पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७३८

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विप रङ्गका होता है। यह दीप्तिशील और अग्निकी तरह शरीर उपचायक और वीर्ययक होता है। प्रभाशाली है। इसके सेवनसे अत्यन्त दाह उत्पन्न मिशुद्ध विष अहितकर है -इस विपके जो सव अनिष्ट- होता है। सौराष्ट्रिक-मुराष्ट्रदेश उत्पन्न सभी तरह के जनक तीव्रतर गुण वर्णित किये गये हैं, शुद्ध करनेसे विप। ङ्गिकविष-इस विषको गायके सींगमें बाँध वे होनवीर्य हो जाते हैं। सुतरां विषप्रयोग करनेसे देने पर गोका दूध लाल रंगका हो जाता है। कालकूट--- पहले उसको शुद्ध कर लेना चाहिये। प्राचीन समयमें देवासुर युद्धौ पृधुमाली नामक एक विषका शोधन-विष ( टुकड़ा टुकड़ा काट कर ) दैत्य देवके दाधसे मारा गया। उसका .रक्त पृथ्वीमा तीन दिनों तक गोमूत्रमें रख छोड़ना होगा, पीछे उसका जब पड़ा, तब उससे पीपल वृक्षको तरह एक छिलका निकाल कर फेंक देना चाहिये, पोछे शुष्क करने. विषाक्ष उत्पन्न हुआ। उसी वृक्षके निर्यासको के बाद लाल मा के बाद लाल सरसोंके तेल में मिगे कपड़े में बांध कर नेलो free मनिगण कालकूट कहते हैं। यह वृक्ष शृङ्गयेर और तीन दिन तकरणनेसे विष शुद्ध हो जाता है। कोकणप्रदेशों के खेतो में उत्पन्न होता है। हालाहल- · विपके सिवा कई उपविषोंका भी उल्लेख है।यहरका. इस घिपवृक्षके फल मंगूरकी तरह एक ही गुच्छेमें। । दूध, मनसाका दूध, इपलांगला, करयोर, च, अफाम, कितने ही फलते हैं। इसका पत्ता ताड़के पत्तेकी तरह ) धतूरा और जयपालयोज-पे सात उपयिष हैं। होता है और इसके तेजसे निकटके वृक्ष जल जाते हैं। इनके गुणागुण इनके नामकी विवरणीमें देखो। किष्किन्ध्या, हिमालप, दक्षिणसमुद्र किनारेको भूमि और कोंकण देशमें इस हलाहल विषका वृक्ष उत्पन्न होता घेधक प्रन्यादिफे विपाधिकारमें स्थावर और जङ्गम. भेदसे विष दो तरहका है। उनमें स्थावर विपके माध्य. है। ग्रह्मपुत्र -यह विष कपिलया मोर सारात्मक है। यह मलयपर्णत पर उत्पन्न होता है। स्थान दश हैं और जङ्गमफे सोलद हैं। ग्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूदके भेदसे यह विप भी स्थायर विपके दश आश्रय स्थान इस तरह हैं- चार तरहका होता है। उनमें पाण्डवाका विष ब्राह्मण, मूल, पत्र, फल, पुष्प, त्यक, क्षीर, सार, निर्यास, धातु रक्तवर्ण विप क्षत्रिय, पीतवर्ण विष वैश्य गौर कृष्णवर्ण और कन्द । पृशफे इन दश अंशोंका आश्रय कर स्थावर विष भाद्वजातीय है। ब्राह्मण जातीय विप रसायन कार्या विप विधमान रहता है। उनमें मूल-विष करयोरादि । में, क्षलियजातीय विष:पुष्टि विषयों और चैश्यजातीय पत्र-विष विपपत्रिकादि, फलविय कोटकादि, पुष्प-विप कुष्ठ निवारणके लिये प्रशस्त है। शूद्रजातीय विष पेलादित्यक, सार गौर निर्यास विप फरण्डादि, क्षीर- विनाशक है। विष मनसासिज आदि, धातुविष हरताल गादि और निषका गुणागुणा कन्दपिप घरसनामादि हैं। साधारणतः विषका गुण-प्राणनाशक और व्यवाया जङ्गम वियक १६ माध्यस्थान इस तरह हैं- अर्थात् ,पहले विषका गुण सारे शरीरमें प्यक हो कर दृष्टि, निश्वास, दष्ट्रा, नख, मूत, पुरीप, शुक्र, लाला पीछे परिपाक होता है। विकाशी. अर्थात् इसके द्वारा | आर्शव, एपर्श, सन्दंश, अवशति ( वातकर्म ), गुह्य, सहसा भोजोधातुका शोषण और सन्धियन्धन सय | मस्थि, पित्त और शूक । दिष्य सर्पको दुष्टि गौर टीले हो जाते हैं। यह अग्निवर्द्धक, धातन और कफ निश्वासमें,, ध्याघ्र सादिके काटने और - नखोम, नाशक है। योगवाही अर्थात् जिस द्रव्यमें यह मिलाया | छिपकली आदिके मूल और पुरोपमें, चहै भादिके. शुक्र- जाता है, उसके गुणका प्राहक और मत्तताजनक, अर्थात् में, उचिरिबादिक लालामें, चित्रशीर्षादिके लाला, स्पर्श, तमोगुणाधिष्यके कारण घुद्धिविनाशक है। यह विष मून, पुरोप, मार्शव, शुक्र, मुखसदष्ट्रा भातकर्म और विधेयनाफे साथ उपयुक्त मात्रामें सघन किया जाये, तो गुह्यमें, सादिकी हद्दों में, शकुल मत्स्य आदिके पित्त यह प्रापारक्षक, रसायन, योगवाही, लिदोषनाशक' भीर भ्रमर मादिके शूकमें विष रहता है ।