पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१४

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४२८ पिन्दुसर-विन्ध्यगिरि . लानेके लिये इसी मरको किनारे ता किया था । गङ्गाजी .. एकाघ्र क्षेत्र में या भुवनेश्वर में जा कर तीर्थयामियों को इसी स्थान पूर्वकी ओर निकली है। सोमपादसे | पहले इस बिन्दुहद में स्नान करना होता है। स्नानमन्त्र- ।. निकल कर यह मदो सात धाराओं में विभक्त हो गई हैं। . , "भादौ विंद हदे स्नात्या दृष्ट या श्रीपुरुषोतमम्। . . इसोके किनारे इन्द्रादि देवतामोंने अनेक यश किये थे। द्रचूड़' समालोक्य चद्रचूहो. भवेन्नरः ॥" : : देवी गङ्गा आन्तरीक्ष, दिव और भूलोकमे मा कर शियके - (एकानपु० २३ १०) अङ्कमें लिपट योगमायासे संरुद्ध हो गई हैं। उतरते समय एकामकानन और भुवनेश्वर शब्दमें अन्यान्य विवरण देखो। . गडाजीके जितने विन्दु पृथिवी पर गिरे, वे इसी स्थान विन्दुसार-चौद्ध नरपतिभेद । पिम्बिधार देखो। पर गिरे थे। उन्ही पिन्दुओंसे सरोबर बन गया और विन्ध (स'० पु०) विन्ध्य शब्दका प्रामादिक पाठ । बिन्दुसर कहलाने लगा। . . (मार्क० पु० ५७५२) "तस्या ये यिन्दयः फेचिद् सुन्धाया। पतिता भुविः। घिग्धचूलक (स.पु०) जातिविशेष । - .. कृततु तेविन्द सरस्ततो विन्दुमा स्मृतम् ॥" | पिम्धपन ( स० पु०) विश्वशलाटु, येलसोंठ। .... (मत्स्यपु० १२० १०) विन्धयत्रो (सी० ) विन्धपत्र देखो। ... . ___ यही विन्दुसर ऋग्वेदमें सरपर तथा ममो सरो• पिन्धस (स० पु०) चन्द्रमा । (त्रिका० ) फूलहद नामसे प्रसिद्ध है । हिमप्रलयके बाद यही पर विन्ध्य (स० पु०) विध-यत्, पृषोदरादित्वात् मुम् । “प्रथम मार्य उपनिवेश बसाया गया था। १ पर्यंतविशेप, विन्ध्यपवत। - . .-. भार्य शब्द देखो। . यह पर्यंत दक्षिण भोर अघस्थित है। भारतफे उत्तर । पिम्दुसर ( विन्दुहद )-उड़ीसा, भुवनेश्वर क्षेत्रके एक हिमालय और मध्यमें विन्ध्यपर्वत है। इन दोनों के मावोग सरोवरका नाम | उत्कलखण्ड, कपिलसंहिता, । बीन यिनशन अर्थात् सरस्वती नदीको छोड़ कुरुक्षेत्र के स्वर्णाद्रिमहोदय, एकानपुराण और एकाग्रन्द्रिकागे इस / पूर्व में तथा प्रयागके पश्चिममें जो देश है, उसका नाम विन्दुतोर्शका माहात्म्य सविस्तार वर्णित है। मध्यदेश है। . . . . . .: - एकाद्मपुराणमें लिखा है, कि पूर्घकाल में सागरफे। प्राचीन ध्रुति इस तरह है, कि पिम्ध्य पर्वतके पश्चिम किनारे मग्निमालोने प्रार्थना को थो; कि देवदेव मेरे तट | दिग्यासी अगर मछली खायें, तो घे पतित समझे जाते . पर वास करें। तदनुसार स्वर्णकूर नामक, गिरि.पर हैं। विन्ध्यगिरि देखो। कोस भर विस्तृत एकान नामक वृक्ष के नीचे शिवजी भा . .२ घ्याध, किरात । पार रहने लगे। उस लिङ्गसे उत्तर ४० धेनुकी दूरी पर पिन्क न्दर ( सं० लो० ) विन्ध्यस्य कन्दरं । विन्ध्य- शङ्करने अपने वीर्यप्रमायसे कुछ पत्थरों को खोद निकाला। पर्वतका कन्दर, गुहा! ,. । उनकी माझासे यहां एक गहरा जलसे परिपूर्ण हुद | विन्ध्यकवास (सपु०) बौद्धमेव । . . ' तं गया। महादेवने पासालसे यह जल निकलता देख | विन्ध्यकूट (स.पु०) विध्ये कूटं माया .कैतवं या यस्य । सप्तसागर, गङ्गादि नदी, मानस और मरछोदप्रमुख सरो: व्याजेन . तस्यावनतीकरणादस्य , तथात्य । १ अगस्य । घर अर्थात् पृथिवी पर जिसने नदनदी तोर्थ हैं उनका जल | | मुनिका एक नाम। 'ले कर उस जलमें डाल दिया। इस प्रकार सभी तीर्थो । अगस्त्यने छल करके विन्धयका दर्प चूर्ण किया था के विन्दु यहां गिरने लगे। त्रिपथगा गङ्गा भी महादेव.. इसोसे उनका नाम विन्ध्यकूट पड़ा है । २ विध्यपोत । के कमण्डलस सौ मुखसे गिरने लगी। स्वयं भगवान्ने ! विन्ध्यकेतु ( स० पु०) पुलिन्दरामभेद। ...: . "इस हदको माया था, इसलिये यह शङ्करवापो तथा [.. .. , . (कथासरित्सा० १२११२६४) . विश्यक सभा तीर्थों का विन्दु इसमें मिलने के कारण विध्यगिरि (सं० पु०) मध्यभारतमें उत्तर-पश्चिम विस्तृत । • यह विन्दुसरं नमसे, प्रसिद्ध हुधा है। एक पर्वत श्रेणो । इसने गङ्गाको अवयाहिका भूमि मा ।