पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६३७

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विवाह विधया विवाह या विधवा किसी दूसरे के साथ पाणि | जातो हैं उसी तरह एक पुरुष दो स्त्रियों के साथ विवाह प्रहण करने के पक्षमें नहीं है। यह सहमरणोन्मुख रम कर सकता है ! णियों को सान्त्वनामान है। आश्वलायनगृह्यसूत्र में | इसके सम्बन्धमें एक और श्रुतिका प्रमाण हैं- भी दे घर आदि द्वारा श्मशानगामिनी विधवाके प्रति | "तस्मादेकस्य बहो जाया भवन्ति।" इसी तरहका उपदेश दिखाई देता है। जैसे- महाभारतमें राजा द्रुपद युधिष्ठिरसे कहते हैं- "ता मुत्थापयेइ वरः पतिस्थानीयोऽन्तेवासी जव.। "एकस्य वो विहिता महिषयः कुरुन दन।" हासो बोदोव नाभि जीवलेकम् ॥" (आदिपर्व १६५ अध्याय २७ लोक ) - (आश्वलायनगृह्यसूत्र ४।२।१८) । ऋग्वेदसंहिताके दशवें मण्डलके १४५ सूत्र के पढ़ने- दो ऋकोंक साथ मनुस्मृतिका मिलान करनेसे यह , से मालूम होता है, प्राचीन समयमें सौत अपनी अपनी मालूम होता है, कि पुनके लिये बौदिक कालसे मनुके प्रतियोगिनी सौतों पर रोव जमानेके लिये मन्त्रीवधिका समय या उसके बादके समय तक भो नियोगको प्रथा प्रयोग करती थी। प्रचलित थी। यह नियोग कार्या देयर द्वारा ही सम्पन्न ___यह जो तोप्रशक्तियुक्ता लता है, वह औषधि है. इस होता था। देवर हा भौजाईके गर्भसे सन्तान उत्पन्न को खोद कर मैं उखाड़ रहा है। इससे सीतको कर करता था। समय आने पर भीजाई देघरके साथ व्याही | पहुंचाया जाता है। स्वामीको प्रमफांसमें बांधा भी जाने लगी। जा सकता है।' __देवर द्वारा पुत्रोत्पत्ति रोकी गई है सही, किन्तु ' मन्वादि सहिताकारोंके साथ शास्त्रमें भी बहुपक्षी इस समय भी कई जगहों में विधवा मौजाई देवरको पत्ति प्रधाको आलोचना बहुत दिखाई देती है। बना लेती है। यह नियम कई देशो में देखा जाता है। ___द्विजातियों के लिये पहले मवर्णा विवाह ही विहित मादिम समाजको विवाह-प्रथाको मालोचनामें भी इसके | है। किन्तु जो रतिकामनासे विवाह करना चाहते हैं, वे सम्बन्ध कई दृष्टांत दिये गये हैं।' अनुलोम क्रमसे विवाह कर सकते हैं। यहुपत्नी प्रथा (Polygemy)। भारत में यहुत दिनोंसे बहुपत्नीको प्रथा चली बातो शङ्ख और देवल आदि स्मृतिकारों के प्रधाम बहु- है। वेद के सूत्रकार दीर्घातमा ऋषिके पुत्र कक्षोधान् | विवाहक प्रयोजनानुसार वहुयिधाम दिखाई देता है। हागना अध्ययन समाप्त कर जाते समय पथके किनारे पुर पुराणों में इसके दृष्टान्तका अभाय नहीं श्रीकृष्णकी बहु. सो गये। इसी पथसे नौकरों के साथ राजा जा रहे तेरो रानियां थों। पसुदेवकी भी बहुपतिशं थी। धी- थे। राजा कशोधानको देख कर बहुत संतुष्ट हुए और मदुभागयत्में इसके प्रमाण हैं। उन्हें अपने भवनमें उठवा ले गये। यहां उन्होंने अपनी सत्य युगमें धर्नामत नामक एक ऐश्वर्यशाली दश कन्याओं के साथ कक्षोवान का विवाह कर दिया। | वणिक्ने बहुविवाह किया था । अभिशान शकुन्तलमें: दइजो उन्होंने १०० निष्क सुवर्ण, १०० घोड़, १०० थैल। इसका वर्णन है। गोर १०६० गाड़ी और १६ रथ दिये । यही कक्षीयान् जय | पौराणिक और आज कलके राजाओं के बहुविवाहकी पृद्ध हो गये तक इनको इन्द्रने युवा नामकी युवती पक्षो- दात तो किसीसे छिपी नहीं है। पचास वर्ष पहले को दिया। इस तरह वहुपक्षाप्रथाके और भी उदाहरण | बङ्गालके रादीय कुलोनो में सौसे अधिक विवाह होते दिये जा सकते है। थे। कहें कह सकते हैं, कि भारतमें जितना इस प्रया. 'वेदमें लिखा है-"यदेकस्मिन् यूपे । रेशने परिव्ययति का प्रभाव जोरों पर था, उतना और किसो भी देशमें तस्मादेको जाये विन्देत।" । नहीं। फिर भी यैदेशिक मुसलमानों के यहां पहुपियाद अर्थात् जैसे यकाल में एक यूपमें दोरस्सियां बांधों को कमी नहीं।