पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२१८

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२१४ पापालिका यथा मित्तौ सर्वेन्द्रियसमन्विताः। तन्छ, १२ भैरवतन्त्र, १३ भैरवोतन्त्र, १४ त्रिपुरातच, १५ अमरशका कार्येषु तथान्ये पन्त्रराशयः। वामकेश्वरतन्त्र, १६ कुछ टेश्वरतम्ब, १७ मालकासम्ब, अन्यमन्त्रैः कृतं कर्म बस्यास्त्रीसंगमो यथः । १८ मनत्क मारतन्त्र, १८ विशश्वरतन्त्र, २० सम्मोहन- न तत्र फलमिद्धिः स्यात् श्रम एव हि केवलम् ॥ तन्त्र, २१ गौतमीयतन्त्र, २२ वृहत्गौतमीयतन्त्र, २३ भूत- कलावन्योदितैमाग: सिद्धिमिच्छति यो नरः । भैरवतन्त्र, २४ चामुगडातन्त्र, २५ पिङ्गालातन्त्र, २६ तृषितो जाह्नवीतीरे कूप खनति दुर्मतिः॥ वागहोतन्त्र, २७ मुण्डमालातन्त्र, २८ योगिनीतन्त्र, २८ लौ तम्बादिता मत्राः सिद्धास्तूर्णफलप्रदाः । मालिनोविजयतम्ब, ३० स्वच्छन्दभैरव, ३१ महातन्त्र, २२ शस्ताः कर्मषु सर्वेषु अपयशक्रियादिषु ॥" शसितम्ब, २३ चिन्तामणितन्त्र, २४ उन्मत्तभैरवसन्च, अब वैदिक मन्त्र विषहीन सर्प के समान वोय होन ३५ त्रैलोक्य भारतन्त्र, २६ विखमारतन्त्र, २७ तन्वामृत. हो गये हैं। सत्य, वेता और द्वापरयुगम उक्त मन्त्र सफल ३८ महाफेत्कारीतन्त्र, ३८ वारवोयतन्त्र, ४० तोड़लतन्त्र, होते थे, अब मृत्य तुला हो गये हैं। जिम तरह प्राचोर ४१ मालिनोतन्त्र, ४२ ललितातन्त्र, ४३ विगलितन्त्र, पर चित्रित पुत्तलिका इन्द्रियसम्पन्न होने पर मो खकार्य- ४४ गजराजेश्वरीतन्त्र, ४५ महामोहस्वरोत्तरतन्त्र, ४६ माधनमें अममर्थ है, उमौ प्रकार कलियुगके अन्यान्य मन्त्र गवाक्षतम्ब, ४७ गान्धव तन्त्र, १८ वेलोक्यमोहनतन्त्र, ४८ भो शमिहीन है। वथ्या स्त्रीमे जैसे पुत्रफलको उत्पत्ति हंसपारमेखर ५० समाहेश्वर, ५१ कामधेनुतन्त्र, ५२ नहीं होती उसी प्रकार अन्य मन्त्र हाग कार्य करनेसे वर्णविलासतम्ब, ५३ मायातन्त्र, ५४ मन्त्रराज, ५५ कुनि- फसमिहिनहीं होती, केवल वृथा यम मात्र होता है। कातन्त्र, ५६ विज्ञानलतिका, ५७ लिङ्गागम, ५८ काली- कलिकालमें अन्य शास्त्रोक्त विधिहारा जो व्यक्ति सिद्धि तर, ५८ ब्रह्मजामल, ६० आदिजामल, ६१ रुद्रजामल, लाभ करनेकी इच्छा करता है, वह निर्बोध सृष्णातुर ६२ वृहनामल, ६३ मिलजामल और ६४ कल्पसूत्र । हो कर गङ्गाके किनारे कूप खोदना चाहता है। कलि- उनके मिवा और भी कुछ तान्त्रिक ग्रन्थोंके नाम पाये युगमें तन्त्रोक्त मन्स शीघ्र फलप्रद है, वह जप, यन्न प्रादि जाते हैं। यथा-१ मत्स्यसूक्त, २ कुलस ना, ३ कामराज, सभी कार्यों में प्रशस्त है। ५ शिवागम, ५ उडडोश, ६ कुलोज्डोश, ७ वीरभद्रोडोश. इसौ लिए रघुनन्दन पादि स्मातीने तन्त्रग्रन्थको ८भूतडामर, ८ डामर, १० यचडामर, ११ कुलसर्वस्व, प्रामाणिक माना है। १२ कालिकाकुलसर्वस्व, १३ कुलचूडामणि, १४ दिव्य, गुह्यशास्त्र । सा हिन्दू और क्या बौध दोनों ही सम्प्र- १५ कुलमार, १६ माणव, १७ कुलामृत, १८ कुला. दायों में तब अति गुह्यतत्त्व ( Msystic doctrine ) वली, १८ कानीकुम्लाण व. २० कुलप्रकाश, २१ वाशिष्ठ, समझा जाता है। यथार्थ दीक्षित और अभिषिके मिवा २२ सिद्धमारस्वत, २३ योगिनोहृदय, २४ कालोदय, किसी के सामने यह शास्त्र प्रकट नही करना चाहिये ।। २५ माटकाण व, २६ योगिनोजालकुरक, २७ लक्ष्मी- कुलार्णवतन्त्र में लिखा है कि, धन देना, स्वो देना, अपने कुलार्णव. २८ ताराण क, २८ चन्द्रपीठ, ३० मेगन्स, प्रागा सक देना पर या गुह्यशास्त्र अन्य किसों के सामने ३१ चतुःपती, ३२ तत्वबोध, २३ महोग्र, २४ खच्छन्द- प्रकट न करना । सारसंग्रह, ३५ ताराप्रदोप, ३६ सङ्कतचन्द्रोदय, ३७ षट- पागमतत्वबिलाममें निम्नलिम्बित कुछ तन्त्रोंका विशतत्त्वक, ३८ लक्ष्यनिर्णय, ३८ त्रिपुरार्णव, ४. विष्णु- धर्मोसर, ४१ मन्वदप गा, ४२ वैष्णवामृत, ४३ मानसो. स्वतन्त्रतम्च, २ फेत्कारोतन्त, ३ उत्तरतन्त्र, ४ नोल. लास, ४४ पूजाप्रदीप, ४५ भक्तिमञ्जरी. ४६ भुवनेश्वरी, सन्त्र, ५ वीरतन्त्र, ६ कुमारीतन्त्र, ७ कालोतम ८ नारा ४७ पारिजात. ४८ प्रयोगसार, ४८ कामरत्न, ५० त्रिया- योतन्त्र, सारिणीतन्त्र, १० वालातम्या, ११ भमयाचार मार, ५१ भागमदीपिका, ५२ भावचूड़ामणि, ५३ तब-

  • मवारपूजाके प्रकरणमें प्रमाण देखना चाहिये। चड़ामणि, ५४ हहत्यीकाम, ५५ श्रीनाम, ५६ सिमामा-