पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८१८

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' विमुनिका चाहिये। इस जलकी आधं तोला माता आध घण्टे पर इन सब पयों में कागजी निवूका रस दिया जा सकता . पान करने वमन बन्द हो जाता है। सरमों पोस कर : है। पीडा सम्पूर्णरूपसे निधारित है। अधिक क्षधा पेट पर लेग देनेसे के बाद हो जाती है। और यमन होने से पुराने चावलका भात, मछलीका शोरया और रेगमें जो औषध बताई गई है, उनका भी प्रयोग किया । लघुपा द्रव्य सेचन करना चाहिये। जा सकता है । पेशाय करानेके लिये परकुच्चा, निषिद्धकर्म-सम्पूर्ण रूप से स्वास्थ्य लाभ न होने . हिमसागर या लाहाचूर नामक पत्तफा रस एक तोला ! तक किसी तरहका गुरुपाफ द्रष्य, घृत पा घृतपपव मावासे सेवन कराना चाहिये । पथरकुच्चाका पत्ता भोजन, मैथून, अग्नि और धूप, व्यायाम या अन्याग्य और सोरा पकन पीस कर पस्तिंप्रदेशमें भी प्रलेप करने । श्रमजनक कार्य न करने चाहिपे। पहले ही कहा से पेशा । उतरता है। हाथ पैरमें झिनझिनो निया गया है, कि अजीर्ण ही इस रोगका मूल कारण रणके लिये तारपीनका तेल और सुरा एकल मिला कर । है। अतएव जिन सब चीजोंके भोजन करनेसे यंजीर्ण अथवा सरसों के तेलफे साथ कर मिला कर मलना । रोग हो सकता है, उनका परित्याग करना चाहिये। चाहिये। केवल सौरका चूर्ण मलनेसे भो उपकार होता पलोपैथिक मतसे इसे कालेरा मर्वास कालेरा है। कुट, नमक, कांजी और तिल तेल एकत्र पोस कर प्याज मोडिका, पमियाटिक 'कालेरा, मेलिगनेएट जरा गरम कर लगानेसे झिनझिनी छूट जाती है। कालेरा या एपिडेमिक कालेरा कहते हैं। हिका या हिचकी निवारणके लिये सन्निपात यह अत्यन्त सझामक और सांघातिक पीडा है। ज्यरक्त हिकानाशक यागोंका व्यवहार करना चाहिये । | कभी कभी एक स्थान भागमा हो बहुतेरे स्थानों में फैल अधया कदलीके मूलके रसका नस्य लेना या सरसों जाता है और कभी कभी सम्यक् रूपसे प्रादुर्भूत होते पोस कर मेरुदण्डमें प्रलेप देना अथवा तारपीन तेल देखा जाता है। वमन और जलयत् मलत्यागके साथ . उदरमें लगाना चाहिये। 'शरीरका उपट हो जाना हो इसका प्रधान लक्षण है। रोगो जब पिपासासे कातर हो, तब कपूर मिश्रित पहले यह रोग मध्य एशियामें प्रादुर्भूत हुआ। इसी- जल अथवा बरफका जल पान कराना चाहिये। अन्तिम लिये इसका एक नाम पशियाटिक कालरा है। यह कालको दिमाङ्ग अवस्था सूचिकाभरण देने के पहले सुश्रुतको विसूचिकासे पृथक है। भारतमहासागरके मृगनाभि ( कस्तूरी ) और मकरध्वज प्रयोग करनेसे मी द्वोपपुञ्जमें भी यह महामारोफे रूपमें कई शताब्दियोंसे विशेष उपकार होगा। दिखाई देता आ रहा है। ईवीमन् १७५ो शताब्दी- इस रोगको चिकित्साफे विषयमें सर्वदा सनके के शेष भागमें यह पहले भारतमें प्रकट हा। इसके रहना आवश्यक है, क्योंकि इसमें कब किस समय | वाद क्रमश: नाना देशोम फैल गया, किन्तु अन्यान्य . कौन अनिष्ठ होगा उसका अनुमान किया जा नहीं, स्थानोंकी अपेक्षा एकमात्र निम्न बड हो इस रोगको सकता। रोगीका घर, शय्या और पहने हुए वरुप | लोलांस्थान कहनेसे कोई अत्युक्ति न होगी। प्रतिवर्ग आदि साफ रहने चाहिये। घरमें कपूर, धूप और मार्गशीर्ष महोनेसे चैत तक यहाँके लक्ष लक्ष अधिवासी । गन्धकका धूमा करते रहने चाहिये। रोगोका मल | डम चिसूमिका रोगसे प्राण खो बैठते हैं। . ' मूत्र बहुत दूर पर फेंकना चाहिये। ( सुश्रुत ) | - सन् १७७० ई०से पहले चिकित्सक इम राग . __पथ्यापथ्य-रोगको प्रवल अवस्थामै उपवास के सिया! नामसे अनभिज्ञ थे। यह पहले भारतवर्णमें प्रकाशित और कुछ भी पथ्य नहो। पोडाको होस होने पर | हुआ। इसके बाद मारे भूमण्डल में फैला है। सन् रोगीको भूख लगने पर सिंघाड़ाका भाटा, अराकट या १७८१ ई० में भारतपपोंय सेनाध्यक्ष सर भागरफूटका सामूदाना जलमें पका कर देना उमित है । अतीसार सेनामें यह रोग फैला था। इसके बाद सन् १८१७६०में शेगोक्त ययागू भी इस अवस्थामे विशेष उपकारी है। चट्टप्राम, मैमनसिंह और यशोहर जिलेमे यह रोग