पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२३७

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उदारचित्त, सब समय वैवाचारमें सत्यर, कुला- ऐमो चारो हो वर्षाको स्त्रियाँ कुलपूजाके लिए प्रशस्त चाररत, बोराचारो, कुलमार्ग में पण्डित, कुम्लम केतका है। चारों वर्षाको कुनस्त्रियों के लिए पुरश्चरणका विधान वेत्ता. कलशास्त्र में विशाग्द. महान गन, बुद्धिमान्. है। वर्गसङ्करमे उत्पन्न मारी होम ना नाम ने प्रमिल हैं। प्रतिसाहसो. शुहाचारो, नित्यकर्म निष्ठ. दम्भ और जिमके मुग्वपगह न पालन को प्रभा ओ, वह माक्षात् हिंसावर्जित, परनिन्दासहिष्णु, मत्र दा प्रकारमें रत, भुवनेश्वगे है। इस प्रकार की नाना नातिकी स्त्रियों को बोरासनमें ममामीन, पिटभूमिगर, व दा हो आन- कुलपूजामें दोक्षित .या जा सकता है। ब्राह्मण होन- न्दित ओर कुमारीपूजनमें रत, रोग होने पर वोर जात या देवीको मन हो मन पूज' करेगा। कोलिकोदेवी ताविक साधनमें होनजा यजन करें । दिय और वोर मालम न होने पर पशुवत् प्रचना करेग । वोराचारो भावमे कन्नमाधन करें। कन्नजामें मभो जातिको क ल टोक्षिा वा अदक्षिता स्त्रोको पशुत् पूजा करेगी स्त्रो पूजनीय है। श्मनान, निर्जन वा ग्मणोय स्थानम, अथवा प्रानयोगमना हो का शतमात्रका स्मरण विमानाथ और शून्य मगडलमें, ग्राम वा सुरङ्गके भीतर करेगा। होनजा मात्र हो भवदा दोनित हैं। शवा वा कुलपूजा करनी चाहिये। शाकरमणो, वैष्णवा अथवा अवैषणवी माधिकोको माधिकाके लक्षण-- कुलसाधनमें योग्य ममझना चाहिये। "निलाभा कामनाहीना निनादम्भवजिता । संकेत । तान्त्रिक उपामक मात्रको ही महोतका शिवसमागता साध्वी स्वेच्छया विपरीतण ॥ जानना विशेष प्रावश्व कोय है, नहीं तो कुलपूजामें चतुर्वणोद्भवा रम्भा प्रशस्ता कुलपूजने । उनका विल्कल अधिकार नहों अथवा चक्रके मध्य वह चतुर्वर्णोद्भवानां च पुरश्चर्या विधीयते ॥ स्थान पानक योग्य नहीं होता। निरुत्तरतन्त्र में लिखा है- वर्णशंकरतो जाता हीनजा परिकीर्तिता। 'कमसंकेतक चैव पूजास के तमेव च । लज्जा लांछितभाला या सा साक्षाद् भुवनेश्वरी ॥ मन्त्रसंकेतक' चैव यत्रसंकेतकस्तथा ॥ नानाजात्युद्भवानां च सा दीक्षा कलपूजने । लिखनमत्रयंत्राणां संकेत गुरुमॉर्गतः । ब्राह्मणो हीन जां देवीं मनसा वा प्रपूजयेत् ॥ संकेतझ बिना वीरं यदि चके नियोजयेत् ॥ अज्ञात्वा कौलिकी देवीं पशुवत् परिपूजयेत् ॥ निष्फल पूजन देवि दुःख तस्य पदे पदे। पशुवत् पूजयेद्वीरो दीन्तिां वाप्यदीसिताम् । संकेतहीनो यो वीरो नाभिषेकी गुरुः कमात् ॥ शक्तिमात्रं यजेद्वीरः प्रालयोगमना: स्मरेत् ॥ कुलभ्रष्टः स पापिष्ठस्तत्यजेदीरचकके।" हीनजाते तु संयुक्ता दीक्षिताश्चैव सर्वदा । (निरु. १०५०) शांकरी शक्तिका वापि वैष्णवी वाप्यवैष्णवी । क्रममत, पजामत, मन्त्र पद्धत, यन्त्रसत, सर्वदा साधने योज्या साधकानाम कुलार्चने ॥" गुरुमे मंत्र और यन्त्र लिादनेका सङ्कत, इन सताको । निकः १५०) जिमने नहीं जाना है. उमको चक्र में नियुक्त करनेसे पूजा जिम स्त्रीको लोभ नहीं, कामना नहीं, लज्जा नहीं, निष्फल होती और पद पदमें उसको दुःख हुमा काता, दभ नहीं, जिस साध्वीने शिव महः किया है. है। जो वोर महत नहीं जानता अथवा जो गरुके क्रमा जो खो अपनी इच्छासे विपरीत रमण करती है, नुसार अभिषिक्त नौं है, व कुलभ्रष्ट और पापिष्ठ है, उमको वीरचक्रम परित्याग करना चाहिये। • "मटोत्तरशत देवि तद्योग सुरतो अपेत् । क्रममत-वपुष्य, स्वयंभूपुष्प, कुण्डोद्भव, गोलोद्भव, प्रणम्य मनसा देवी चुंबन मनसा सस्त । वजपुष्प, उलाम, प्रौढ़ इत्यादि। सुदरी नागरी दृष्ट वा एवं सचिंतयेबरः । तन्त्रम उक्त तान्त्रिक शब्दों के अर्थ का निर्म य किया पर कासिकापुत्रः सदाशिव इहापर:॥" (निरु. १५.) गया है। बहुतसे सातिक भब्द ऐसे भी हैं जिनका Vol. Ix. 59