पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९१

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"आदित्यचन्दावनिलोऽनसश्च दोभूमिरापोवादयं यमश्व। नडलमामा ! (Amaranthus polygonoides ) अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्येधादि जानाति नरस्य वृतं ॥" इसका गुण-शिशिर, मधुर, विष, पित्त, दाह पौर इसके बाद वह पत्र उसके मस्तक पर रख वह चावल भ्रममायक, कचिकारक, दोपन पौर पथ्य है। इसके उसे चबाने के लिये देवें। यदि उसने यथार्थ में चोरी या परीका गुण-हिम, प, पित्तरत पौर विषकाश अपराध किया होगा तो उसका शरीर काँपने लगेगा और नाशक, ग्राहक, मधुर, दाह पोर शोषनायक तथा सचि- तालू सूख जायगा तथा उसे चबा कर भोजपत्र या पोपल- कारक है। भावप्रकाशक मतसे रमक पर्याय-काकर, के पत्ते पर थ क फेंकनेमे वह लेहके जैसा लाग्न दोष त लेरक, भण्डौर, तालो, बोर, विश और पल्प- पड़ेगा। अन्तम उसे ही दोषो समझ कर अपराधके । मारिष है। रसका गुण-साधु, योतवोय , रुक्ष, पित्ता, अनुसार दण्ड देवें। कफनाशक, रत्नदोषापारक, मलमूत्रमि:सारक, रुचि तण्डला (स. स्त्री०) तगड-उलच, नतष्टाप । १ विड़ा, जमक, अग्निप्रदीपक पोर विषनाशक । (भावप्रकाश) बायविड़ा। २महासमझगवक्ष, कक हो नामका पेड़। एक दूसरे प्रकारका भो सालोय होता है जिसे तण्डु लाम्ब (म'• लो० ) तण्ड लक्षालित पम्ब :, मध्य. पानीय तह लोय कहते है पौर कोई कोई रमे जल- पदलो । तलोदक, चावलका पानो। इसके संस्कृत तड लोयकपट नामसे भी पुकारते है। इसका गुण- पर्याय-जोष्ठाम्बु, तगड लोदक और तण्ड लोय है। तित, रस, पित्तन्न, वायुनाशक और लघु है। (भावप्र०) पल परिमित चावल को अठगुने जल में डाल देवें। बाद तण्ड लोयक ( पु.) १ नालीयशाक, चौलाईका उसे पका कर ग्रहण करें। इस प्रकारका जल विशेष माग। २ विड़ा, बायर्यावड़ा। हितकर है। लण्ड लोयकमूल (स• मो.) सालीयकस्य मूल, तण्ड लिकाश्रम ( R• पु० लो० ) तीर्थ विशेष. एक तीर्थ- ६-तत्। स लोयथाकका बस, चौलाई मागको . का नाम। जो मनुष्य इम तोथ में जाता है वह दम जड़। इसका गुण-उण, समानाशक, रजो रोधकर, मसारमें कष्ट नहीं पाता और पन्त में ब्रह्मलोकको प्राप्त रक्तपित्त पौर प्रदरनाशक है । ( आत्रेयसंहिता० ) होता है। सण्ड लौयिका (सो०) तमु लोय खापन खियां "जम्बूमादिपावत्य गच्छेत्त हुलियाप्रमं । टाप, कापि पत रत्व। विड़ा, बायबिट। न दुर्गतिमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥" ताल ( स पु० ) तल पृषोउर्व साधुः । विड़ा) (भारत वन. ८२ अ.) बायबिडा। तण्डुलिया (हि. स्त्री० ) चौलाई, चौराई। तण्डुलेर (स'• पु०) तनु ल बाहुलकात् स्वार्थे । तगालो (म'• स्त्रो०) तण्डल-डोष । १ यवनिता तब लोयथाक, चौलाईका साग। लता। २ शशाण्डु लो कर्कटी, एक प्रकारको ककड़ी। तण्ड,लेरक (स'• पु०) तण्डु,लेर स्वार्थ कन्। तालीय. ३ तड लोयशाक, चौलाई का साग। शाक, चौलाईका माग। तण्ड लोक (म. पु.) तगड लोव कायति कैक । मण्ड: तण्ड लोत्थ (सली. ) तण्डलात् उत्तिष्ठति उत्स्था. लोयशाक, चौलाई का साग । कः। तण्डलाम्ब, चावलका पामो। तण्डसाम्बु देखो। तण्ड स्लीय (म. पु. ) तण्ड लाय-तक्षणाय हितः तण्डलोदक (म० की.) तण्डलस्य उदक, ६-सत् । सख-छ। विभाषाहविरपुपादिभ्यः । पाए। पत्न- तडसक्षालित जल, चावतका धोया था पानी। शाबविशेष, चौलाईका साग। इसके सस्त पर्याय --- तगड लौध (सं० पु०) तड लामामोधः, ६-सत् । १ तहल. अल्पमारिष, तण्डु लोक, सण्डल, भण्डोर, सड,लो, राशि, चावलका ढेर। २ एक प्रकारका बाँस । तडलीयक मन्दिन, बहुवीय मेघनाद, धनस्वम, तहे खर (स'• पु०) ६२ शिवभमिसे एक प्रधान भात । सुधाक, पथ्ययाक, धु, खनितात्रय, चौर और तडिदेगे।