पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२२५

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सभीको समान अधिकार है। गौतमीयतबके प्रारम्भमें रोंगे। शैव और माता सर्वत्र हो दीक्षा गुरु हो सकी . ही लिखा है- इसमें सन्द नहीं। "सर्ववर्णाधिकारश्च नारीणां योग्य एव च ॥" ____ उक्त पाँच सम्प्रदायोंमें भी विभिन देवमूर्ति पौर कङ्गालमालिनीतंत्रके मतसे- असंख्य वौज है, उन वोजो पनुसार ही इष्टदेवको "शूद्राणां प्रणव देवि चतुर्दशस्वरं प्रिये । पूजा पोर ध्यान पादि हुआ करते हैं। बीज देखो। नादविन्दुसमायुक्त स्त्रीणां चैव वरानने ॥ . तान्त्रिकगण उपासना और वोजम के भेदसे नाना मनौ स्वाहा च या देवि शूद्रोच्चार्या न संशयः। शाखाओं और सम्प्रदायोंमें विभता होने पर भी किसी होमकार्ये महेशानि शूदः स्वाहाँ न चोच्चरेत् ॥ किसो तंत्रमें ब्राह्मणमात्रको हो थामा कहा गया है। मन्त्रीप्यूदो नास्ति शुदे विषवीज विना प्रिये ॥" “सर्वे शाक्ता द्विजाः प्रोक्ता न शैवा न च वैष्णवाः । हे देवि ! शूद्र और स्त्रियोंका प्रणव वोजमंत्र नाद- आदिदेवी च गायत्री उपासकविमोक्षदा।" विन्टुसमायुक्त चतुर्दशस्वर हैं। शूद्रको मनमें भी स्वाहा सभी हिज गात, शैव वा वैष्णव नहीं, क्योंकि उच्चारण न करना चाहिये । होम कार्य में भी शूट स्वाहा उपासक को मुक्तिदात्रो प्रादि देवो गायत्री ( सबको आराध्य ) है। उच्चारण न करे। विषबीज सिवा शुद्रको पौर कोई आचारभेद । तांत्रिकगण पाँच प्रकारके प्राचारोंमें भी मन न उचारण करना चाहिये । विभक्त है। कुलार्णवतन्त्र के मतसे- नोलतबके मतसे दोक्षाकाल इस प्रकार है- "सर्वेभ्यश्चोत्तमा वेद वेदेभ्यो वैष्णव महत् । 'कृष्णपक्षस्य चाष्टम्यां शुमे लमे जुभेऽहनि । वैष्णवादुत्तम शैव शैवादक्षिणमुत्तमम् । पूर्वभाद्रपदायुके मित्रतारादिसंयुते ॥ दक्षिणान्मुत्तमं वाम वामात् सिद्धान्तमुत्तमम् । अथवा त्यनुराधायां रेवत्यां वा प्रशस्यने । सिद्धान्तादुत्तम कौल कौलात् परतरं नहि ॥" जानीमाच्छोभन काल चन्द्रार्कग्रहण प्रति ॥ सबमे वेदाचार श्रेष्ठ है, वेदाचारसे वैष्णवाचार. इषे मासि विशेषेण कार्तिके च विशेषतः । महत् है, वणवाचारमे शवाचार उत्कष्ट है, शैवाचारसे महाटम्यां विशेषेण धर्मकामार्थसिद्धये ॥ दक्षिणाचार उत्तम है, दक्षिणाचारसे वामाचार श्रेष्ठ, रोहिणी श्रवणा च धनिष्ठा चोत्तरात्रयम् । वामाचारमे सिद्धान्ताचार उत्सम है और सिद्धान्ताचारको पुष्या शतभिषा चैव दीक्षानक्षत्रमुच्यते ॥" अपेक्षा कौलाचार उत्तम है। कोलाचारके बाद पोर सापक्षको अष्टमी तिथि, शुभ लग्न पौर शुभ दिनमे । कोई नहीं है। मित्रतारादियुक्त पूर्वभाद्रपद, अनुराधा वा रेवती नक्षत्र में वेदाचार-प्राणतोषिणीत नित्यानन्दतंत्रके मतमे- चन्द्रग्रहण के समय, आखिन, वा कार्तिक मासमें दीक्षा “वेदाचारं प्रवक्ष्यामि शृणु सर्वांगसुन्दरि । लेमा प्रशस्त है । विशेषतः धर्म अर्थ कामको मिचिके ब्राह्म मुहूर्ते उत्थाय गुर नला स्वनामभिः ॥ लिए महाष्टमी अत्यन्त प्रशस्त है। रोहिणी, श्रवणा, आनन्दनाथ शब्दान्तेः पूजयेदथ साधकः । पार्दी, धनिष्ठा, उत्तराषाढ़ा, उत्तरभाद्रपद, उत्तरफल्गुनी, सहस्राराम्बुजे ध्यात्वा उपचरिस्तुचभिः॥ पुष्पा, पौर शतभिषा ये दीक्षानक्षत्र समझे जाते हैं। प्रजप्य वागभववीज' चिन्तयेत् परमा कलाम ।" मतभेदसे दीक्षागुरुमै भो भेद होता है। नीलतन्त्रके सर्वाङ्गसुन्दरि। वेदाचारका वर्णन करता, तुम मतमे-'विष्णुर्विष्णुमतस्थानों सौरः सौरविदां मतः । सुनो। साधकको चाहिये कि, वह ब्राह्म मुह में छठे गाणपत्यस्तु देवेशि गणदीक्षाप्रवर्तकः। और गुरुके नामके अन्त में प्रानन्दनाथ बोल कर उनको शैवः धातच सर्वत्र दीक्षास्वामी न संशयः॥" प्रणाम कर। फिर सहस्रदलपमें ध्यान करके पञ्च उप- वैष्णवोंके गरु विष्णुमन्योपासक, सौरमतावलम्बियो चारसे पूजा करे और वाग्भववीज जप करके परम के गुरु सौर और गाणपत्यों के गुरु गणदोक्षाप्रवर्तक कलामतिका ध्यान कर। . Vol Ix. 56