पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७१४

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विवयस्-विश्वविद्यालय विश्वयस ( स० पु०) विभेद । ( तैत्तिरीयस० ६६४) विश्वविख्यात ( सं त्रि. ) जगद्विरुपात, सर्वान्न प्रसिद। . विश्ववर्मन्-- कुमारगुप्त के अधीन मालवके एक सामन्त । विश्वविजयो (स० वि०) सर्वत्र जयशील । - ४८० ई०को गान्धारराज्यमें उत्कीर्ण इनकी शिलालिपि विश्वविद् (म त्रि०) १ सर्यशता लाभ करनेमें समर्था । मिलती है। (अक १११६४:१० सायपा.) २ सर्व। . ३ सर्व विषयक . विश्ववर्णा (स खो०) भूम्यामलको। भुरआंवला! ज्ञापक, जो विश्वकी सब बातें जानता हो, यहुन धडा - विश्यवलिन् ( स० वि०) सब प्रकारके विषय जानने में पण्डित। (भृक् ६७०६ सायण ) ४ ईश्वर । । समर्थ। विश्वविद्यालय-जिस विद्यालयमें बहुत दूरसे छात्र मा विश्वयहु ( स० वि०) १ विश्ववहनकारी। परमेश्वर । कर ऊची श्रेणीको विद्याशिक्षा प्राप्त करते हैं, उसीको विश्ववाच ( स स्त्री०) ईश्वर । (हरिवंश २६६ म० ) विश्वविद्यालय कहते हैं । यह "विश्वविद्यालय" शब्द इस विश्शयाजिन् ( स० पु०) यहाश्र, यज्ञका घोड़ा। : समयको रचना है। सच पूछिये, तो यह अगरेजी Uni (हरिवंश १६४ १०) - rersity का ठोक अनुवाद है। क्योंकि ५०/६० वर्ष : विश्ववार (स' नि) १ विश्वधारक, ससारनिवर्तक । पहले भारतवर्ष में यह शब्द प्रचलित नहीं था। बहुत . २ सभी व्यक्तियों का पूजनीय । (ऋक १४८१३ ) स्त्रियां दिनोंसे भारतवर्णमें "परिपद" (Council of education) टाप। (पुं० ) ३ यशोयसोमका संस्कारविशेष। ! नामक एक स्वतन्त्र पदार्थ था, उससे हो वर्तमान विश्व (शुक्लयजुः ७/१४ वेददोप) विद्यालयका कार्य परिचालित होता था। . उपनिषद में विश्वधारा (सस्त्रो० ) अतिगोत्रकी नो । पे ऋगवेदके | हम ऐसे परिपदोका उल्लेख देखते हैं। भारतवर्षक ५म मण्डल-२८ चे सूककी १मसे ६ष्ठ ऋक्को पि थीं। अन्तर्गत काश्मीर देशमें सर्वाप्रथम परिषद् या घेदाध्या- इन ऋों में इनका विषय यों लिखा है,- . .पनाकी ची सभा प्रतिष्ठित हुई थी। शाङ्कापन- ___ "अग्नि प्रज्वलित हो कर आकाश में दीप्ति फैलाती हैं। ब्राह्मण में इसका आभास इस तरह पाया जाता है, और ऊपाके सामने विस्तृतभावमें प्रदीप्त होती हैं, विश्व ___qध्यावस्तिकदीची दिशं प्राजानात् । वागबै पक्ष्या. . वारा पूर्वाभिमुग्यो हो कर देवताओंका स्तव करतों और स्वस्तिः। तस्मादुदीच्यां दिशि प्रज्ञाततरा बागुधने । हध्यपाल ले कर (अग्निकी ओर ) जाती है। है . उदचे उ एव यान्तिध्याच शिक्षितु । यो वा तत अग्नि! तुम सम्मापसे प्रज्वलित हो कर आगच्छति तस्य वा शुश्रू पन्ते इति स्माह। पषा दि अमृतके ऊपर आधिपत्य करो, तुम हव्यदाताका वाचो दिकाशाता।" ( शास० प्रा० ७.६). . कल्याण करने के लिये उनके समीप उपस्थित रहो। तुम भाष्यकार विनायक भट्टने लिखा है-"प्रशाततरा या. . यजमानके पास पर्शमान हो, उन्हें प्रचुर धनलाभ गुद्यते काश्मीर सरस्वती कोलते। यदरिकाश्रमे वेद- हो और तुम्हारे सामने वे अतिथियोग्य हव्य प्रदान | घोपः श्रूयते । पाच शिक्षितु सरस्वती प्रासादामुदचे।" करें। हे अग्नि! हम लोगोंके विपुल ऐके लिये | __ सुतरां भाष्यानुसार उक्त ब्राह्मणांशका इस तरह मनु शानुगौका दमन करो। तुम्हारी दीप्ति उत्कर्ण लाभ करे, वाद किया जा सकता है-"पध्यास्वस्ति उत्तर दिशा . तुम दाम्पत्य सम्बन्ध सुश्खलाबद्ध करो और शवओक | अर्थात् काश्मार देश जाना जाता है। पथ्यांस्वस्ति हो । पराक्रमको स्वर्ग कर डालो। पाक अर्थात् सरस्वती है। काश्मोर ही सारम्बत स्नान विश्वयार्थ ( स० वि०) विश्वकार i (ऋक ८१६१५) कहा जाता है। लोग भी इसोलिये काश्योरमें विद्या . विश्वास (स.पु.) १ सर्वालाककी भावासभूमि ।। शिक्षा करने जाते हैं। प्रवाद है, कि जो लोग उसं २ जगत्, संसार। .. दिशासे आते हैं, सभी "चे कहते हैं" यह कह कर उनके विश्वयाहु ( स० पु० )१ महादेव । (भा०.१२११५८)। (उपदेश ) सुननेकी इच्छा करते हैं। क्योंकि वहां हो विष्णु। (मा० १२१ विद्याका स्थान है, ऐसा प्रसिद्ध है। Siv