पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/४९२

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विधि

चाहिये, कि विभक्तिका 'सु' पीछे रहनेसे उसके पूर्व रहने पर समझना होगा, कि प्रथमसे चतुर्थ सूत्र पर्यन्त , वती 'स', 'प' और 'न' की जगह जात रेफ भिन्नं । दीर्घ, गुण, गृद्धि, इनादेश जितने कार्य दोंगे, वे समो. किसी दूसरे रेफ स्थानमें ( साधारण सूत्रके घल पर)| मकारके उत्तर आपेंगे,। इस सङ्कतका साधारण नाम विसर्ग नहीं होगा । जैसे, हविस्-सु-हयिासु, धनुस् । अधिकारविधि है । इसके बाद ५म सूत्र में यदि कहा जाप . . सु- धनुःनु, सत्रुप्सु -सासु, गहन् सु= अहःसु. । कि, "इकारफे बाद अकार रहनेसे उस इकारको जगह 'य'.. किन्तु 'सप' और 'न' को जगह जात रेफ नहीं होनेके | होगा" तो यह अधिकार सिंहदृष्टिकी तरह एक लक्ष्यों फारण चतुर्-सु-चतुर्यु इत्यादि स्थलों में प्राप्ति रह बहुत दूर जा कर रुक जाता है, इसी कारण वैयाकरणों में । कर भी ( इस नियम सूत्र के प्राधान्यपशतः ) विसर्ग | उसका नाम "सिंहावलोकित". रखा है,। जहां १म. नहीं होगा। एकका धर्म दूसरेगे मारोप करनेका नाम | सूत्र,---"अकारके उत्तरा रहनेसे उसकी जगह इन .. अतिदेशविधि है । जैसे,-तिङ (तिप, तस, मि आदि) होगा', २य, "' र और प कारके वाद 'न'ण' होगा, .. प्रत्यपके पीछे 'इण' धातुके सम्बन्धी सूत्र होनेके कारण | ३यमें "भ के पीछे रहने पर आकार होगा" (अर्थात अन्त में कहा गया कि, 'इण' धातु के समान "क" धातु जिसके उत्तर 'भ' रहेगा उसके स्थानमें आकार होगा) जाननी होगो अर्थात् वरात 'इण' धातुका तिङन्तपद जिस | इस प्रकार दिखाई देनेसे वह. अधिकारविधि "मण्डूक.. जिस सूत्रमें सिद्ध तथा जिस जिस आकारका होगा। प्लुति" कहलाती है। क्योंकि यह मेढ़ककी. छलांगको 'इक' धातुका तिङन्तपद भी उसी उसो सूत्र में सिद्ध तरह बहुत दूर नहीं जा सका। फिर शब्वाध्यायके १म तथा उसी उसी आकारका होगा । उदाहरण,-इण्-इ. / सूत्र में "शब्दके उत्तर प्रत्यय होगा" ऐसा उल्लेख कर २५ . . दिप् (लुङ) = गात् । इक्-इ-दिप (लुङ) = अगात् ।। सूत्रसे ले कर यह शब्दाध्याय समाप्त होने के बाद तत्पर- शब्दाध्यायमें कहा गया "स्वरादिविभक्तिके पीछे रहनेसे | वत्तों तद्धिताध्यायके शेष पर्यन्त , यथासम्भव सौ वा . ' स्त्री और भ्र शब्दके धातुकी तरह कार्य होगा" अर्थात् । सौसे अधिक सूत्रौम जितने प्रत्यय होंगे, वह प्रत्येक .. घरात दी गई कि स्वरादि विभक्ति के पीछे रहनेसे 'श्री' | सूत्र में शब्द के उत्तर' इस पातका उल्लेख नहीं रहने पर, भू' आदि धातुप्रकृतिक दीर्घ ईकार और दीर्घ ऊकारान्त | भी, शब्दके उत्तर ही. होगा, धातु आदिका उत्तर नहीं । स्त्रीलिङ्ग शब्दको तरह यथार्फम स्त्री और भू शब्दका | होगा। यह अधिकारविधि गङ्गास्रोतकी तरह उत्पत्ति पर सिद्ध करेगा। . उदाहरण 'धी औ-थियो। स्थानसे बेरोकटोक सागरसङ्गम पर्यान्त अर्थात् यहाँ । स्त्री-ौ = स्त्रियो, यहां दोनों ईकारके स्थानमे 'इय'.हुमा।| प्रकरणके शेष तक अप्रतिहतभाव में प्रवल रहने के कारण " भू-गौ-भुवौ, 5 गो-भ्र चौ, धानों . स्थल में दीर्घ | चैयाकरणों के निकर यह गङ्गास्रोत समझा जाता है। ऊकारकी जगह 'ऊय.' अर्थात् एक ही तरहका कार्य वैयाकरणोंने इसके सिवा संज्ञा और परिभाषा नामक दो हुआ। विशेष विवरण भतिदेश शब्दमें देखो। और सङ्कतोंको पतला कर सूत्रसंस्थापन किया है। चैयाकरणके मतसे परबत्ती सूत्र में पूर्वसूत्रस्य पदों / संज्ञा अर्थात् नाम, जैसे-व्याकरणके सिया इसका गन्य. घा किसी किसी पदका उल्लेख न रहने पर भी अर्थ- शास्त्र में व्यवहार नहीं होता, व्याकरणमें व्यवहार वितिकाल में उसका उल्लेख किया जाता है, इसे.मधि- करनेका तारपर्य है, सिर्फ प्रस्थ संक्षेपके लिये। क्योंकि ' कारविधि कहते हैं। यह सिंहावलोकित, मण्डकाप्लुत (अच् शब्दका प्रतिपाद्य ) " माई उ ऊ ऋ र ल . और गङ्गास्रोतके भेदसे तीन प्रकारका है। सिंहावलोकित लिए ऐ ओ भी" पोछे रहनेसे की जगह 'अप' (सिंहको दृष्टिकी तरह) अर्थात् श्म सूत्र में,-"Iकरके न होने के कारण अन्के पौछे .रहनेसे :' को जगह 'अय' वाद माकार रहने से उसका दीर्घा होगा" यही कह कर श्य होता है। ऐसा कहनेसे हो संक्षेप हुआ। व्याकरण- .. सूत्र में सिर्फ "इकारका गुण", ३यमें "एकारको वृद्धि, सूत्रके परस्पर विरोधमान और अन्य संक्षेपफे लिपे. ४में 'टा-की जगह इन". इत्यादि प्रकारसं सूत्र विन्यस्त' शाब्दिोंने कुछ परिभाषाविधिका निदेश किया है।