पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/१९९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


त्तिके प्रतीत है, इसलिये गुणातीत भोज जिसको सम्वोपन ( क)ोष, सानी पामा। सुख-दुःख ममझते हो, वह अवस्खा इस सुख-दुःखके तत्वहष्टि (सी .) इष्टिक तत्वका शान प्रतीत है। (वेदान्त.) पारनमें सहायक हो, भाव, हिमहष्टि। जैनमतानुसार-सान तत्त्वोंका यथाथ जानपूर्वक तत्त्वनिरूपण (मो .) मत्लस निरूपण तत् । १ जब शरीर, पात्मा पपनेको कर्मादि वाद्य पदार्थसि भिब खपधारण, मार-निरूप - निया एजेनमता- ममझ कर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और मम्बकाचारित्ररूप नुसार-जीव, जीव, पासव धपादि सा तवों- मोषमार्गका प्रवल बन करतो है, तब उसके उस ज्ञान का निरूपण। को तत्त्वज्ञान कहते है। यह तत्त्वज्ञान तोन प्रकारका तखनियंय (स.पु. तात्यम्ब नियः सत्। होता है, १ उपशम सम्यक २ चायिकोपशम मम्यता तस्वनिरूपण देगे। पौर ३ गायिकसम्या । इनसे पहलेके दो हो कर छूट सन्यास ( . पु.) सम्बोल विषपूनावासविशिष भो जाते है, परन्तु जिस जोवको शायिक मम्यक वा अषय- तन्त्र के अनुमार विसापूजाम एका पायास । इस बासके तत्त्वज्ञान हो जाता है, वह अवश्य हो मोक्षमाण करता। विषय सम्बसारमें इस प्रकार लिखा । पारी पूजा है। विशेष विवरण जैनधर्म शब्द भाग ८, पृष्ठ ४०१-४१) विधिक पनुसार पूजादि कर सिरिलाभके लिये साधकमा में देखो। यायाम करना चाहिए। तत्त्वज्ञानार्थदर्शन (स. क्ली. ' तत्त्वज्ञानस्य अहं ब्रह्मा- नमः पगयेमुरवार्य ततस्तत्वात्मने नमः।" (गातमीयत.) स्मोति मासातकारस्य अर्थः तस्य दाम, तत्। नमः पराय और रसके बाद तलासने नमः Pतत्वज्ञानके लिये पालोचन और मोचक निये तत्वज्ञान- या प्रयोग करना पगा। के साधन, मैं ही ब्रह्म है ऐसे साक्षात्कारका प्रयोजन मनमः पराय जीवतस्यास्पने ममा मनमः पराब प्राण- अविद्या और उसका कार्य निखिल दुःखमिवत्तिकप पौर तस्वात्मने नमः एतदद्वयं सर्वगा। परम पानन्द प्राणिरूप मोक्ष है। उसकी पालोचना हो ततो हृदयमध्ये तत्त्वत्रयश्च विन्यसेत् । तत्वज्ञानार्थदर्शन है। वं नमः पराय मतितत्वात्मने नमः नमः पराव बार- तत्वज्ञानी (सं० पु०) सत्त्वस्य चाममस्याम्ति शान-दनि । १ तस्वात्मने नम: नमः पराब ममतत्वात्मने नमः पतदि । जिममे ब्रम, पामा पोर सृष्टि पादिके सम्बन्धका यथार्थ नं नमः पराय शमतत्वात्मने नमः मस्तके । जान हो। तत्त्वह देखो। २ दार्शनिक । घं नमः पराय स्पर्श तत्त्वात्मने नमः । मत्त्वत: (स अव्य ) तस्व-तमिल् ! यथार्थ रूपसे, वरुत, वास्तविक । दं नमः पराय अपतस्मात्मने नमः इति। . तत्त्वता (. स्त्रो० ) तत्व भावे तल स्त्रियां टाप । १ थं नमः पराय रखतत्त्वात्मने नमः । यथार्थता, वास्तविकता। तत्त्व होमेका भाव या गुर। तं नमः परायगन्धतत्वात्मने नमः पादयोः। गंममः पराय श्रोत्रतत्त्वात्मने नमः श्रोत्रयोः । तत्त्वदर्श (सं० वि०) १ जिसने सरस्व दर्शन किया है, मिसके तत्वज्ञान उत्पन हुआ हो। (पु.)२ सावर्णि नमः पराय वकूतत्वात्मने नमः स्वमि। मन्वन्तरके एक ऋषिका नाम । नमः पराव गस्तत्वात्मने नमः चक्षुषोः। तत्त्वदर्शिता (स. सो) तत्त्वदर्शनो भावः तत्त्वदर्शिन ठं नमः बिहातस्यात्मने नमः विहायो। नमः पराय प्राणतत्त्वात्मने नमः प्राणयो। तल खियो टाप । वह जो दर्शन शास्त्र जानता हो नमः पाक्तत्त्वात्मने नमा बारि तत्त्वदों (स.पु.) तत्त्वं पश्यति तख-दृश-पिनि झं नम: पराय पाणितत्वालमै नमः पाण्योः । नानी, वह जो तस आनता हो। २ 'बतक मनुके एक बमः पराव पापा ममः पादयोः । पुवकानामा . नमः परार पावसाने नमः मुस।