पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५१७

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विन्ध्यगिरि-.. ४३१ गतिको रोक जगत्, अन्धकारका राज्य करनेको पुराण तोशमा कोशलाश्चेष पुरा वैदिशस्तथा । , वर्णित कथाओं पर विचार करनेसे मालूम होता है, कि तुम्बुरास्तुम्बुलाश्च व पटवो नेपः सह । एक समय बिग्घ्यपर्वतकं हृदयको भेद कर अग्निगलित अन्नजातुष्टिकाराश्च वीतिहोत्रा ह्यबन्तयः ।। द्रवपदार्थोने और, धूमराशिने निकल कर जगत्को एते जनपदाः सर्वे विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः॥" आच्छादित कर लिया था। यह सहज ही अनुमान ! (माई पडेयपुराण ५७३५१-५५ ) होता है, कि पुराणको यह वर्णन भोग्न य गिरिक वामनपुराणमें भी इन स्थानों को विन्ध्यके निम्न अग्न्युत्पातका परिचायक है और रूपक.भावयदी | भागमें अवस्थित रहना लिम्बा है। किन्तु उक्त ग्रन्धर्म पुराणों में वर्णित है। विभिश पुराणों अगस्त्यका दो एक स्थानों को विपरोतता दिखाई देती है। . विभिन्न दिशाका जाना प्रमाणित होता है। अगस्त्यका । (घामनपु० १३ भ०) दाक्षिणात्य गमन या अन्तरीक्षम गादायरी तट पर या . पुराण और स्मृत्यादि प्रन्थों में यह पर्वत मध्यदेश मलपाचलमें माधम निर्माणसे उस समयके विन्ध्य | और दाक्षिणात्यको सोमा निर्दिए है। सुतरां इसके पादवासी का दाक्षिणात्य उपनिवेशस्थापन | मारा. उत्तर भारतके - मार्य औपनिवेशिकोंके साथ प्रसङ्गक्रमसे पर्णित होना सूचित करता है। भाधुनिक दाक्षिणात्यके अनार्यो की पार्थपय रेखा विनिवेशित हुई भूतत्वविदुने भो एक स्वरसे खोकार किया है, कि है। . . विन्ध्यशेलके प्रस्तरस्तर और प्रशास्त्राओं पर विशेषरूपसे "दिमवद्विन्ध्ययोर्मध्य यत् यिनशनादपि । पवेिक्षण करनेसे मालूम होता है, कि ये माग्नेयगिरि प्रत्यगेव प्रयागाच मध्यदेशः प्रकोस्तितः ।। के सायनात हैं। : ___भासमुद्रात्तु ये पूर्वादासगुद्रात्तु पश्चिमात् । . प्राचीनकाल में यह शैलदेश नाना नद-नदियोंसे | . यो रेवान्तर' गियारावि विदुयुधाः ॥" परिशोभित था और भनेक भार्या और अनार्या जाति • (मनुसहिता २२२१।२२) वहां वास करती थी। | . मिटर मोल्डहम और मिष्टर मेडलिकटने विन्ध्य- पुराणो विन्ध्यपादसे शिमा, पयोष्णो, निर्घिन्ध्या, | पर्वतके भूतत्वको पोलोचना कर लिखा है, कि यह ताप्ती-प्रभृति कई नदियोंकी उत्पशिका उल्लेख दिखाई | - पर्णतमाला दाक्षिणात्यको उत्तरी सीमा पर व्याप्त है। देता है। यह मानो एक त्रिकोणका मूलदेश है। पूर्व और पश्चिम - हिन्दुओं को दूष्टि में ये नदियां पुण्यसलिला और | घाट पर्वतमाला इसक दोनों पाय है जो भारतके पूर्व पुण्यता,रूपमं गण्य है वहां आर्यों का निवास न रहने और पश्चिम उपकूल होते हुए फुमारिका अन्नरोपके से ये नदियां कभी भी पुण्यसलिला नहीं कही जातो। निकट परस्पर मिले हैं। नीलगिरिको शिखर मानो .. इस पर्वतको पीठ पर और नर्मदा तट तक दक्षिण | इस त्रिकोणका चूहान्त है। गुजरात और मालयके पादमूलमें कितनी ही असभ्य जातियों का वास है। धीचसे यह पर्वात घार पदसे मध्यभारतको पार कर राज- साज भी यहां भील आदि अनेक भादिम जातियोंका महलके गाय उपत्यका देश तक फैला हुआ है। यह पास है। मार्फण्ड य पुराणमें लिग्ना है:-- अक्षा० २२०२५ से २४३० उ० और देशा० ७३ ३४ . "नासिक्यावाश्च ये चान्ये ये च योत्तरनर्मदाः।। ८०.४५ पू०के मध्य अवस्थित है। इसको साधारण भीप्तच्छाः समाहेया: सहसारस्पतरपि ॥ ऊंचाई १५०० फोटसे ४५०० फीटके करीब है। किन्तु काश्मीराश्च मुराष्टाश्च भावन्त्या चायु'दैः सह। कहीं कहों इसके चूलान्तको ऊंचाई ५००० फोर तक ' इत्येते ह्यपरान्ताच शृणु विन्ध्यनिवासिना-1 । देखो गई है। : : : - शिरजाय करूपारच, फेरलाश्वोत्कलो यह। .. · पश्चिममें गुजरातसे पूर्व गङ्गाको अघवाहिको देश . उत्तमा इशाणाश्च मोज्याः किष्किन्ध्यकः सह। . ' तक २२ से २५ सम-अक्षांशके बीच .".