पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष एकविंश भाग.djvu/८४

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८२. . वातव्यापि . छाटो सन्धियोंका यात.या गाउट :(Gout) | लाल होता है। कहीं कहीं दूसरी दूसरी' मधियोंमें मी ,

छोरी सन्धियोंमें यह एक प्रकारका विपजनित प्रदाह प्रदाहके चिह्न रहते हैं। पहले मन्धिके कार्टिलेजके परी

इस गौड़ामें खूनमें यूरिफ पसिटका माधिक्य दिग्दाई विभागमें यूरेट भाव सोड़ा सूक्ष्माकारमें संचित होता है। देता है तथा पोडित प्रन्थिमें यूरेट आव सोडा संचित पीछे वहाक लिगेमेंट और सानोविएल विधानों में क्रमश: होता। इस रोगका दूसरा नाम पोडामा (Podagra) है। सञ्चरित और संगृहीत होता है तथा उसो लिए समो , उक्त व्याधिफे निदान के विपक्ष में चिकित्सकोके भिन्न | संधियां मजबूत और विकत देखी जाती हैं। कभी कभी भिन्न मत हैं। डा० गाड (Dr Garrod)का कहना है, कि समो टोफाई चमड़े को विदीर्ण करके बाहर निकल पड़ते इस पीड़ामें लहमें यूरिक पसिदका भाग ज्यादा रहता है। समय समय पर कर्ण, नासिका, लेरिस और है तथा यह नियमितरूपसे दग्ध न हो कर सन्धियों में । मांखकी पपनियों पर ऐसा पदार्थ देखा जाता है । मूतपय जमा हो जाता है। रासायनिक परीक्षा द्वारा स्थिर हुमा | संकुचित और प्रदाहयुक होता है सथा. उसके स्थान है, कि पीड़ित व्यक्तिके खून, मून, ग्लिप्टरफे रस तथा स्थान पर टोफाई बाहर होता देखा जाता है। '... कभी कभी उदरो रोगजनित सिरममें उक्त यूरिक गाउट् प्रधानता दो प्रकारका है, जैसे.(१) नियमित पसिः पाया जाता है। फिर दूसरी श्रेणीफे चिकि या रेगूलर ( Regular ) तथा (२) मनिमित या दररे. सक, विशेषतः डा योई ( Dr. Ord ) और डा० वृटो गुलर ( Irregular or non-articulor ) : (D. Bristore) कहते हैं, कि विधान-विशेषको सरायो नियमिरा गाउट पोड़ा अकस्मात् मारम्म हो जाती 2. कारण यहां पहले यूरेट आर सोडा उत्पन्न होता है । है। पीड़ा गारम्भ होते हो पाकाशयमें अग्निको मधिकता, तथा यहाँसे रक्त संचालित हो कर कर्ण के भौर न्यान्य छाती दाह, यकृम्को क्रिया व्यतिक्रम, हत्कार; शिरम कार्टिलेजों में संचालित हो जाता है। द, शिरका घूमना, दृष्टिकी वैलक्षण्य, मासस्य, ___यह एक फौलिक पोड़ा है। ३० वर्षसे ज्यादा उम्र | सभायका परियर्सम, मिदा, स्वप्नदशेन, पेरको पेशीमें पाले पक्तिफा ही यह पीड़ा होती है। कभी कभी एकको | | कम्प, दमेको तरदका कष्ट, अधिक पसीना माना, घोड़ा छोड़ दूसरे व्यक्तिको यह पीड़ा घर लेती है। कई जगहमें मून और मूतमे अधिक गन्दगी देखो जाती है। कभी तो यह देखा जाता है, कि उसका विधात्मक पदार्थ मातृ कभी रोगके पहले या रोगके समय मन प र रक्त द्वारा परिचालित होता है। अर्थात् जिस व्यक्तिको जाता है। फिर किसो किसी स्थल में ये सब लक्षण यह पीड़ा होगी उसके पोतेकी अपेक्षा नाती हो मधिक महीं भी दिखाई देते और रोगी मानसिक और शारीरिक आमान्त होते हैं। बहुत अधिक मांस खानेसे मीर शराव सास्थपके विषय में भी कोई विशेष विलक्षणता नहीं दिखाई पोनेसे, मेधन करनेसे मालसी मनुष्यके ठंडे देशमें रहनेसे, देती। फेयलमान एक या दो सन्धियों में कुछ ख- • या भोंगा कपड़ा पहननेसे मीर थोड़ी उमरमें शादी करनेसे | उन्दता मालूम होती है। यह रोग घर वाता है। कभी कभी तो. रातफे अन्तिम समयमै मर्थात् त कभी कमी गधिक शारीरिक या मानसिक परिश्रम से ५ बजे शकरके गंगूठ में दर्द उत्पन्न होता और पढ़ने करनेसे शरीरमै विशेषता पसीना चलनेके यस्त ठण्डी लगता है। किसी किसी स्था, यही गांठ.यारम्बार . ह्या लगनेसे, गांठमें चोट लगनेसे, येशी बानेसे तया | आकारत होते देखो जाती है। कि कई बार मन्यान्य शोध, शोक, मतिशय उलासरत्यादिसे यह भी रोग उत्पन्न | छोटो सन्धियां भी पीडित होती है। हारको बड़ो होता है। | सन्धियां कमो कमी भाकाम्त होती हैं। इसकी पेदना भी कभी पाय मंगूठे गांठ विशेषतः मेटटोसों जलन, फटने और शुभनेकी तरह होती है भार दिन फेलेसिपल (Metatarso Phatangeal) प्रदेश | कम और रातको पढ़ती है और मीन अतय हो भामत होता है। उस समय पर देशमें फूटा हुमा भोर .. जाती है। पालथान व्यक्तिमि रोगपणा अधिक होतो