पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२४२

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२२ कराना चाहिये । इस प्रकारके आचरण करनेसे सिद्धिको | सिहि होतो है। किन्तु इसमें मथने बिना कमो भो निकटवर्ती समझे और महोत्सव करें। षोडशवर्षीया मिहिनीं हो सकती । इमलिये पहले यत्न पूर्वक युवतीको यत्नपूर्वक ला कर शुद्ध जल और गन्ध हारा स्वयं मद्य पान करके और उसको पिना कर पीछे जप स्वयं उसको सान कगवें। फिर दिव्य अलङ्कार, सुगन्ध करना चाझिये। पुण्य और मिष्टायादि हारा पूजा करके तन्मय हो कर "तत्रापि प्रत्ययो नोचेत् चरुहोमं प्रकल्पयेत् । उसको भामव पिलावें और स्वयं भी पो। उम समय निशीथे निर्भयो देवि श्मशाने प्रान्तरे तथा । यदि वा षोडशो युवती रसिके लिये प्रार्थना करे, सो गन्धं: सानादिक कृत्वा पादशौचादिपूर्वकम् । उमके माथ रमण करें, तथा उमके हाथमें माला देवें । पटमारोग्येत्तत्र सौवर्ण गजतं तथा ॥ पोछे उस मालाको उससे वापम ले कर ब्राह्मण भोजन ताम्र वा तन्महेगानि विभवानुक्रमेण तु । करावे। इसके बाद आधी गतको जप करनेमे निश्चय कल्पयित्वा निशाभागे पूजयेत् परमेश्वरीम ॥ माक्षात् होगा. इममें अन्यथा नहीं। उपगरयथाशक्ति चित्तशाम्य विवर्जयेत् । "तत्रापि प्रत्ययो नोचेत् कलामध्ये विशेबुधः । देवीपूजां वाचायव पिठन्तु परिदापयेत् । पर्यकस्य चतुःपार्थ सूत्र मनोरमम् ॥ चरौ निधाय यवन चतु:पिष्टकवर्तुलम् । वधा द्वाविंशति प्रन्थिं रमापूटितमूलकैः । ततश्वर पाचयेस्तु कुण्डमध्ये तु पूजयेत् ॥ निविश्यव स्वाक्षार्थ पाचाली सैन्धनी तथा ॥ रक्तां धनां वलाकाञ्च नीलां काली कलावती । वक्ष्यमाणकमेणव वस्त्रोपरि निधापयेत । द्वारेषु पूजयेन्मत्री लोकपालान् प्रयत्नतः । षोडशाग्दा परलतां गणिको च विशेषतः। प्रहान संपूजयेन्मन्त्री चतुष्कोणक्रमेण तु। समानीयप्रवेन दिव्यपुष्पैनिवेदयेत॥ हविर्धारी हुनेमन्त्री यथाशक्त्या ततश्चम् । भोजयेत् मिष्टभोज्या ने सौम परिधापयेत् । श्रावयेत् मूलमन्त्रण मधुना सिद्धिहेतवे । लेपयेत् दिव्यगन्धेन भूषणैर्भूपयेत् स्वयम् । हुस्वा संच्छादये-मन्त्री ततो दक्षिणकालिकाम॥ रमयेत् परया भक्त्या साधक: सिद्धिहेतवे ॥ धूपदीपैश्च नैवेद्यैः प्रदक्षिणमथाचरेत् । अपस्याबपेनैव सिद्धिर्भवति नान्यथा । पिष्टवतुलसंख्यातं सुवर्णादि प्रजायते ॥ विना मयं महेशानि न सिध्यति कदाचन ॥ एकेनैव प्रयोगेण यदि सिद्धिर्भवेत्प्रिये । तस्मादादौ प्रयत्नेन पीत्वा तां पाय येवुधः।" तथा होमो द्वितीयेन रौप्य' वापि सुरेश्वरि ॥ पूक्ति प्रकारसे यदि ज्ञानोत्पत्ति अर्थात् मिचि न हो। तृतीयेन भवेत्तान लौह तुर्येण च स्मृतम् । तोरस प्रकारसे करने पर मिद्धि होगी- एषामण्यतमां ज्ञात्वा साधयेत सिद्धिमुत्तमाम् । माधक कलाके वोच निवेशित हो, फिर पर्य के सिद्धाय कालिकायाश्च नेम दुर्लभमुध्यते। चारो ओर मनोहर परमूत्रसे रमापुटित मूलक हाग गुरुमूलभिद सर्व तस्मादादौ समर्चयेत् ॥ बाईस गॉठे बाँध कर अपनी रक्षाकं लिये वक्ष्यमाणके तस्य प्रसादमात्रेण सिद्धो भवति नान्यथा।" नियमानुमार पांचालो और सैन्धवी वस्त्र जपर स्थापित पूर्वोक्ष प्रकारसे यदि सिद्धि न हो, तो साधकको चरु. करें। बादमें माधक यत्नके साथ वोडगो परमता वा होम करना चाहिये। साधक श्मशान वा प्रान्तरमें जा गणिकाको ला कर उसको दिव्य पुष्य देवे और मिष्ट कर निशीथ समयमें यहाँ मान करें। अमन्तर पाद. भोजन खिलावें, क्षोमवस्त्र पहनावें तथा दिय गन्ध और योचादि पूर्वक विभवानुसार सुवर्ण, रजत वा ताबमय भषण हारा विभूषित करें। साधक सिषिके लिये परा| घट स्थापन करके पजा करे। टेवी यजाले साधारने भलिक पारा उसके साथ रमण करें। इस तरहसे सब विषयमें अपणता न करना चाहिये। यथाशक्ति देवो काबर पाने के बाद अपका भईभाग जपनि हो । पजा करके पिष्टका बनायें। वसावार पतापिटलो