पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७००

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


विश-विश्वकर्मन वर्शन द्वारा दिव्यरूपिणी सायन्तनो सन्ध्यामूर्शि धारण सु, सत्य, तु, दक्ष, काल, काम, धृति, कुरु, पुरया, - करने पर कामविहल असुर अशेष लापप्पमपी पिलांस- मानवा, पे दश हैं। इनमें इटिश्राद्धमें ऋतु और दक्ष, . कनिलया स्रोमूर्ति के भ्रममें विम्रमोन्मत्त हो उसके प्रति नान्दोमुझमे (माम्युदयिक) श्राद्ध में सत्य और घसु नैमिः । आलिङ्गन करने के लिये दौड़ने पर उद्यत हुए और पस्तु. त्तिक क्रिपामें काल और काम । काम्यकर्ममें धृति, और . गत्या किसी पदार्थको उपलब्धि न कर सकनेसे हत, कुरु और पार्वण श्राद्ध में पुरुरवा और माद्रयाका उल्लेख बुद्धिको सरह इधर उधर घूमने लगे। करना होता है। ये धर्म द्वारा दक्षकन्या विश्वाके गर्म- इसके बाद स्वयम्भुने अपनी लावण्यमयी कान्तिसे से उत्पन्न हुए। (मत्स्यपुराण ५ १०) ५ नागर, सोंठ- गन्धर्ना, अप्सर और सर्गलोकप्रिय कान्तिमती ज्योत्स्ना- (विभ्य) ६ विष्णु । ७ देह । ८ शिय । (मारत १३।१०।१४५). ' की सृष्टि की। इस तरह सालोकपितामह ग्रहाने (सी०) ६ परिमाणविशेष, ६ रत्ती- एक तोला । १० . अपने मालस्यके द्वारा तन्द्रा, जम्मा, निद्रा और उन्माद | तोला- एक पल, २० पल = विश्वा । ( ज्योतिष्मती ) हेतुभूत प्रेत पिशाच सादिको सृष्टि की है। इसके वाद। ११ स्थूल शरीरव्यापी चैतन्य, · प्रत्येक शरीरावच्छिन्न साध्य और पितृगणकी सृष्टि हुई, इन साध्य और पितृ., जीवात्मा । । वेदान्तसार) १२ दक्षकन्याभेद, विश्वदेवोंकी गणको लोग माज भी श्राद्धादि द्वारा अपने अपने पिता- माता । (मत्स्यपु०) १५ अतिविषा । १४ शतावरी, शतमूल। की तरह हथ्य कथ्य प्रदान करते हैं। अन्तर्धान शक्ति (नि०) १५ सकल, सय, समस्त । १६ बहु, बहुत, अनेक ! द्वारा सिद्ध और विद्याधरोंको सृष्टि हुई। इसी कारणसे ( निघण्टु) ही इनकी यात्मामें एक अत्यद्भुन अन्तर्धान-शक्ति विश्वा ( स० वि०) विश्व कन् । निखिल, समस्त । उत्पन्न होती है अर्थात् पे इच्छा करनेसे किसो समयमें विश्वका (सरसो०) १ जगत्सम्बन्धीय कथा १२ सभी मो यन्तहित और प्रादुर्भूत हो सकती है। इसके बाद यात... ... ... . .. उन्होंने अपने प्रतिविम्य ( अपनी देवकान्ति )के अय- विश्वकद (स.पु०) १ मृगयाकुशल कुपकुर, शिकारी लम्यासे किन्नर किन्नरोको सृष्टि को। पीछे सृष्टिकी कुता। शाद, ध्यान । : (लि०) ३ खल, दुष्ट। थोर विवृद्धि न देख भगवानने फोधरागादियुक्त भोगदेह विभ्यकर्त ( स० वि०.) १ जगत्नया, जगत्पति, जग- परित्याग कर दी। इस देसे जितने पाल जमीन दोश्वर । (मागपत १०iv८):(पु.) २. बौधायन- पर पतित हुए, उनसे सपों की उत्पत्ति हुई। ... सूत्रानुयायि-पद्धतिके प्रणेता। सस्कार-कौमुदी इस. इन सबको सृष्टि हो जाने के बाद स्वयम्भु स्वयमात्मा का उल्लेख है। . . को मन्यमान.समझने लगे। उस समय अपनो देह और विश्वकर्म ( स० वि०). सर्पकर्मक्षम, जो सब प्रकार के पुरुषकार अर्पणमें मनके द्वारा मनुओं की सृष्टि की। इस कार्य करने में धतुर हो। ( भृक् २०११६६।४): . से देवगण ब्रह्माकी भूयशो प्रशसा करने लगे। क्योंकि विश्वकर्मा (स. ना.) विश्वकर्मणः जायते विश्व- उन्होंने सोचा, मनुओं द्वारा अग्निहोनादि अनुष्ठित होने | कर्मन जन-८ । सूर्यको पत्नी, संहा। . पर वे हविर्भागादि भक्षण कर सकेंगे। इसके बाद तथा विश्वकर्मसुता (स. स्त्री विश्वकर्मणः -सुता।- सूर्य- उपासना, योग और. वैराग्यैश्वर्ययुक्त समाधि-सम्पन्न - पत्नो, हा( शब्दरत्ना० ). . .. . पियोंको ष्टि हुई। इनमें प्रत्येकको भी भगवान्ने विश्वकर्मन (म.पु.), विश्वेषु कर्म यस्य ।। १ सूर्य । अपनो देहका अंश दिया। विस्तृत विवरण जगत्. मौर २ देवशिल्पी, एक प्रसिद्ध आचार्य अपदा देयता जो पृथ्वी शब्दमें देखो। ... . सब प्रकारफे शिल्प-शास्त्र के आविष्का और सब । २ सोंठ। पर्याय-महोपध, सौर, नागर विश्व हाता माने जाते हैं। पर्याय-स्वष्टा विश्वकृत, देव भेषज्ञ। (रत्नमाला) शृङ्गवेर, कटुमद, उपण। (भाव) वर्द्ध कि। (हेम ) . . . . ३.योल, गन्धयोल, निशादल। (पु.) ४ गणदेवताविशए। , मत्स्यपुराणमें लिखा है, कि विश्वकर्मा प्रभासके: