पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२७२

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तन्मतता-तन्मात्र लोडेका मैन रचते है। २ एक प्रकारका रस्मा जो अर्थात् जो स्वयं पवयवश न्य पर ममस्त पदार्थोक पवयंव जहाजके मस्तनको जड़ में बंधा रहता है। इसको महा- हैं, उनको सम्मान कहते हैं। वे तमात्र, ५१-शब्द- यतासे पाल आदि नढ़ात है। ३ तराजमें जोतोको तन्मात्र, स्पर्श समान. रूपतन्मात्र, रसतमात्र पौर गन्ध- रम्मी, जोती ।। पु०) ४ व्यापारो जहाजका एक अफसर नचाना जिम हाथ व्यापार मम्बन्धो कार्योंका इन्तजाम रहता इन पाँच सम्मानोंसे क्रमश: आकाश, वायु, तेज, जल और शिति ये पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं। इन तन्मतता (म. बी.) तस्य मतं, हसत, तन्मत-तन्न - आकाशादि पञ्च महाभूतमि उत्तरोत्तर एक एक तम्माव- टाप । उमौ तरह, वैसा हो। को क्रमशः वृद्धि होतो है । जो जिससे उत्पन्न होता है, सन्मध्य ( म०को०) सस्य मध्य, ६-तत् । उममें । वह उसके गुणोंको पाता है इम न्यायके अनुमार शब्द सम्मध्यस्थ ( म०वि०) मध्ये तिष्ठति स्या-क। तन्मध्य- सन्मानसे शब्दगुण प्राकाश, शब्द तन्मात्रयुक्त स्पग वर्ती, उमके मध्यका, उममेके । तन्मात्रसे शब्द स्पर्श गुण वायु, शब्दस्पर्श-तन्मात्र संयुक्त तन्मनोहगङ्गानिरीक्षण (*.ली. ) जैनशास्त्रानुमार ब्रह्म रूपतामात्रसे शब्द-स्पश रूप गुण तेज, शब्दस्पशरूप सन्मान रूपत मानस शब्द स्पण कप गुण तज, शब्द चर्य व्रतका एक पतिचाग्दोष । ब्रह्मचारी अथवा स्खदार- युक्त रसतन्मात्रमे शब्द. स्पण , रूप ओर रसगुण अब नया सन्तोष व्रतवाले श्रावकको परस्त्रियांक मनोहर गोको शब्द, स्पर्श, रूप परि रम्तन्मात्रके साथ गन्धतन्मात्रमे न देखना चाहिये । यदि वह ऐसा करे तो उमे लक्त शब्द, स्पर्श, रूप, रम और गन्ध-गुण पृथिवो उत्पन्न हुआ दोष लगता है। जैनधर्म देखो। करती है। सन्मय ( स० वि०) तदात्मकं तदःमयट्। दत्तचित्त, शब्द स्पर्शादि पाँच तन्मात्र स्थ लताको प्राम हो कर सदामा चित्त, लवलीन, लोन, लगा एमा। यथाक्रमसे विशिष्ट भावापन्न होते है। तन्मयता ( म० स्त्री०) लिषता, एकाग्रता, लोनता। ये पञ्चतन्मात्र सुखदुःख और मोहात्मक पहझारमे तन्मयामक्ति ( मं० स्त्री० ) भगवान्में दत्तचित्त हो जाना उत्पन्न हुए हैं, इमलिए करना होगा कि, इन पांच तन्मात्र (म को ) तदेव एवार्थे मावच वा मा मात्रा तन्मात्रके सुख-दुःख और मोह ये तोन धर्म हैं प्रथोत् शब्द यस्य. बहुव्री० । सांख्यमतानुसार सूक्ष्म पमित्र पञ्चभूत; तन्माव आदि क्रमश: सुख दुःख और मोहादि रूप धर्म- शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध । मत्व, रज और तमोगुणा विशिष्ट होनके कारण अनुभवयोग्य होते है। अतएव मिका प्रजातियोंसे महत्तत्व उत्पन्न होता है । महत्तत्वका इस जगह समझना होगा कि. जो अवशिष्ट भावापन अपर पर्याय है-बुद्धितत्त्व । पातम्मानका मूक्ष्मत्व हेतु है, उसका सुख दुःखादि रूप उम त्रिगुणात्मक महत्तत्त्व विगुणान्वित अभार हारा विशेषरूपसे अनुभव नहीं किया जा सकता। जैसे- उत्पन होता है। यह पहशार भी तोन प्रकारका है- किमो सुललित शब्दको सुन कर मुख और विक्षत शब्द माविक पहार, गजस प्रहार भोर तामम सरकार। सुन कर दुःखका अनुभव होता है, तथा यदि वह सुन- राजम प्रहार के साथ सात्विक अहङ्गारमेंस एकका लित और विकत गब्द अति सूक्ष्ममावसे होता तो, सुनर्नमें दश इन्द्रियों तथा तामम अहहार और राज प्रसारक नहीं पाता, मुतरां उसमें मुख वा दुःख कुछ भी नहीं म योगमे पञ्चतन्मात्रको उत्पत्ति होती है और अल्प होता । महत पहार और पञ्चतन्मात इन सात इन्द्रिया साविक सम्बन्ध होनसे उसका लिङ्ग उत्पन होता है : भोर भूत के कारणत्वके कारण दर्शनविदोंने इनको प्रति निङ्ग अर्थात् अनु त स्वभाव वाद्यं न्द्रिय अपाच का है। गोतामें मनको शामिल करके ८ प्रति कही मोहादि लिङ्ग। | गई हैं। (गीता ) गन्दादि पवतमात्र योगिया है, वे माना जिनमें मूल प्रतिमें कोई कारण नहीं है, इसलिए उसको राम त्यत्तिके अनुसार तमान शब्द निष्पन हुए, प्रजाति कामा दार्ग निकोका अभिनीत ।।