पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१०

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६२४ ..::. विनुकुण्डाः . कारुमची, कोचा, मदमञ्चिपाड, मुकलपाड़, मुलकलु. इस दुर्गको जीता था। गोलकुण्डाफे अधोवर मर... एनुजएडला, पेहकाचा, पछिकेलपालेम्, पोटलुरु, | दुल्ला कुतुयसाहबके राजत्वकालमें माउलिया रजान खां रण्यघरम्, मिडिचा, शानम्पुड़ी, शारीकोएडपालेम् , | नामक एक मुसलमान शासनकर्त्ताने १६४० ई० में यहाँको शिवपुरम्, तलालपिल्ला, तिम्मापुरम्, तिम्मदपालेम, तिरु- बड़ी मसजिद बनाई थी। नगरके इधर उधर बहुतेरे पुरापुरम्, उस्मडियरम् , यहे मकुण्ट, धनीकुण्ट, वेलतुरु, प्राचीन स्मृतिस्तम्भ देखे जाते हैं........ घेलपुरुचे और घनुगपालेम भादि प्रामोमें प्रत्नतत्त्वके पर्वतके पश्चिमफे ढालुए देशमें यिनुकुण्डाका सवं. अनेक उपकरण मिले हैं। प्रत्येक प्राममें ही प्रायः शिला- प्राचीन दुर्ग अवस्थित है। कहते हैं कि यह दुर्ग पहले में उत्कीर्ण , लिपिमाला और प्रस्तरप्राचीरमण्डित | पहल गजपतिबंशीय विश्वम्भरदेव द्वारा सन ११४५ १०में . स्थान और स्मृतिस्तम्भ दृष्टिगोचर होते हैं। किसी वना था। इसके बाद कुण्डबीडर पोलीय चेमरेडोने । प्राममें प्राचीन दुर्गों का भग्नावशेष या प्राचीन मन्दिर उसका जीर्णसंस्कार करया था। इस स्थानमें ही पर्वत. विद्यमान हैं। यहां तांपा और लोदा मिलते हैं। इस गावमें खोदित दो प्राचीन शिलालिपियां दिखाई देती हैं । तालुलेकी जनसंख्या प्रायः ८२४६३ है। अक्षा० १५५०, इसके कुछ नीचे पकोनिडू गन्नमनोका प्रसिद्ध किला और १६२४ उ० तथा द्राघि० ७६३२ और ७६५५ पू०- , मौजूद है। कहते हैं, कि इस दुर्ग के प्रतिष्ठाताका नाम फे घोच अवस्थित है। . . . . रेडो सरदार था। इस समय भी यहां जो राजप्रासादका इसमें सव मिला कर ७१ प्राम हैं। इस तालुकेके | ध्वंसावशेष है, उसको देखनेसे उस समयके बनानेवालों. अधिकांश स्थल में काली मिट्टो दिखाई देती हैं और कहीं की कारोगरीका पता लगता है । अवसे कोई चार सौ कही छोटो छोटो पहाड़ी चट्टाने हैं। इसके उत्तर- वर्ष पहले इस दुर्गके पादमूलमें और एक किला बना था। पश्चिम भागमे जगल है। इस तालुकेका राजस्व प्रायः | · पद्दी पूर्वाकथित गन्नम नायडूका दुर्ग है । प्रायः ढाई सौ . १८७००० २० वार्षिक है। . . . वर्ष पहले और एक दुर्ग निमित हुआ था। इसका . २ दिनुकुण्डा तालुकेका सदर। इसकी जनसं गया | प्राचीर और खाई आदि नगरके चारों ओर फैली हुई हैं। । ७२६६ है। यह नगर शैलगात्र में अवस्थित है। . अक्षा० नरसिंह मन्दिरका शिलाफलकोंसे मालूम होता है, कि १६३ उ० और प्रायः ७६°४४ पू०के मध्य अवस्थित है। सन् १४७७ ई.में सागोगन्नमने इसका मण्डप निर्माण पहाड़के ऊपर फिला है। इसके सम्बन्ध में अत्याश्चर्या कराया था। इस मण्डपके दक्षिण-पूर्व डाक गलेके अनक कितनी हो किम्बदन्तियां सुनी जाती है। कहते हैं, निकट एक शिलालिपि दिखाई देती है। यह विजय- . कि यह पर्वत समुद्रसे ६०० फोट ऊंचा है। ऊपर दुर्ग: नगरराज सदाशिवके ( १५६१ 'ई०) राजत्वकालमें की रक्षाके लिये इसके शिखर पर तोन श्रेणी में प्रकार कुमार कुण्डराजदेयका दिया दानपत्र है। .. . निर्मित हुआ है। इसके भीतर हो पूर्णमें शस्यमाण्डार, ... पर्यंतके ऊपरके कोदण्डरामस्वामी और रामलिङ्ग जलका चहयथा मादि मौजूद है।...... . - सामीका मन्दिर बहुत प्राचीन और शिल्पनैपुण्यपूर्ण राजा धीर प्रताप पुरुषोत्तम गजपतिके (१५६२- है। इसमें प्राचीनत्यके निदर्शनस्वरूप अनेक कौतियां १४६६ ई०) अधीनमें इस प्रदेशके शासनकर्ता सागी संयोजित हैं। मन्दिरगात्रम शिलालिपि है। नगरके गग्नम नायर्डने यह गिरिदुर्ग भौर उसके निकट एक उत्तर-पश्चिममें एक हनुमानको मूर्ति है। प्रवाद है, कि मन्दिर निर्माण किया था। इस मन्दिरके नफकासीका . गोलकुण्डाके किसी मुसलमान राजाने इस मूर्ति काम बहुत ही सुन्दर हुआ है। स्थानीय रघुनाथस्वामी की प्रतिष्ठा की थी। नगरमें और भी किनने हो मन्दिर के मन्दिर में एक शिलालिपि खुदी हुई है। इसका हैं। पर्वतके स्थान स्थानमें गौर भी कितनो शिला- ऐतिहासिक गुरुत्य बहुत ही अधिक है। विजयनगर लिपियां खुदी हुई दिखाई देती है। इनमें प्राचीनत्व .. राज कृष्णदेव रायने पूयों किनारे पर विजय करनेके समय सन्देह करनेका कोई कारण नहीं। .. . . : ...