पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२६६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


२६२ सन्त्र अब तक शान न उत्पत्र हो, तब तक वर्ष विभाग रहता है, जान उत्पन्न होने पर फिर वर्गादि विभाग नहीं रहते। चञ्चलचितम गति अवस्थान करता है और स्थिरचित्तम शिव । थिचित्त होमकने पर ही देशधागे होने पर भी सिद्धि होती है । (ज्ञान संकलिनीतन्त्र) शूद्र-निग्विन पटलादिका पढ़ना निषेध है।- "विप्रो वा क्षत्रियो वापि वैश्यो वा नगनन्दिनी । पतयनाके धोरे शुद्रस्य लिखनात् प्रिये ॥ नम्मान शइलिखितं परलं न जपेन् सुधीः । शुदेण लिग्वितं देवि पटलं यस्तु पठयते। यं यं नरकमाप्नोति तं तं प्राप्नोति मानवः।" ब्राह्मणा, क्षत्रिय वा वैध्य यदि शूद्र के द्वारा लिखित पठलादि पढ़े तो उसको घोर नरक जाना पड़ता है। इमलिए शुद्र-लिखित स्तव कवच प्रादि नहीं पढ़ना चाहिये। सन्चो में इस प्रकारको अनक बात जानने योग्य है। वास्तव में रम ममय भारतवर्षमें मर्वत्र विशेषतः बङ्गाल- में--जो क्रियाकाण्ड और पूजापडति प्रचलित है, वे मभो तान्त्रिक है । मन्त्र, बीज, गायत्री न्यास, मुद्रा, दुर्गा, तारा आदि शब्द द्रष्टव्य हैं। हिन्दूतम्घाका विषय पहले जमा लिया गया है, बौद्ध सन्त्रों में भी उसी तरहका विवरण देखनमें आता है। हिन्द्र तन्त्रोक्त शिव-दुर्गा प्रादिक नाम हो मानो वचमत्व, वजडाकिनो. आदि नामों में रूपान्तरित हए हैं। बौद्ध- तत्रों में भी चण्डो, तारा, वागहो, महाविद्या, योगिनी, डाकिनी, भैरव, भैरवो आदिको उपासना प्रचलित है। शिवोन तत्रों में जिस तरह पडत अडत देवमूर्तियों की कल्पना की गई है, बौद्धत त्रों में भी उसी प्रकार हेरकादि देवदेवोको मूर्तियाँका वर्णन पाया जाता है। बौइतवर्क मतसे बञ्चमत्व और बचताराको पूजा ही प्रधान है। हिन्दू तांत्रिकगण जिस तरह दक्षिणावर्त- के क्रमसे न्यास करते हैं, बौहातांत्रिकगण वामावर्तसे उसी तरह न्यास किया करते है। "वामावतविवर्तन पूजाम्यासप्रदक्षिणम् । योहि जानाति तत्वशास्तस्येदं चकदर्शनम् ।" (अभिधानीतालय, ३ पटस) बौर साविककीका भी कहना है कि साधनका कोई नियम नहीं, जब इच्छा हो हर एक पखामें माधन करना चाहिये। "न तिथिं न च नक्षत्र नोपवासो विधीयते । शुचिनां वाप्यशुचिर्वा न गौचनोदकक्रिया । कालदेलाविनिर्मुक्त शौचाचरं विवर्जयेत् । तत्रमन्त्रप्रयोगम: सर्वसत्वार्थतत्परः ॥ गिरिगलरकुत्रेषु नदीतीरेषु संगमे । महोदधितटे रम्ये एकवक्षे शिवालये ॥ मातृगृहे श्मशाने वा उद्याने विविधोत्तमे । विहाचैत्यालयेन गृहे वाथ चतुष्पथे। साधयेत् सावको योग सर्वकामफलप्रदम।" (अभिधानोत्तर) बौडतांत्रिक भी मालामंत्र, माटका, कवच, हदया. दिको प्रतिगद्य मानते हैं। बोडतोंमें उन गद्य विषयों- को अधिकारोके सिवा अन्य किसके पास प्रकट करनेका भी निषेध है। "आचारयोगिनीतन्त्रा. योगतन्त्राश्च विस्तराः। कियाभेदकमेणव सर्वतन्त्रवभिनया ॥ आगमैः सिद्धिशास्त्राणि स्वतन्त्रेातकैस्तथा । अनुत्तरपदा वाचः प्रज्ञापारमितादयः॥ पाह्यशाखपरिज्ञानमाचारविविधोत्तमम । योगभावनया युक्तं नैष्ठिकं पदविन्यसेत् ॥ सीहारविहारन्तु निर्विशकेन चेतसा । शताक्षरेण सर्वेषां मन्त्राणां दृढभावन।। मालामन्त्र योगनित्यं सर्वकामार्थसाधनम् । उत्तमे वापि चोत्तर योगिनीजालसम्वरम् ॥ मंतोद्धारम कवचो हृदये हृदयेन तु । लिपिमण्डलविण्यास वीरयोगिनीतद्भवम् । सर्वेषामेव मन्त्राणां उत्तमा मातृकोत्तमम् । गुह्याद्गुह्यतरं रम्यं सर्वज्ञानसमुच्चयं ॥ आलयः सर्वधर्माणां मातृकास्यजपाद्भवा । एतत्तवन कथयन् सिद्धिहानिर्भविष्यति। भावनेषाश्च परमाकाशसिद्धिरनुत्तमा । भावयेत् जन्मसम्मानि वजसत्यत्वमाप्नुयात् । अप्रकाश्यमिदं सर्व गोपनीय प्रयनतः।" (अमिषानोत्तर ४५.)