पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५३०

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४५० विप्रकर्ण-विमतारक द्विज पिद्वान हो या नहीं, यदि सदा सन्ध्या पूजा- विप्रकृत् ( स० लि. ). अनिष्टकारी, विरुद्ध कार्य करने द्वारा पवित्र हो और एकान्त चित्रसे हरिके चरणों में प्रीति वाला । रखते हो तो उनको विष्णु सदश ज्ञानना । क्योंकि, नियत | विप्रकृत (सत्रि०) वि:प्र-क-क। अप्रात, तिरस्कृत ! . सन्ध्या पूजादिका अनुष्ठान और हरिमें एकान्त भक्ति | विप्रकृति ( स० स्रो०); वि-प्रक-तिन् । विकार देखो। रहनेसे उनकी देह और मन इतना ऊंचा होता है, कि वे विकृट (स.त्रि०) वि-प्र-कृप-क। १ दूरबत्ती, दूरस्थ, किसीके द्वारा हिंसित या अभिशप्त होने पर कभी भी जो दूरी पर हो। २ विप्रकर्णित, खोच कर दूर किया प्रनिहिंसा या अभिगाप देने में उद्यत नहीं होते। हरिभक्त | हुआ। ब्राह्मण एक सौ गौको अपेक्षा पूज्यतम है । इनका पादोदक विप्रकृष्टक (स. त्रि०) विप्रकृष्ट एव स्वार्थे कन् । दूर- नैवेद्यस्वरुप है। नित्य रस नैवेद्यका भोजन करनेसे लोग बत्तों, जो दूरी पर हो। राजसूय यग्यका फल पाने हैं। जो विप्र पकादशोके दिन विप्रकृयत्व ( स. क्लो०) दूरस्त्र, दूरी 1, . निजल उपवास और सर्वदा विष्णु की आराधना करते । विप्रकृति (स..स्त्रो०) १ विशेष, संकल्प। २ अद्भुत हैं, उनका पादोदक जहां पतित होता है, वहां एक तीर्थरूप | प्रकृति । समझना चाहिये। (ब्रहावे. पु० १।११।२६ ३३) विप्रचरण (स० पु०) भृगुमुनिको लातका चिह्न जो विष्णु. ____ ब्राह्मण देखो।। हृदय पर माना जाता है। (त्रि०) २ मेघायो । ३ स्तोता, शुभकर्ता : "विषस्य विप्रचित् ( स० पु० ) दानयविशेष। इसकी पत्नीका वा यजमानस्य वा ग्राम्" (ऋक् १०४।१४) "विप्रस्य । नाम सिंहिका था। इसके द्वारा इस सिंहिकाफे गर्भसे मेधाविनः स्तोतुर्वा' ( सायण) (क्लो०) ४ अश्वत्य, पीपलं। राहुकी उत्पत्ति हुई। । : ५ शिरीष वृक्ष, सिरिसका पेड़। ६ रेणुक, पापरका विचित ( स० वि०)१ विप्रवत् । (पु.) २ दानव पौधा। (त्रिका)७ जो विशेषरूपसे पूरण करते हैं। विशेष । वैप्रचित्त देखो। .. . .. विप्रकर्ष (सं० पु०) १ विशेषरूपसे आकर्षण । २ विकः | विप्रचित्त ( स० पु०) विप्रचिति देखो। पण, दुर खीच ले जाना। विप्रधित्ति (स० पु.) मनुके पक पुनका नाम । इसकी विप्रकर्षण ( स० क्लो० १ १ विकर्पण, दूर खोंच ले जाना ।। पत्नी सिंहिका गर्भसे राहुकेतु मादि एक सौ पुत्रोंकी कर्मकरणान्त, किसी कम या कृत्यका मत। उत्पत्ति हुई थी। विप्राणशक्ति ( स० स्त्रो० ) यह शक्ति जिससे सभी विमजन (स.पु०) १ उत्पचि ! २ ब्राह्मण । ३ पुरोहित । परमाणु परस्पर दूरवत्ती होते हैं। । ४ सौरचिव शसे उत्पन्न ऋषिविशेष । (कातक २७५) विप्रकार (स० पु०) विप्र-क-घम् । १ अपकार । विप्रजित्ति (स'० पु०.) भाचार्यभेद। २ तिरस्कार, अनादर । ३ खलीकार । ( अध्य० ) (शतपथब्राह्मण १४।५।५।२२) ४ विविध प्रकारसे। विप्रजत ( स० पु०) विप्रो जूतः प्राप्तः। विप्र कत्तुंक विप्रकाश (स पु०) पि-प्र-काश-अच् । प्रकाश, अभि प्राप्त या प्रेरित । (भृक् : ११३:५) ध्यक्ति विप्रजूति ( स० पु०) वाताशनगोत्रसम्भूत ऋषिभेद ] विप्रकाष्ठ (सलो०) विप्र पूरक काष्ठं यस्य । तूल. आप एक वेदमन्ता ऋषि कह कर विख्यात थे। घृक्ष, नरमा या कपासका पौधा। (राजनि०) . विप्रणाश ( स० पु०) १ ब्राह्मणनाश । २ विशेषरूपसे विप्रकोणे ( स० त्रि०) वि-प्र-छ-क्क । १ इतस्ततः विक्षिप, ध्वंस। धिर उधर पड़ा हुआ, दिखरा हुआ। . २ अव्यवस्थित, विप्रता ( स० त्रि०) माह्मणत्व ।, . .: . मस्त व्यस्त, गड़बड़। विप्रतारक ( स० पु० ) अतिशय प्रतारक, बहुत धोत्रा विप्रकीर्णत्व (सलो ) यिप्रकीर्णका भाव। ... देनेवाला । ' . .........