पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१५

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


___ . विध्यगिरि .... ४२६ --संक्षेपमें आर्यावर्शसे दाक्षिणात्यको प्रायः सम्पूर्ण रूपसे , मच गई। चित्रगुप्त कालनिर्णय नहीं कर सके। देव विच्छिन किया है। .... और पितृकार्य सम्पूर्णरूपसे विलुप्त हुए। मूल दास .. पुराणमें विन्ध्यपर्वतके सम्बधमें कई तरदको याते | यह है, कि पृथ्वी, होमादि और प्राद्धतर्पणादिचार्जित लिग्नी हैं। देवगण पुराकालमें इसी शैलशिखर पर | हुई। पश्चिम गौर दक्षिणके अधिशेसो मदा रात्रिका विहार करते थे। ध्यान पूर्वक पढ़नेसे मालूम होता ही अनुभव करने लगे। दूसरो मोर पूर्व और उत्तरके - है, कि उनकी यह विचरणभूमि उस समय ताप्तो और अधियासी अधिक सूर्योत्तापसे क्लेश पाने लगे। कोई नमंदाफे गगवत्ती सतपुराको सुरम्य भोर सुदृश्य पहाड़ी दग्ध, कोई मरा, कोई अधमरा हो कर तड़पने लगा। या शैलभूमि हो विध्यपति के नामसे प्रसिद्ध थी। किंतु | चारों तरफ हाहाकार मच गया। त्रिभुवनके हाहाकार- .स समय फेवल नर्मदाफे उत्तरमें मपस्थित शाखा ) को देख इन्द्र मादि देवगण इस उपद्रवकी शान्तिको प्रशाखामों में विस्तृत पर्वतमाला ही विध्यशैल नामसे चिन्ता करने लगे। परिचित है। ___ अन्तमें देवगण ब्रह्माको अग्रसर कर फैलासमें देवदेय देवीभागवतमें लिखा है, कि यह पर्वत सभी पाती- महादेवके शरणांपन्न हुए। उन्होंने महादेयजीसे विध्यकी . में श्रेष्ठ और माननीय है। इसकी पीठ पर तरह तरहफे उत्तरोत्तर उन्नतिको खर्य करनेको प्रार्थना की। महादेवने झोंके विराजित रहने से यह निविड़ बनके कसमें कहा,-विन्ध्यका पल खर्च करने की क्षमता हम लोगों से परिणत हुआ है। बोच वीवो इसके कुछ स्थान लताः | किसी नदी है। चलो, हम सभी धैकुण्ठनाथको गुलमनिवय पुष्पभारसे पूर्ण पुलकाङ्ग दिखाई देने की शरण लें। बजह उपचन सदश मनोरम दिखाई देते हैं। इस यनमें इरिन, सूअर, जङ्गलो भै'स, वानर, खरगोश, गीदड़, पाध, देवगण सोधे पैकुण्ठ में भाये और उन लोगोंने परम . भालु मादि पनचर जतु निर्भी कभाषसे विचरण करते | पिता भगवान विष्णुका स्तच किया। इस पर सन्तुष्ट हो हैं और देव, दानय, गंधर्व और किन्नर इसके मद और कर विष्णुने कहा, 'विश्वसंसारको निर्माता देवी भगवतीके नदियोंमें स्नान करते हुए जलकोड़ा करते हैं। .. । .सेधक अतुल प्रमावशालो मगस्त्य मुनि इस समय थी. ., एक दिन महर्षि नारदने विन्धपके पास मा कर कहा- काशीधाममें अबस्थान कर रहे हैं। उनके सिया और कोई हे मतुलप्रभावशाली विन्ध्य ! सुमेरु गिरिको समृद्धि विन्धपकी उन्नतिमें बाधा नहीं डाल सकेगा। तदनुसार देख कर मैं दङ्ग रह गया हूं । इन्द्र, अग्नि, यम, परुण देवगण काशोधाममें ा अगस्त्य भामर्म पधारे और गादि देवगण यहां नाना सुख भोग कर रहे हैं। अधिक | उन्होंने उनको हाभिक्षा मांगी। उस समय लोपमुदा. पार, स्वयं भगवान् विश्वात्मा गग यहारो मरावि | पति अयोनिसम्भव- यह - महामुनि कालभैरवको प्रणि. माली, सरे ग्रहों और नक्षत्रों के साथ इस पतिका परि यात पर वाराणसीसे दक्षिण की ओर चले। निमेप भर में भ्रमण किया करते हैं, इसलिये यह भरनेको बड़ा और विपके समीप मा उपस्थित हुए। मुनिवर अगस्त्यको श्रेष्ठ तथा बलिष्ठ कह कर गर्व करता है। सामने पड़े देख कर विध्यने स्वस बुक कर मानो पृथ्वी के देवर्षि के मुहसे स्वजाति सुमेरुको ऐप्तो प्रशंसा सुन कानों ने कुछ कहना चाहता हो, अगस्त्यको दण्डवत किया! कर विन्ध्य परायण हो उठा। इसने अपनी कुटिल अगस्त्यने बड़ी प्रसन्नतासे कहा यत्स ! तुम्हारे इस -युनिसे परिचालित हो कर मर्याको गतिको रोक सुमेषके दुरारोह प्रस्तर पर आरोहण करने में मैं नितान्त अक्षम गर्नको वर्ग करनेकी चेष्टा की। इसने अपनी भुतारूरी हो रहा है। मैं जब तक लौट कर न भाऊ तब तक शृङ्गोको अचा कर म.काशमार्गको रोक रखा। सूर्यदेव तुम इसी मायसे अपस्थित रहो ।' मुनियरने घिग्ध्यसे इसको पार कर जा न सके। , ऐसा कह दक्षिणको मोर प्रस्थान किया। घे धोशेलको ...: सूर्यका मागं भवरद होने पर दिव्यलोकमें गड़बड़ी होते हुए मलपाचल जा यहां माधम बना कर मारें, .., Vol xxI, 10s