पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/७८७

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विष्ठाभुक-विष्णु ६८५ .:, किया जाता है, उस जलको छूना नहीं चाहिये। छूनेसे । विष्णु ( स० पु०) १ अग्नि । २ शुद्ध । ३ यसुदेवता । यह जल मूत्र के समान हो जाता है। यह जल पीनेसे | ४ बारह आदित्यों में से एक । (महाभारत १।६।१६) ५ धर्म- चान्द्रायण करनेकी व्यवस्था है। ( हिकतत्त्व) । शास्त्र के प्रणेता मुनिविशेष । ___ • मलमूत्रत्यागके वाद जल और मिट्टी से शौच कर हिन्दु के एक प्रधान और बहुत बड़े देवता जो पीछे जलपात्रको गोमय या मृत्तिका द्वारा मार्जन और ! सृष्टिका भरण-पोपण और पालन करनेवाले तथा प्रला.

-प्रक्षालन करे। इसके बाद जल स्पर्श कर चन्द्र, सूर्य का एक विशेषरूप माने जाते हैं। "वृहत्याद्विष्णुः"

या अग्निदर्शन करना होता है। जहां जलादि शौच होता (महाभारत ५५७०१३) • है, यहां पवित्र जलादि द्वारा परिष्कार कर देना होता विष्णुपुराणमें विष्णु शब्दको व्युत्पत्ति और भी ' है। नहीं तो उसका शौच सिद्ध नहीं होता। विस्तृत देखी जाती है। .. भावप्रकाशमे लिखा है, कि मानवगण स्वास्थ्यरक्षाके “यस्माद्विश्वमि 'सर्व तस्य शक्त्या महात्मनः । लिपे ब्राह्म मुहती उठे गौर भगवन्नाम स्मरण कर ऊपा तस्या देवोच्यते विष्णुर्विशधातोः प्रवेशतात् ॥" कालमें ही विष्ठा मोर मूत्रत्याग करें। इस नियमका (विष्यापु०) प्रतिपालन करनेसे अन्नकूजन अर्थात् पेटका योलना, संस्कृत साहित्यमें "विष्णु" शब्दका बहुल प्रचार आध्मान और उदरको गुरुता उपस्थित नहीं हो | देखा जाता है। येद और उपनिषद्में, इतिहास और सकती। मलमूत्रका वेग होनेसे कभी भी उसको रोकना पुराणमें, साहिता और काव्यम सभी जग६ विष्णु शब्द. ..नहीं चाहिये, रोकनेसे पेट गुड़ गुड़ करता, तरह तरह का विपुल ध्यपहार देखनेमे आता है। परन्तु हम की वेदना होती, गुह्य देशमै जलन देती, मल रुक जाता, यहां सिर्फ घेदमें ध्यवाहत "विष्णु" शब्दको आलोचना ऊर्ध्ववात हाता तथा मुख द्वारा मल निकलता है। करते हैं- मलादिका वेग जिस प्रकार रोकना उचित नहीं, उसी। १। अतो देघ गवन्तु नो यतो विष्णु र्यिक्रम प्रकार घेग नहीं आने पर बलपूर्वक कालकुन्धर द्वारा पृथिव्याः सप्तधामभिः। म २२ सू १६ ऋक् । निःसारण करनेकी चेष्टा करना भी अनुचित है। सामवेदसंहितामें २०१०।२४ मन्त्रमे यह ऋक् देखो मलमूत्रादि विसर्जनके बाद गुह्य आदि मलपोंको जाती है । किन्तु सामवेदमे मो पाठ है, उसमें कुछ 'जलसे घी डालना चाहिये। इससे शरीरको कान्ति पृथकता है। यहां "पृथिव्याः सप्तधाममा" को जगा यढ़ती, श्रमनाश होता, गरोरकी पुष्टि होता और चक्ष को । "पृथिया अधिसानभिः" पाठ देखा जाता है। ज्योति बढ़ती है। ( भावप्र० पूर्वख० ) २। इदं विष्णुर्घिचक्रमे ने धा नि दधे पदम् । भूमिकी उरिता बढ़ती है, इस कारण यहुतेरे लोग समूढमस्य पांशुरे । ( सामवेद १८८०) ग्वेत या उद्यानमे यिष्ठा और गोवरका सड़ा कर खादक रूपमे देते है। कृषिविद्या देखो। अथर्यवेदमें १२६।५ मन्त्रमें भी यह साम वन में माता है। विष्ठाभुक (सं० पु०) शंकर, सूअर । ३॥ त्राणि पदा विचममे विष्णुगौंपा सदाभ्यः । विष्ठाभुशी (सं० पु०) शूकर, सूगर । विष्ठाभू (सं० पु०.) मिष्ठायां भवतीति भू-फिया । विष्ठा- तो धर्माणि धारयन् । ( वाजमनेय ३४१४३) जात कमि, यह कीड़ा जो पैखानेसे पैदा होता है। । । . अथर्ववेद ७१२६।५ मन्नमें भी यह सामवेदोक्त मन्त्र विछामाजिन् ( संत्रि. ) विष्ठा व्रजति विमान उद्धृत हुआ है। णिनि । विष्ठामें भ्रमणकारी, मलमें रहनेवाला। ' ४। यिष्णोः कर्माणि पश्यत यतो. प्रतानि पस्पर्श । (शतपथवा० ॥१॥१२) इन्द्रस्य युज्यः सखा । ( अपवेद ७२६६) यिणापु ( स० पु० ) यिभ्यक ऋषिके पुर। . ५तइ विष्णोः परमं पदं मदा पश्यन्ति सूरयः । दिघोष वझराततम् । . . . Vol.xxi. 172 __. (ऋक १।११६२३)।