | जलकणामें यह विद्यमान रहती है। पापकणाके एकत acrolites समझने में कोई आपत्ति नही देखी जाती। '। और धनोभूत होनेसे घह जलकणामें परिणत होती है विद्युत् भोर अशनिका दूसरा मयं मो है, उसी तथा उसाफे साथ मायद तड़ित विद्युत्के भाकार, अर्ध में साधारणत: उसका प्रयोग हुआ करता है। विधन दिखाई देती है। फिर यारणा घनीभूत होनेमें धूलि. के. उत्पत्ति कारण सम्बरधर्म श्रीपतिने कहा है, कि कणाकी भी भायंश्यकता होती है। सुजल समुहमें बाड़यनि नामकी अग्नि रहती है। उसी- इन सब विपयोंकी एक एकको पर्यालोचना करनेसे से धूममाला निकल फर पवन द्वारा माझाश-पधर्म लाई मालूम होता है, कि विद्युत्को सम्भावनाफे सम्बन्धमें जाती और इधर उधर विक्षिप्त होती है। पोछे सूर्यको | माधुनिक शानके साथ प्राचीन ज्योतिविदोंकी उतिकी किरण पड़नेसे अव यह उत्तप्त हो जाती है तब उससे | उतनो विभिन्नता नहीं है। जो सब अग्निस्फुलिङ्ग निकलते हैं, वहो विद्युत् हैं। विद्युत् गौर शनि पक नहीं है। उनफे धातुगत कमी कमी यह विद्युत् अन्तरीक्षसे स्खलित हो कर भू अर्थसे ही पृथकता निरूपण को जा सकती। युत पृष्ठ पर गिरती है तथा जगत्का यहुन अनिष्ट करतो है। धातु दीप्ति गर्थम विद्युत् तथा संहति अर्थम अशधातुसे विद्युत्पात के सम्बन्धमें उक्त प्रकारका कहना है, कि अशमि शब्द हुआ है। वेदमें अशना शब्दसे क्षेपणीय वैद्युत तेजमें जप फस्मात् मिट्टी आदि मिल जाती है, प्रस्तर समझा जाता है। इससे स्पष्ट छात होता है, कि तव यह प्रतिकूल वा यनुकूल पवनके भाघातसे गाकाश. इन्द्रका वज्र पत्थर पा लोहेजा था। अनि शब्दसे हम . में यात्याको तरह भ्रमण करने लगती है | मकाल में अष्टि लोग सिर्फ Giobular lightning 'और .lightning पातके समय यह पृथिवी पर गिरती है तथा वर्षाकाल. ! tubes or fulgurites समझा जाता है। शेपोक अर्शमें ' में धूलके नहीं उठनेसे विद्युतपात भी होने नहीं पाता। हो प्रचलित अंगरेजो Thunderbolt शब्दका व्यवहार . पार्धिव, जलीय भोर तैजसके भेदसे विद्युत् तोन | हुमा है। . . . Yo XXL, 99