पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१६३

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जेलसमुद्रण १५६ मासमें १५ दिन तक यहाँ एक मेला लगता है, जिसमें जिस के पर नहीं होते है । एमको लम्बाई बाध चंगुल बहुतसे मवेशो तया दिल्लो, आगरा, कानपुर लखनज तक को होतो है। यह प्रायः स डो हुई वस्तुओं तथा पौधों- पादि स्थानों के द्रव्य बिकने पाते हैं। ढोनपुरमे ३ मोल के हरे इंडना पर रहता है। २ सोमा, सूचित करनेका दक्षिण मुचुकुन्द दके समीप भी प्रतिष जा ष्ठ और निशाना । ३ गोल मेहराब बनाने का डाट, लदाव । ४ भाद्र माममें दो मेला लगते हैं। एम ममय बहुतसे नोग शरीर, देह । ५ प्रियतम, पति । ६ एक पकारका गीत । पा कर वहां नानादि करते हैं। यह हर (झोन) प्रायः ७ मूर्ख मनुष्य, जड़। १२५ वीवा चौड़ा और बहुत गहरा है । चागं पोर में पर्व ढोनिनी (हि. स्त्रो०) वर पोरत जो ढोल बजाती है सोसे वृष्टिजल पा कर इस इदमें जमा रहता है । इसके | डकालिन । चार्टी और कमसे कम ११४ देवालय हैं। फाल्गुन माममें ढोम्निया ( पु.) वर पुरुष जो ढोल बजाता है। ढोलपुरसे १४ मोल उत्तर पथिमके मनपो नगरमें भो । ढोलो (म वि० ) ढोल अन्त्यस्य इनि । जो ढोल बजाता एक बड़ा मेला लगता है। यहाँ कई एक विद्यालय है। और औषधालय हैं। ढालो (हिं० स्त्रो.) २०० पानों को गडडो। २ परिहाम, ढोलसमुद्र-बङ्गास्नके अन्तर्गत फरोदपुर जिलेको एक मो. दिल्लगी। झोन । यह फरीदपुर शहरमे दक्षिण-पूर्व में अवस्थित है। ढोव (हि'. पु. ) मेंट, डाली, नजर । वर्षाकालमें यह झोल बढ़ कर नगरके मकानकि पाम ढोचा ( हि पु० ) माढे चारका पहाड़ा । तक फैल जाती है। गोतकाल में यह धोरे धोरे सज: । ढोमना (हि. क्रि० । आनन्दध्वनि करना । चित हो कर अन्तको ग्रोमकालमें एक या दो मोल तक | ढोकना (म. क्लो० ) ढोक ल्युट । १ गमन, जाना। रह जातो है। । २ उत्कोच, घूस, रिशवत । ढोला (हि. पु० ) १ एक प्रकारका छोटा सफेद कोड़ा । ढोकना (हि' क्रि०) पीना । ण-संस्कृत और हिन्दो व्यञ्जनवण का पन्द्रहवां अक्षर वा का दक्षिण पाद: जमूलमें न्यास करना पड़ता है। और टवर्ग का पांचवा वर्ण। इम वर्ण का अई मात्रा- इसके पर्यायवाची गद-मिर्गुण, रति, जान, जन्मल, कालमें उच्चारण होता है। इसका उच्चारणस्थान मूर्हा पक्षिवाहन, जया, जम, नरकजित्, निकल, योगिनीप्रिय, है। इसके उच्चारणमें पाभ्यन्तरिक प्रयत्न है -जिह्वा हिमुख, कोटवो, थोत्र, ममृद्धि, बोधमी, त्रिमंत्र, मानुषो, मध्य द्वारा मू का स्पर्श ओर नासिकामें यत्र विशेषका व्योम, दक्षपादाङ्गलामुख, माधव, महिमो, वोर पोर प्रभेद । वाद्यप्रयत्न-संवार. नाद, घोष, और अन्य प्राण नारायण । ( नानातन्त्र ) है। इसको लिखनप्रणालो इस प्रकार है-पहले एक इसको अधिष्ठात्री देवीका खरूप-ये परमकुण्डलो, पाड़ो लकीर खींचे, फिर उमके नोचे क्रमश: बड़ो बड़ी पोतविद्य लताकार, पञ्चदेवतामय, पञ्चप्राणमय, त्रिगुण- तीन लकीरको अपर नोचे खींच कर नोचे पहली ल कोर- काआत्मा आदि तत्त्वयुक्त भोर महामोहप्रद है। (काम- से एक तिरको लकोर खोंच दें, इसका प्राकार ऐका नुत० ) इनका ध्यान कर इस मन्त्र का दश बार जप हो जायगा-""। इस अक्षरमें ब्रह्मा, विणु और करनेमे माधक शोध हो पोष्ट प्राप्त कर मकता है। महे खर सर्वदा प्रस्थान करते है। माकान्यासमें इस इसका ध्यान- .