पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/५७२

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४६४ विराट .. किया। महाविराट के लोमकूपमें, ब्रह्माण्ड में, गालोकर्म । पाते कहा करते हैं। किसो किसीकारत है, कि यह गौर एकार्णयजल में घिराटके अशसे क्षद्र विराट् मावि- प्रधान राजपुनाने में है, कितने के मतानुमार, यह बाई भूत हुए थे। वे युवा, श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, जलशायी, प्रदेशके अन्तर्गत है। किसीके मतसे उत्तरी बंगाल ईपत्हास्ययुक, प्रसन्नवदन, विश्वव्यारो जनाईन हैं। किसीफे मतसे मेदनीपुर जिले में एवं किमोके मनके यह उनके नाभिपासे ब्रह्मा आविर्भूत हुए । (प्रकृतिखएट ३ अ०)/ मयूरभंजके पार्वत्य प्रदेश में है। पौराणिक और दार्शनिकगण ब्रह्मवैवर्तको विराट सरस्वतो और दूपद्वनी, इन दोनों देवनदियों के उत्पत्तिका अनुसरण नहीं करते। इस सम्बन्ध चे वेदके | मध्य देव-निर्मित एक देश है जो ब्रह्मावर्तके नामसे प्रमाण हीको मानते है। विराटो उत्पत्ति सम्यन्ध विख्यात है। कुरुक्षेत्र एवं मत्स्य, . पञ्चाल तथा शूर. कसंहितामे इस प्रकार लिखा है-- सनका देश ही ब्रह्मपिं देश है, यह ब्रह्मावर्तसे अलग है। "सहस्रशा पुरुष सहस्राक्षः सहस्रपात् । मनुके कथनानुमार मालूम पड़ता है, कि उत्तर-पश्विमा स भूमि विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठदशांगुप्तम् ॥ भारतमें, कुरुक्षेत्र घा थानेश्वरका निकटधत्तो प्रदेश, पुरुस्नेद सर्व यद्भ तं यच्च भव्य । पञ्चाल या कान्यकुब्जका अञ्चल, शूरमेन वा मथुरा प्रदेश उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ।। इन सा जनपदोंके समाप दी मत्स्यदेश था -पवं वह एतायनस्य महिमातो ज्याभिच पूरुषः । महर्थिदेशक वीवमै पड़ता था। पादोऽस्य विभ्या मतानि विवादस्यामृतं दिकि महाभारतके भीष्मपर्व में तीन मत्स्य देशोंका उल्लेख तस्माद्विरादजायत विराजो अधिपूरुषः । पाया जाता है- स जातो अत्यरिच्यत पञ्चाङ्ग मिमयो पुरः ॥" १म-मत्स्याः कुशल्याः सौसल्या: कुम्भयः कान्तिकोशमा । (मृक १०६०।१-५)। य-चेदिमत्स्यकरूपा च भोजजाः सिन्धुपुलिन्दकाः ।। पुरुपके सहस्र मस्तक, सहस्त्र चक्ष और सहस्र चरण ! ___३५-दुर्गानाः प्रतिमत्स्याश्च क न्तला फोशक्षास्तया।" । हैं। यह पृथिवीमें सर्वत्र व्याप्त रहने पर भी दश (भीष्मपर्व १० म०) अंगुल ऊपर अवस्थित है। पुरुष हो सब कुछ है, उक्त कथनानुसार एक . मस्पदेश पश्चिममें कुशल्प, जो हुआ है और जो होगा। उनकी इतनी बड़ी । सुशल्प और, कुन्तादेशके निकट, पक, पूर्णमें वेदि महिमा है, पर यह इससे कहीं बड़े हैं । सम्पूर्ण . (बुन्देलखंड ) तथा करूष (शाहाबाद जिले के बाद पत्रं विश्व और भूत एकपाद हैं, आकाशका ममर अंश :तृतीय धा प्रतिमत्स्य दक्षिण में दक्षिणकोशलके निकर त्रिपाद है। उससे विराट उत्पन्न हुआ और शा। . . .. . विराटसे अधिपुरुष । उन्होंने आविर्भूत हो कर | . . उपरोक्त तीन मत्स्य देशा पहला ही मनुका कहा सम्पूर्ण पृथियीको आगे पोछे घेर लिया। भगवद्गीता हुमा आदिमत्स्य था। दूसरा सम्भवतः उत्तर बंगके अनुसार भगवान्ने जो अपना विराट् स्वकर दिखाया था। दिनाजपुरका अचल एवं तीसरा मेदनीपुर और मयूर-' उसमें समस्त लोक, पात, समुद्र, नद, नदी, देवता भञ्जके दोचका देश हो था । इत्यादिदिखाई पहे थे। बलि को छलनेके लिये भगवान्ने उक्त तीन देशोंके मेध्य पाण्डवोंका अशातवासस्थल जो त्रिविक्रम- कप धारण, किया था उसे भी · विराट विराट राजधानीसे भूपित मत्स्यदेश.कहां है ? : ' कहते हैं। .... .:. , . . . ।.. . आदि मत्स्य या विराट। ..::३ सायम्भुव मनु । (मत्स्यपु० ३ ० ) , ..। पांचो पाण्डय अहातवासके समय जिस रास्तेसे ‘विराट-मत्स्य देश। यहां जो भारतीय व्यापार संघटित । विराटको राज समाने गयेथे पवं मत्स्यदेशवासी हुबाधा, 'महाभारतके विरारपर्व में .उसोका वर्णन है। योद्धाओं को वीरता तथा साहसिकताका परिचय . इसमाचीन जनपद के विषय कई लोग कितने प्रकारको } जिस प्रकार सर्वत्र वर्णन किया गया है, उससे जान