पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२३५

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२३॥ इति ते कथित देवि शुभपूर्णाभिषेचनम्। पादि वार, शुलापन, जलपक्ष, वसन्त पादि बा मातुएं ब्रह्मज्ञानेकजनन शिवत्वफलसाधनम् ॥ वैशाख पादि बारह माम. उत्तरायप, दक्षिणायण, ये नवरात्र सप्तरात्र' पचरात्र' विरात्रकम् । सर्वदा तुम अभिषित करें। लवण समुद्र, पशुसमुद्र, अथवाप्येकरात्र च कुर्यात् पूर्णाभिषेचनम् ॥ सुरामभद्, पृतसमुद्र, दधिसमुद्र, दुग्धसमुद्र, पोर जल- संस्कारेऽस्मिन् कुलेशानि चकल्पाः प्रकीर्तिताः। समुद्, ये ममस्त समुद्रमत्रपूत मलिल हारा तुम्हें नवरात्र विधातव्य सर्वतोभद्रमण्डलम॥ अभिषित करें। गङ्गा, यमुना, रेवा, चन्द्रभागा. नवनाभ सप्तरात्र पचान पंचगत्रके : सरस्वती, मरव, गण्डकी, कुन्तो, रहतगा. बोशिकी, त्रिरात्र वैकराने च पद्ममष्टदलं प्रिये ॥ ये मनपूतः जल हाग तुम्हें अभिषित करें। मंण्डले सर्वतोभद्रे नवनाभेऽपि साधकैः । पनन्त, वासुकि, पन्न प्रादि महामाग, गम पादि स्थापनीया नव घटाः पचाम्जे पंचसंख्यकाः॥ पक्षी, कल्पवृक्ष प्रादि वृक्ष, और पर्वत तुम्ने अभिषिमा नलिनेऽष्टदले देवि परस्त्वेकः प्रकीर्तितः। करें । पातालचारी, भूतन नारी पोर व्योमचारो जोव अंगावरणदेवांश्च केशरादिषु पजयेत् ॥ तुम्हारा मङ्गल करें तथा वे पूर्णाभिषेक दर्शन करके पूर्णाभिषेकसिद्धानां कौलानां निर्मला मनाम्। परितुष्ट हो तुम्ह मलिन हारा अभिषिक्त करें। पूर्गा- दर्शनात् स्पर्शनात् घागात् द्रव्यशुद्धिविधीयते ॥" भिषेक तथा परब्रह्मके तेज हारा तुम्हारा दुर्भाग्य, पयश, गुरु तुमको अभिषिक्त करें। ब्राह्म, विष्ण और महे- । रोग, दोमनस्य प्रोर शोक समुदाय विध्वस्त होवे । खर तुमको अभिषिक्त करें। दुर्गा, लक्ष्मो. भवानी ये अलक्ष्मी. कालकर्णी, डाकिनी, योगिनो, ये अभिषेक मातायें तुम्हें अभिषिक्त करें । षोडशो, तारिणो. नित्या, और कालोबोज में हार ताड़ित हो कर विनष्ट हो । स्वाहा, महिषमर्दिनी. ये तुमको मत्रपूतः मलिन हाग भूत, प्रेत, पिशाच, ग्रह तथा पोर पोर ममम्त पनिष्ट- अभिषिक्त करें। जयदुर्गा, विशालाक्षी, ब्रह्माणो, मर कारोगण रमावोज हारा ताड़ित हो कर नष्ट हो जावें। स्वती, वगला, वरदा, शिवा, ये तुमको अभिषिक्त करें। अभिचार जनित दोष, वैग्मत्रसे उत्पन्न दोष, मान नारमिही, वाराहा, वैधावो, वनमालिना. इन्द्राणो, सिक दोष, बाचनिक दोष कायिक दोष, ये सब तुम्हारे वारुणो, रोद्रो, ये ममम्त शक्तियों तुम्ह' अभिषिक्त का अभिषेक के द्वारा ध्वस्त होवें । तुम्हारो समस्त विपत्तियों भैरवो, भद्रकाली. तुष्टि, पुष्टि, उमा, क्षमा, श्रद्धा, कान्ति, दूर होवें । तुम्हागे समस्त मम्पद स्थिरतर होवें। इस दया, शान्ति, ये सर्वदा तुम्हें अभिषिक्त करें । महाकालो, पूर्णाभिषेक के हारा तुम्हारे समस्त मनोरथ पूर्ण होवें। महालक्ष्मी, महानोलसरस्वतो, उग्रचण्डा, प्रचण्डा ये इन कोस मंत्राम माधकको अभिषित होना सर्वदा तुमको सलिल द्वारा अभिषिक्त करें। मत्स्य, चाहिये। यदि शिष्य पशु पास दोधित हुपा हो, गुरु- कूर्म, वराह, नृसिह, वामन, राम, परशुगम, ये सर्वदा को चाहिये कि, उसे पुन: वही मन सुना। पनन्तर तुम्हें सलिल द्वारा अभिषिक्त करें। अमिताङ्ग, रुरु, चक्र, कोलिक गुरु शक्तिमाधाको सूचना देते हुए पूर्व नाम क्रोधोन्मत्त, भयङ्गर, कपाली, भोषण, ये सलिलमे तुम्हे ग्ररणापूर्वक शिष्यको सम्बोधन करके पानन्दनाथान्त अभिषिक्त करें। कालो, कपालिनो, कुला, कुरुकुना, नाम प्रदान करें। गिष्यको चाहिये कि, वह गुरुसे मंत्र विरोधिन, विप्रचण्डा, महोगा, ये तुमको अभिषिक्त करें। सुन कर पञ्चतत्त्वोपचार द्वारा मंत्री अपने प्रभोष्ट देवता- इन्द्र, पग्नि, पिटपति, नैऋत, वरुण, मरुत्, कुवेर, को पूजा करके गुरु पूजा करें। ईमान, ये अष्टदिक पाल तुम्हें पभिषिक्त करें। रवि, इसके बाद गुरुको गाभी, भूमि, सुवर्ष, वन, पैय- सोम, मङ्गल, बुध, वृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु, केतु, ये द्रव्य, अलङ्कार इन सवको दक्षिणा दे कर माक्षात् शिव- पह पौर नक्षत्र तुमको अभिषिक्त करें। अखिनो स्वरूप कोलोको पूजा करनी चाहिये । पोछे जानो व्यक्ति पादि नवन, वन प्रादि करण, विष्णन पादि योग, रवि कोलिकों को पर्चमा.करके भान्त पोर: पवि विनीत हो