पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८०

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६८० विपुपरेखा पूर्ण होकर तेईसवां अयनांश बारम्भ होगा तथा उस इस ज्योति पधमे पृथियों के एक घूमने में ३६५ शकफे चैत्र मासको ८वीं तारीखको विपुय मारम्भ हो, दिन लगता है। यही यार्षिया गति है, इस कारण ! कर उस दिन दिवा और रातिका मान समान देखा| इसको एक वर्ष कहते हैं । घर्षके भीतर उत्तरायण और जायेगा । ' अर्थात् उस समय पछी काल यिपुव' निर्दिष्टं दक्षिणायण समयक्रमसे इस यिपुपरेम्बाके, उत्तरसे होगा। दक्षिण तथा दक्षिणसे उत्तरकी गोर पृषियोको गति : विपुवरेम्मा (स. स्त्री०) पिपुर्वः समरालिन्दिय कालो बदलती रहती है, जिससे संसारमें छ: ऋतुओंका.मावि. यस्यां रेखायो सा। जयोतिपके कार्यके लिये कल्पित पक र्भाव होता है। इसी कारण इस कल्पित रेखाक २३ रेखा जो पृथ्यो तल पर उसके ठीक मध्य भागमें बड़े ४६५ सिप्रो उत्तर तथा २३:४६५. डिग्री दक्षिणं मौर पलमें पा पूर्व-पश्चिम पृथ्वीफे चारों ओर मानी जाती मो.दो छोटे वृत्त कल्पित हुए है। उनमेसे उत्तरो..पृतका , है । यह रेना दोनों मेरुमोके ठोफ मध्यमें और नाम कर्कटकान्ति ( Tropic.of cancer) है। सूर्यदेव : दोनोंसे समान अन्तर पर है। इस रेखाके उत्तर मेप, | कभी भी उत्तमें कर्कटकांन्ति, और दक्षिण में मकरः । वृष, मिथुन, कर्कट, सिंह और कन्या पे छ. राशि तथा क्रान्तिको सीमा पार नहीं करते । जब सूर्म विपुयरेखा- दक्षिण गोर तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मोन के उत्तर कर्कटफ्रान्तिको थोर रहने हैं, तब विपुवरेखाके .. ये छः राशि तिर्याकभावसे वृत्ताकारमें राशिचके ऊपर उत्तर दिन यदा और रात छोटी होती है। फिर जब अवस्थित हैं। राशिचक्र देखो। सूर्य विपुपरेखा दक्षिण जाते हैं, तथ उत्तरी देशीम . "प्राक पश्चिमाभिता रेखा प्रोच्यते सममपटमम् । दिन छोटा और रात वही होती है । इस दक्षिण भागमे . उन्मपदलञ्च विषुवन्मपहानं परिकीर्तितम् ॥ उसका ठीक विपरीत भाव ही दिखाई देता है । जब (सिद्धांतशिरो०) सूर्यकिरण विपुपरेवाके उत्तर लम्ब भायमें पड़ता है। पाश्चात्यमतसे पृथिवीके मध्यस्थल में पूर्व-पश्चिम- सब दिन और रात्रिका मान समान होता है तथा सूर्ण.... को और विस्तृत जो कलिगत रेखा है, यही विषुव रेखा किरण बहुत प्रपर रहती है। इसी कार-1 उस समय । है। इसका दूसरा नाम निरक्षत्त है अर्थात् इसकी उत्तर और दक्षिणकान्तिके मध्यवर्ती देशयामो शीत , . डिप्रोका चिह्न है । नभोदेशमें इस प्रकार कल्पित गृत्तफे और प्रोप्मको समता अनुभव करते हैं। सूर्यदेव विपुष. ऊपरसे तिकभायमें पूर्व से पश्चिमको ओर सूर्यको रेखाको अतिकम फर कर्करकान्तिको मोर ज्यों हो जाते . प्रत्यक्षगतिपथ या रधिमार्ग ( line of the aliptic), है , त्यों ही उत्तरो दिशामें प्रीष्मका प्रादुर्भाव होता है . . अवधारित है। सूर्य देखो। तथा उसके विपरीत यिपुवके दक्षिणस्थ मंकरकान्ति । सन्निहित देशों में शीतका प्रकोपं पढ़ता है। . सूर्णदेव जब विपुपरेखासे उत्तर या. दक्षिण ९० में १३०६ सालके भारम्भमें अर्थात् १३०५ सालकी ३० वीं चैत्र | आते हैं, तब ययाम हम लोगोंके देशमै प्रीष्म और शीतं । . महाविधुवर्मक्रांतिके दिन पाईसवा अयनारा भारम्भ हुमा है। को तथा दिया और रात्रिको वृद्धि या हास होती है। इसीलिये अभी देखा जाता है, कि उक्त १८२१ राफकी १लो । उन दोनों स्थानोंको Summer Solstice और Winter वैशाखसे जप तक ६६ वर्ण ८ मास पूरा न होगा, तब तक! Solstice कहते हैं। जब सूर्य उत्तर ६० से धीरे धीरे माईमा अयनारा रहेगा। इस कारण (१८२१+६६८मास) १८० में फिरसे पिपुवरेखाको समसूत्रपातमे अर्थात् . . १८५७ शक उत्तीर्ण हो कर १८८८ राकके ८ मास अर्थात् विपुपरेखाके ऊपर रहते हैं, तव शारदीयः समदिवारानि अगहाया पर्यन्त बाईसवे' भयनको अवस्थिति होगी। (यह autumnal cquinox) तथा यहांसे दक्षिण २७० । दिनका वर्ष मान फर यह गयाना की • गई, ३६५ दिनका वर्ष माननेसे और भी २।१मास तक यह भयनारा ठहर सकता है i). J... ३६५ दिन ६ घंटा ।. . .. ... ... ...'