पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१८४

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१८० तम्बर (तनापुर) लापों को एक घरमें रख कर उसके चारों ओर बारूद ने इम और तनिक भी ध्यान नं दियः, किंत विजापर मग्रम कर रखो और मईत पान पर उसमें आग लगा सुलतानका मृय माबाद पा कर वे ताबुरको जोतने को तुम तलवार हाथ म निये गडू लिये बाहर रणभूमिमें इच्छामे समन्य पहुँच गये। बेबने भा राजभवन में निकल पड़ना । विजय गवव युद्ध करते करते मार गये। मम्बाद दे दिया कि भागे वित्ति अपड़ा है । राजा इधर पुन पिनामृत्य मवाट सुन कर अन्दर महल इन घटनासे अत्यन्त भोत कर भाग चने । विमा खन- को बारुदम अग लगा दी। तञ्जाबुर श्मशाभूमिमें । खराबों के तनाबुर गकोजों के हाय लगा। इस तरह परिणत हा गया। गजभवन के दक्षिण पश्चिम-कोण में यह तञ्जाबुरमें महाराष्ट्रीय राजवंग स्थापित हुआ । यह घटना हुई यो। यह अंग अन भो उनो साह भग्ना ! घटना शायद १६७४ ई में ही होगी। वस्थ में रह कर पूर्व दुर्घटनाका म्मरण दिलाता है। एक जो अन्यतम पुत्र ताजा के ५ लक थे। तका- तचाबुर जोते जाने पर शोक्यनाथ नायकने एकम्तन जोको मृत्यु के बाद मब से बड़े लड़कें बाबाभारय राज- पायो एनागिरिको वहाँका शासनकर्त्ता नियुक्त किया। मिहामन पर बैठे। १७३६ ई में उनको मृत्यु होने पर एनागिरि पहले गोक्यनाथ के अधीनम गज्य करने लगे; उनको स्त्रो सुजानाबई राज्यशामन करने लगों। किन्तु किन्तु कुछ काल के बाद उनके साथ मतान्तर हो जानसे । कोहनजो घाटगे नामक किमो चिर्न रूप नामको वे स्वाधीनको गये । तनाबुरका राजभवन बारूद ने उड़ाये किलोग्खों के पुत्र को एकाजी में - य पत्र शरभो नौको उत्तरा जानकं पहलं एक दाई विजयराववक नाबालिग पु को शिकारा कह कर स्थिर किया और किसो मुसलमान ले कर नग्नपत्तनमें भाग आई थो। वह बालको किमोकिलादारको महायतासे मुजानाबाईको राज्य में भगा बनिये के घामें भरणपोषण किया गया था। १७ वर्षकं दिया। डम तरह वे रूपो. पुत्र लिये मिहामन-ग्रहण बाद विजयराघव के अन्यतम मटरो वेनकवा नामक करनमें । परन्तु अमान्य मन्त्रियोंने शीघ्र हो कोई नियोगो ब्राह्मण बालकका मन्धान पा कर स्वर्गीय कोहननोका यह षडान्त्र जान कर तकाजोके २य पत्र रानाकई एक पात्मीयवाँको महायतामे उक बालक शमातीको गजपद पर अभिपिता किम। ११४० ई में और दाईको माथ ले विजनगर को गये। जब विज पुरके तकाजोके छोटे पुत्र प्रामिड कई एक राजमविगेको सन्नतानको पूग व्योरा माल म हा, तब वे तञ्ज बुरके महायतामे शयाजोको भगा कर श्राप सिंहासन पर बैठे। नायकों के दुःख मे अत्यन्त दु:ग्वित हो गये। हम समय १७४४ ई० में प्राकट न पात्र माथ प्रतापमिहको दो शिव जोक कोटे व मात्र भाई एकोजो बिजापुरई मेना बार लडाई किडी दोनों लड़ाइयाम पराजित हो कर नायक के पद पर अधिष्ठित थे। एलागिरिको भगा कर प्रतापमिहन नवाबको ७ लाख रुपयेका एक तमस्मक विजयराघवक नागलिग पत्र मिहमालदामको तना. लिख दिया। बुरकं मिहामन पर प्रतिष्ठित करनेके लिये विजापुर के १७४८ ई० में शयाजोन पुन: राज्य लौटाने के लिये सुलतान में एकोनोसे कहा । एकोजो जानत य कि शो क्य मेण्टडेविड दु. के अंगरेज गवन रमे सहायता मांगो ! नाथ के साथ एलागिरिका विरोधमा चल रहा है। अत- प्रतापसिंहने पासवविपदको जान कर चुपकसे अंगरेजों के एव उन्हान गोघ हो पायमपट्टी नामक स्थानमें एलागिार साथ इस शर्त पर सन्धि कर लो, कि यदि उन्हें राज. को पराजित कर मिहमालदाभको तनाबुरके गजपद पदमे च्युत न करें, तो वे देवकोट नामक दुगं तथा पर अभिषिक्ता hि। वेनकवाने श्रागा को था, कि मिह उपस्थित युद्धका प्रायोजन-व्ययस्वरूप ६ हजार पैगोडा मा न राजा होने पर उन्हें मन्त्रीका पद मिलेगा, किन्तु (मिक्का) अंगरेजोको और भयाजोके खर्चके लिये दाई अनुरोध किया हो मन्त्रो हुा। इस पर बे वार्षिक ४०००६ गोडा अर्थात् १४८.०० देगें। कना नितान्त प्रमन्तुष्ट हो कर एसोजोको गज्य ग्रहण १७४८ में प्रतापमिन चाँदमानबके भवसे उन्हें करने के लिये शरबार मकाने लगा। पहले तो एकोजी. ५८ लाख रुपयेको एक दस्तावेज लिण्ड दो। किन्तु कुछ