पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/६५२

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विवाह सगोपादि कन्या विवाहका प्रायमित्त । शास्त्रमे परिवेदनदेोपके प्रतिप्रसव भी दिखाई देता : सगोत्रादि अधिवाह्य कन्याओंकी वात कहो गई है। है । जेउमाई यदि किसी दूसरे देशमै हो, क्लोव, एकपण, इस तरहकी अविवाह्य कन्याके साथ विवाह कर लेनेसे | सौतेला हो, वेश्यासक, पतित, शूदतुल्य, बहुत रोगो, वरको प्रायश्चित्त करना होता है। शास्त्रमे बौधायन | जड़, मूक, अधा, बहरा, कुयरा, वामन, आलसो, बहुत . वचनमें लिखा है, कि यदि अज्ञान या मोहवश सगोत्रा वृद्ध, बालब्रह्मबारो, खेतीके 'काममें संलग्न, राजसेवक, . कन्याका पाणिप्रहण कर लिया जाये, तो उसको माता. कुसोदादि द्वारा धन वनमें तत्पर, यथेच्छाचारो, किसी. : का तरह पोषण करना चाहिये। फुफेरी, मौसेरी और को दत्तक दिया गया हो तथा उन्मत्त और चोर हो, तो ममेरो बहन, मातामह-सगोला तथा समानप्रवरा कन्या. छोटेके विवाह कर लेने पर भो परिवेदनदोष नहीं लगता। का विवाह कर लेने पर ब्राह्मणको चान्द्रायणव्रत करना इनमे धन पढ़ानेमे तत्पर, राजसवक, कृषक और प्रवासी' चाहिये और परिणीता कन्याको स्वतत्रभावमें रख कर ये चार तरहके जेठ भाइयों के लिये छ।टेको तीन वर्ष तक उसका भरण-पोषण करना उचित है । यदि कोई समान- प्रतीक्षा करनी चाहिये। यदि परदेशमें रहनेवाला जेठ । गोला और समानप्रवरा कन्यास. विवाह कर उसके गर्भस भाईको एक वर्ष तक कोई समाचार न मिले, ते। छोटे संतान उत्पन्न करे, तो वह सतान चाण्डाल सदृश और | भाईको चाहिये, कि वह इस समयके वाद विवाह कर विवाहकत्तां ब्राह्मणत्वहीन होता हैं। ले। कि' विधाहके बाद यदि वडा भाई लौट भावे, प्रायश्चित्तके विवेचन करनेवालोंने श्रुतिमें दोपको 'ता छोटा भाई अपने किये देषिकी शुद्धि के लिये परिवेदन- मीमांसा की है। जैसे- दोपके निर्धारित प्रायश्चित्तके पादमात्रका आचरण । पहले जो अविवाह्य कन्याओंकी पात शास्त्रमें • करे। कही गई है, उनसे विधाह करनेवालेको चान्द्रायणव्रत धर्म या अर्थ उपार्जन..करनेके लिये दसरे देशमे गये करना होता है । इसो यत द्वारा इस पापका नाश होगा।हुए जेठ भाईका नियमित रूपसे समाचार मिला करे, . चान्द्रायण प्रत करके विवाहिता कन्याको खतव: भायौ | तो उसके लिये चारह वर्ष तक समयकी प्रतीक्षा करना। रख कर उसका भरण पोषण करना होगा । : .... उचित है, किंतु उसके उन्मत्त, पतित . और राजयक्ष्मा । मातृनाम्नी कन्यासे' विवाह नहीं किया जाता। रोगयुक्त होने पर प्रतीक्षा करने की जरूरत नहीं । . यदि किसी कन्याका नाम माताको राशि या पुकारके कुछ लोगोंकी रायमै ६ वर्ण. तक प्रतीक्षा करने के बाद . नामसे मिलता जुलता हो, तो उस कन्याको मातृकनया छोटे भाईका विवाह कर लेना विधेय है। प्रायश्चित्त कहते हैं। प्रमादयश ऐसो कनवास विवाद करने पर भा! वतानेवालोंने मीमांसा की है, कि ब्राह्मण, क्षत्रिय। प्रायश्चित्त करना पड़ता है। ऐसा करके हो उसके | पैश्य और शूद ये चार वर्ण विधा और अर्थोपाज नके कर्शष्यको इतिश्री नहीं हो जाती, वरं इस कनयाको परि लिपे विदेशगत जेठ माईको उद्देशसे १२।१०१८ और ६ . त्याग करना होता है। उसके माथ कोई भी दम्पति वर्ष यथाक्रम प्रतीक्षा कर विवाह करे। प्रतीक्षाकाल,- योग्य व्यवहार नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणका १२ भोर क्षत्रियका १० वर्ष इत्यादि क्रमसे विवाहमें परिवेदनदोष । जेठे भाईका विवाहित छोड़ समझ लेना होगा। . . . कर यदि छोटे भाईका विवाह हो, तो परिवेदनदेोप हो जाता है। यह छोटा भाई परिवेत्ता, जेठ भाई परिचिन्न किन्तु जेठ भाई जीवित रह कर यदि स्वेच्छाक्रमसे 'और परिणीता पनाा परिवेदनोया कही जाती है । सिया अग्न्याधानादि न करे तो उसकी अनुमति ले कर छोटा | भाई सय काम कर सकेगा । फलतः जेठ भाई यदि शादी इसके कनप्रदान करनेवाला परिदायो और पुरोहित परि- कर्ता कहा जाता है। ये सभी शास्त्र के अनुसार पतित न करे और छोटे भाईको खुशीसे शादी करनेको आमा दे दे, तो यह विवाह दोपावह नहीं होगा। किन्तु ये जेठ