पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८५

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विष्ठामुक-विष्णु किया जाता है, उस जालको छूना नहीं चाहिये। छूनेसे । विष्णु ( स० पु०) १ अग्नि । २ शुद्ध । ३ यसुदेवता । यह जल मूत्र के समान हो जाता है। वह जल पीनेसे | ४ बारद आदित्यों में से एक । (महाभारत १६६५१६) ५ धर्म- चान्द्रायण करनेकी व्यवस्था है । ( माहिकतत्त्व ) शास्त्र के प्रणेता मुनिविशेष। . • मलमूत्रत्यागफे वाद जल और मिट्टीस शौच कर हिन्दुओं के एक प्रधान और बहुत बड़े देवता जो पीछे जलपात्रको गोमय या मृत्तिका द्वारा मार्जन और सृष्टिका भरण-पोषण और पालन करनेवाले तथा ब्रह्मा. • प्रक्षालन करे। इसके बाद जल स्पर्श कर चन्द्र, सूर्य का एक विशेषरूप माने जाते हैं। "वृहत्याद्विष्णुः" या अग्निदर्शन करना होता है। जहां जलादि शौच होता (महाभारत १७०६३) है, यहां पवित्र जलादि द्वारा परिष्कार कर देना होता विष्णुपुराणमें विष्णु शब्दको व्युत्पत्ति और भी है। नहीं तो उसका गौत्र सिद्ध नहीं होता। विस्तृत देखी जाती है। ____ भावप्रकाश लिम्बा है, कि मानवगण स्वास्थ्यरक्षाके *यस्मादिश्यमि सर्व तस्य शक्त्या महात्मनः । लिये ब्राह्म मुहती उठे और भगवन्नाम स्मरण कर ऊपा तस्या देवोच्यते विभर्विशधातोः प्रवेशतात् ॥" कालमें ही विष्ठा मोर मूतत्याग करें। इस नियमका | (विष्णपु०) प्रतिपालन करनेसे अन्वफूजन अर्धात् पेटका वोलना, संस्कृत साहित्यमें "विष्णु" शब्दका बहुल प्रचार , आध्मान भार उदरको गुरुता उपस्थित नहीं हो | देखा जाता है। घेद और उपनिषद्में, इतिहास और सकती। मलमूत्रका चंग दोनेसे कभी भी उसको रोकना । पुराणमें, सांहिता और काव्यमें सभी जगह विष्णु शब्द- नहीं चाहिये, रोकने से पेट गुड़ गुड़ करता, तरह तरह का विपुल व्यवहार देखनेमे आता है। परन्तु हम को वेदना होती, गुहादेशमे जलन देतो, मल रुक जाता, यहां सिर्फ वेदमें व्ययहत "विष्णु" शब्दको आलोचना अध्यात हाता तथा मुम्न द्वारा मल निकलता है। करते हैं- मलादिका घेग जिस प्रकार रोकना उचित नहीं, उसी ! १। अतो देव अवन्तु नो यतो विष्णु धिक्रमे प्रकार घेग नहीं आने पर बलपूर्वक अकालकुन्धन द्वारा पृथिव्याः सप्तधामभिः। १म २२ सू १६ ऋक् । निःसारण करनेकी चेष्टा करना भी अनुचित है। सामवेदसंहितामे २२१०२४ मन्त्रमें यह ऋक् देखा मलमूत्रादि विसर्जनके बाद गुह्य आदि मलपोंको जाती है। किन्तु सामवेदमें जो पाठ है, उसमें कुछ जलसे धो डालना चाहिये। इससे शरीरको कान्ति पृथकता है। वहां "पृथिव्याः सप्तधामभिः" को जगा पढ़ती, श्रमनाश होता, शरीरकी पुष्टि होता और चक्ष की | "पृथिया अधिसानभिः" पाठ देखा जाता है। ज्योति बढ़ती है। ( भावप्र० पूर्व ख०) २२ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । भूमिकी उरिता बढ़ती है, इस कारण बहुतेरे लोग समूढमस्य पांशुरे। ( सामवेद १८ म०) 'स्नेत या उद्यान विष्ठा और गोवरको सड़ा कर खादके रूपमें देते हैं । कृषिविद्या देखो। अथर्ववेदमे १२६०५ मन्त्रमें भी यह साम देने में भाता है। विष्ठाभुक (सं० पु. ) शूकर, सूगर । ३. लोणि पदा विचक्रमे विष्णुगोपा अदाभ्यः । विष्ठाभुशी (सं० पु० ) शूकर, सूभर । 'विष्ठाभू (सं० पु० ) विष्ठायां भयतीति भू-फ्यिप । विष्ठा- अतीधर्माणि धारपन् । ( वाजसनेय ३४१४३ ) जात कमि, यह कीड़ा जो पैखानेसं पैदा होता है। अथर्ववेद ७।२६।५ मन्त्रमें भी यह सामवेदोक्त मन्त्र 'विष्ठावाजिन् ( स० वि० ) विष्ठायां प्रजति विष्ठा बजः | उद्धृत हुआ है। णिनि । विष्ठामें भ्रमणकारी, मलमे रहनेवाला। ४. विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो प्रतानि पस्पर्श । । (शतपथबा० शश१२) ., इन्द्रस्य युज्यः सखा । ( अथर्ववेद ७२६६) विष्णापु (स. पु०) विश्वक ऋषिके पुन । ___५ नदु विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । (ऋक २।११६२३)। दियोव चाराततम् । . . . . vol. xxi. 172