पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८०३

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विषापुर ७०३ माज भी छोटेके घर उस मम्पत्तिका भोग करने की थी। बहुसंख्यक जलाशय और विष्णुपुरके अनेक बांध तथा कितने मन्दिर उन्हीं की कोशिघोषणा करते है। • विष्णुपुर-राज के इतिहासमें गजाओं द्वारा देव- इस राजवंशके चैतन्यसिह नामक एक राजा मूर्ति स्थापन या पुकारण्यादि खनन कीर्शिका परिचय १८यों सदी में जीवित थे। राजकार्य में उनकी अच्छो हो विशेषरूपसे दिया गया है। कोई कोई राजा बाणिज्य प्रसिद्धि थी। उन्होंने इट इण्डिया कम्पनीसे यांकुड़ा की वृद्धि द्वारा, काई युद्धविप्रहादि मौर दुर्गनिर्माण द्वारा जिलेके जरीप महल्लेका दशशाला बन्दोवस्त किया था। नया कोई राजधानी में भिन्न स्थानगत लोगोंफो म्नान । अभी उनके लड़कोंकी अमितव्ययिताके कारण वद दान द्वारा राज्यको यथेष्ट उन्नति कर गये हैं। राजः ! सम्पत्ति न हो गई है, यहां तक कि वाकी राजस्व में सिंहासन पर संघल पडेलए हो येठते थे। राजाके सरकारने उसका अधिकांश जब्त कर लिया। अन्यान्य पुत्र राजसम्पत्तिसे भरणपोपपोपयोगी धार्षिक ! प्रवाद है, कि राजा दामोदर सिंहने अर्धाभावप्रयुक्त वृत्ति या जमीन पाते थे। बङ्गालके मुसलमान राजा मदनमोहन विग्रहको कलकत्तानिवासी गोकुलचन्द्र या शामन मौके जमानेका इतिहास पढ़नेमे मालूम मित्रके यहां एक लाख रुपये में बन्धक रखा था। सुप्रसिद्ध होता है, कि यह राजवश कभी मित्ररूपमें, कभी शत्र - मदनमोहन मूर्त्तिके इस प्रकार दूसरी जगह आने पर रूप, कमी करद राजारूपमें मुसलमान नवावके माथ नगर क्रमशः श्रीहीन होता गया तथा गलाको भी ममकक्षतासे राज्यशासन कर गये हैं। यथा में आर्थिक अवस्था शोचनीय हो गई। इसके कुछ दिन मुर्शिदाबादफे नयाघ दरवारमैं उन्हें कभी माना। बाद हतभाग्य राजाने बढे कष्टसे अर्थसंग्रह करके पडता था। ये अरेज कम्पनीकी तरह नयाव-दरवारमें विप्रहमुक्तिको आशासे अपने मन्त्रीको कलकत्ता भेजा। प्रतिनिधि द्वारा सभी कार्य कराया करते थे। मिन महाशयने रुपये तो ले लिये पर राजाको विप्रह इस राजवशके पचासवें राजाने १६३७ में । लौटा नहीं दिया। सुप्रिमकोर्ट में इसका विचार हुआ। ( ६२२ मल्लान्द ) वगत 'मर'को उपाधि राजाको उक्त विप्रहको पुनःप्राप्तिका अधिकार मिला। परित्याग कर क्षत्रिय राजाओंको चिरपरिचित मिह गोकुलचन्द्रने ठोक पैसी हो एक दूसरो मूर्ति बना कर उपाधि प्रहण का नया परवत्तों गजगण उसी मिह राजाको दो मोर मूलमूर्ति अपने घर रखो। लोगों का पालिसेवावित होते । वो सटीमें इन रान विश्वास है, कि कलकत्ता बागवाजारमें जो मदनमोहनको वशधरोंकी उत्तरोत्तर अवनति होने लगी। मराठोंने मूर्ति है यही विष्णुपुरको प्रसिद्ध मदनमोहन है। लगातार विष्णुपुरराज्यको लूट कर राजाओं को नि:. माचीन कीर्ति । सहाय कर दिया। इसके बाद १७७०१०में यहां दुर्मिक्ष विष्णुपुर प्राचीन नगर है। बहुत से मन्दिर और उपस्थित हुमा जिसमे अघियासिगण विष्णुपुरराज्य- प्राचीन भग्नावशेष उसका प्रमाण है। ये सब मन्दिर को छोड़ अन्यन्न नले गपे। इस प्रकार पार वार सङ्कट साधारणतः निम्नवग में प्रचलित गम्बूजाकृति वक्रछतसे मा पड़नेमे प्राचीन और समृद्ध विष्णुपुरराज्य धोहोन। प्रथित हैं। ऊपरी भागमें उतना कारकार्यादि नहीं है, हो गया। आखिर अइरेजशासतकी कठोरतासे ऋण.. केवल गानमें 2 और सालों के ऊपर ही सोदितशिल्प भारकिए गौर नाना विपनालमें बिजडिन मधस्तन का निदर्शन मिलता है। अनेक कारकार्य सुन्दर है राजवंशधर जमोदारोंका पकदम अधःपतन हो गया। और माज तक खराव नहीं हुए हैं। दोधारको कारुका यधार्य में ममा अङ्करेजाश्रय में यही करद राजवशघर | रामायण और भारतीय युद्धविवरणको माध्यायिकाके सामान्य जमोदाररूपमे ही विद्यमान हैं। . आधार पर चित्रित है । अधिकांश मन्दिर कृष्ण या राजा आदिमल्लके वशवा राजा पोरसिहने (१६५० | कृष्णप्रियाके नाम पर उत्सर्गकिये गये है। भास्कर कार्या ६०में ) अनेक स कार्य और दानकै कारणसे ख्यातिलाम | देखनेसे उतना सुरुचिसङ्गत मालूम नहीं होता। इस