पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८१

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• वातम्याधि • कोई कोई चिकित्सक फूली हुई गांउमें जोक लगाने- जफ पा एनोडाइन औषध ( कारफर मोपिलाई. घेलेडोना को सलाह देते हैं। किन्तु उमको उतनी आवश्यकता| या एकोनाइट लिनिमेण्ट) मालिश कराना उचित है। . नहीं। पीड़ित स्थानमें नाईटर चा पापिहेड फोमेन्टशन | आभ्यन्तरिक भोपों से पोट शी आइमोसिस, कहलि. करें। वेलेडोना वा शोपिआई लिनिमेण्ट मर्दन अथवा | भार भायल, फेरि माइमोडाइड, गंधक, सार्जा, टिं एक: अफीम या वेलेडोनाको पाल्टिश देनेसे वहुन लाम पहुँ। टिया रेसिमोसा और गोयेकम आदि प्रयोग करने चता है। पाई कोई पीड़ित गांउको स्शलिसिलेट | पोग्य है। समय समय पर गांठ पर ब्लिटर किंवा रिं .आय सोडा लोसनसे मिगाते रहनेका परामर्श देते हैं। आइडिन्का प्रलेप दिया जाता है। एमप्लाष्ट्रम पमोनिया- दूसरे दूसरे प्रत्यकार उसके ऊपर फोलडकाम्प्रेस देनेको कम् या मार्किवारियल प्लायर द्वारा गांठ पर पट्टी बांधनी कहते हैं। पोड़ाके कम हो जाने पर गांठ के ऊपर लाइकर चाहिये। गांठ पर गंधक लगा कर उस पर पलानेल डेज पपिसपाप्टिकसमा लेप किंधा पमोनियाकम् सप्टर द्वारा वांधनेसे घेदना कम हो जाती है। कभी कभी अविराम देना नाहिये। गांठमें अधिक मवाद पैदा हो जाने पर | ताड़ित स्रोत देनेसे और शरीरको मालिश करनेसे वसा -एस्पिरेटर द्वारा उसे वहा देना उचित है। ज्यर तथा | फायदा पहुंचता है। रोगोको बीच योच घुमने फिरने. घेदनाके कम हो जाने पर कलियर आयल तथा टिंटिल का परामर्श देना चाहिये। यूरोपीय चिकित्सक लोग वावहार करे। - हारेरोगेट, भिचि आदि धातु मिला हुआ जल पीनेको . अप्रयाप्त पातरेग ( sub acute rheumatism ) । अनुमति देते हैं। . इस पातरोगमें एक या दो गांठे बहुत दिन पर्यन्त पेशिक यात (Nyalgia or muscular rheumatism) आकारत रह जाती हैं। कुछ कुछ ज्यरफे लक्षण भी पेशोके क्रियाधिश्के वाद अथया शोतल वाय वर्तमान रहते हैं। प्रन्थियों परिवद्धित या विकृत नहीं | संस्पृष्ट होनेसे पैगिक वात उत्पन्न होता है। यह रोग होती। एक सामान्य कारण पा कर मो घेदना बढ़ । प्रायः कृषक और दुर्वल खियोकोआ करता है। रात में जाती है। रोगोका स्वास्थय जिस तरह रहना चाहिये। अथया हठात् यद्द पीड़ा शुरू हो जाती है। पीडित उससे और भी घर जाता है। प्रवल वातरोगकी। पेशो वेदना और शाटना रहती है, छ्ने अथवा हिलाने चिकित्साके समान इसमें औपय आदिको वारस्था | डुलानेसे यह बढ़ता है । जवानी में उत्तापके साथ घेदना करनी चाहिये। . भी बढ़ती है। कभी कभी पेशी में स्पन्दन या साक्षेप 1. पुराना वानरोग। (Chronic Rheumatism.) उपस्थित होता है। रोगी पीड़ित अङ्गको स्थिरभावने सबराचर खुदोको दो यह वााधि होती है। यह रखना पसन्द करता है। कहीं कहीं पीड़ित पेशीको कभी कभी तरुण वातरोगके परिणामके फलसे उपस्थित धीरे धीरे दधानेसे आरामः मालूम पड़ता है। ज्वरक होता है। इसमें सभी गांठ मोटी कष्टी हो जाती है। सव लक्षण नहीं रहते; किन्तु अनिदा मौर वेदनासे तथा रोगीको चलने फिरने में बड़ा दर्द होता है। रात | रोगी थोड़ा सुस्त पड़ जाता है। फलेजे पर आघात तथा शीत भीर य समय पह घेदना और इसके समो, नहीं पहुंचता। घोड़े दिनों तक प्रवल अवस्था रहती लक्षण दिखाई पड़ते हैं। कमो कभी वृद्ध व्यक्तियोंकी गाठे] है। उसके बाद पुराना हो जाता है। मप्रवल अयस्पा. विकृत हो जाती है, उसे गांठयात ( RheumaticGout), में उत्ताप छ्नेसे वंदना घट जाती है, सहो पर यहाल- कहते हैं। . . . . | में वायु लगनेसे वह फिर बढ़ गाती है। यह पोड़ा पार इस रोगमें शरीरमें ठएटा लगाना उचित नहीं।। दार हो सकती है। . पलालेन भादि गर्म कपड़ा पहनना आवश्यक है। गर्म! कहीं कहीं इसके विविध नाम हैं शिरको पेगो या किस वाय तथा गंधक, नमक और क्षार आदि मिले | रोगामारन होनेसे फेफेनोरिनिया (Cephalodynia), मलमे स्नान कराना चाहिए । पोड़ित प्रन्यि पर कोई उत्त, गलेफे पेशी रोगामान्न होने मेरारमानिस (Torticolis)