पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५७

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वासिष्य इस तरह खरीदने येचनेका लक्ष्य रख कर कारोबार |. यह.ऐसा काम करे जिससे व्यवसायों दानि हो, नो उम्मे करने उत्तरोतर उन्नति होती है। " ही उस क्षतिकी पूर्ति करनी होगी । यदि कोई विपद्- "काप, गोरक्षा और याणिज्य वैश्यको वृत्तियां हैं।' को दुहाई दे, तो वह साधारण लाभांशका दायां धेश्य इन्हीं पतियोंसे अपनी जीविकाका निर्वाह करे। श पानेका अधिकारी होगा। राजाको आशा ले कर किन्तु ब्राहाण पर जब विपद् उपस्थित हो अर्थात् "जव | व्यवसाय मारम्म करना होगा। राजा दोघेचनेवालो अपनी जीविका-निर्वाह नहीं कर सके, तब यह वाणिज्य- चोजका मूल्य निर्धारित करता है। इसीलिये उमको वृत्तिसे ही अपनी जीविका चला सकते हैं। ब्राह्मण कररूपमें लाभांशके २० भागका एक भाग दिया जाता को आपत् काल में किस वृत्तिका अवलम्बन करना चाहिये, है। राजा जिस चीजको येचनेको मनाई करे वह और इसके सम्बन्धमें मनुने लिखा है ब्राह्मण और क्षत्रिय राजोचित चीजें, येचने पर यह ले लेगा। अपनी धर्मनिष्ठाम व्याघात उपस्थित होने पर निषिद्ध . यदि वणिक् वाणिज्य करते समय शुल्क वचनाके चस्तुओंको त्याग वैश्यको वाणिज्य वृत्तिसे अपनी जीविका लिये पायदव्यको परिमाण विषयौ मूठ बोले, शुलक ग्रहण चलो सकेगे। - स्थानसे टल जाये और विवादास्पद द्रश्य खरीदे येचे, तो - "निषिद्ध वस्तुएं --सव तरहके रस, तिल, मस्तर, उसे पण्यद्रव्यको अपेक्षा ठगुना दण्ड होगा। वाणिज्य सिद्धान्न, नमक, पशु और मनुष्यका बेचना यहुत मना करते समय किसी हिस्सेदारको मृत्यु हो जाय, तो है। कुसुमादि द्वारा रंगे लाल रंगके सूतेसे धने सब तरह-| उस समवेत वाणिज्यमें उसका जो धन रहेगा, राजा के वस्त्र, 'शन और अतसो तन्तुमय यन, भेड़के रोए के)' उसके उत्तराधिकारीको दिला देगा। इसमें जो ठगेगा, बने कम्वल धादिका वेचना भी मना है। जल, शस्त्र, ] यह लामसे यश्चित कर दिया जायेगा। विप, मांस, सोमरस, सब तरहके गन्ध द्रव्य, दुध, दही, राजा पण्यद्रष्य के प्रकृत मूल्य तथा लानेका किराया भोम, घो, तैलं, शहत्, गुड़ और . कुश थे सब चीजे। आदि खर्चका हिसाव कर वस्तुका मूल्य निर्धारित कर थेचनी न चाहिये। सब नरहके वन्य पशु, विशेषतः | दे, जिससे खरीदने और बेचनेवाले दोनों की क्षति न होने गजादि दंष्ट्र अवण्डित खुर मयादि, सिया 'इसके मद्य पापे । राजा अच्छी तरह जांच पड़ताल कर चीजोंका मृल्प और लाह, चपड़ा आदि कभी भी न येचना चाहिये। | निर्धारित करे। राजाके निर्धारित मूल्य से हो यणिक तिल विषय में विशेष यही है, कि लाभको आशा तिल नित्य चोजे बेचा करे। वणिक सरोदनेवालेसे मूल्य ले घेचना उचित नहीं। किन्तु स्वयं पैदा की . हुई तिलको कर'चीज उसे न दे तो उसके रुपयेका सूद जोड़ कर या येचने में कोई दोष नहीं। (मनु १००) .. उस वस्तुको ऐच कर जो लाम हो, उस लाभके साथ उसे ग्राह्मण गौर क्षत्रिप इन सष यस्तु को छोड़ परीददारफो चुकाना होगा। देशी खरीददारले प्रति यह वाणिज्य कर सकेंगे। ये दोनों जातियां आपसमें मिल नियम है। यदि यह खरीददार विदेशो हो, तो खरोदो कर एक साथ वाणिज्य कार्य आरम्भ करें और उनमें चीज 'विदेशमें ले जा कर येची जाने पर वहां जो लाम यदि कोई प्रतारणा करे या किसीफे ध्यान न देनेसे | होता, उसका हिसाव आढ़ कर विदेशी परीददारको उसे वाणिज्यमे क्षति हो, तो राजा उसको दण्डका विधान | देना पड़ेगा। ..येयनेयालेके देने पर भी यदि खरीदनेवाला माल - महर्षि याज्ञवल्पयने लिखा है-जो सब वणिम एक | नहीं लेता, फिर भी देवोपदव तथा राजपदयसे यह नए साथ मिल घर व्यवसाय करें (जैसे आज कल लिमिटेड हो जाये, तो सरोददारका दो माल न होता है। धेचने- कम्पनी प्रतिष्ठित होती है।) उसमें जिसका जैसा भाग पाला इस मालका जिम्मेवार नहीं। येचनेके ममय यदि - होगा, उसीक सनुसार उसको घाटा नफा सहना होगा। मेवाला धुरी चोजो अच्छी कह कर येचे, ना येवो इन हिस्सेदारों में यदि कोई लिपिद कामको कराया ! हुई चोजके दामसे दूने दामके एडका यह अधिकारी redate