पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/२९७

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मन्द्राज में भी लाभाना, मेरोलाण्ड, भार्जियामा, स्थानों में तमाकू उत्पक होती है। माममाको तमाकू मामिला, सिराजी पाटि उत्कष्ट तमाक को खेतो बहुत सबसे उमदा और खुशबूटार, किन्तु बहुत कड़ो होतो पछी होती है। इस जिले में इन विदेशी तमा कयोंके है : जापानो लोग बहुत पच्छो तरस और कौशनमे हारा वर्षम प्रायः ५६ लाख रुपयेको प्राय होती है। इसको खेती करते है। जो किसी भी समाङ्कका व्यवहार गोदावरीके मध्यस्थ सीतानगरम् नामक होपको नौं कर सकते, उन्हें भो जापानो-तमाकू व्यवहार लहा-समाक, सबसे उत्कष्ट होती है। करने में तकलीफ नहीं होती। ____ आगकान-मान्दुवे नामक स्थान को तमाकू उत्कष्ट फिलिपाइन द्वीपुज-जगत्प्रसिद्ध मानिमा-तमाकू रन्हीं है। लण्डनमें भी इसकी कीमत ६ या ७ पेन्स फी- होपोंमें पैदा होती है । इम तमाकूसे चुरुट बहुत उमदा पोण्ड है। इसमें एक श्रेणी सर्वोत्कष्ट है, जो मार्तावान बनते हैं। यह को गवर्मण्टने पुरुटका रोजगार अपने समाकू कहलाती है, इस समाक के पोनमे ठोक मंगे-! हो हाथमें रक्खा है। एक तमाके रोजगारसे ही रस नेण्डका स्वाद और हाभानाको खशबू मिलती है। इसमे। देशमें यर्थष्ट लाभ होता है और इससे यहाँके बहुतसे पोनी-समाकू और चुरुट दोनों हो उमदा बनते हैं। लोगोको जोविकानिर्वाह होतो है। सिंहल-काण्डो, जाफना, नेगाम्बो, चिल और मटबा: पहले बङ्गालको तमाकै विषयमें जो कुछ कर चुके नामक स्थानमें तमाकूको खेती ज्यादा होती है। जफना है. उसके अलावा वहाँ सूरतो, भेनमा और पाराकामी. को समाकू विवाह र आदि स्थानों तक पहुंचती है। तमाकूको भी बहुत कुछ प्रावादी है। सूरत और भेलमा- यहाँ तमाकूको खेती खाम गवर्म गट हारा होता है। कोतमाक कलकल के निकटवर्ती स्थानों में हो पच्छी ___ पारस्य - यहाँको "मिराजो" नमाक अनि उत्कष्ट होती है। चन्दननगरके पाम मिङ्गा,रमें पाराकामो समाकू और मन पाहत है । नमकी मृदु सुगन्धि बड़ो सुहा- , और जगहमे अच्छी होतो है। चुनार को समाकू गङ्गाके वनो है। दमके डंठन पोर पत्तीको नमे फेक दी जाती तोरवर्तो स्थानाम पैदा होती है। बङ्गालको तमाकुपों में हैं। इस देशमें और एक प्रकारको निक्लष्ट तमाकू उत्पन्न मबसे उमदा और प्रसिद्ध डिङ्गलो है, उममे कुछ उतरतो होती है, जिमकी पैदावारी खुरामान प्रदेशमें ही हुई भेलमा तमाक है । मेलमा समाकूमें काफी खाद और अधिक है । शायद इम खुरामानो तमाङ्कक बोजसे ही राव देनी पड़ता है। भुरसुट परगर्ममें एक प्रकारको बङ्गालमें 'खान' तमाक को उत्पत्ति हुई है। निशष्ट तमाकू होती है, जो 'भुरस्टो' नामसे मशहर चीन-हम देशमें सम्भवतः पहले पहल पश्चिमसे हो। है । इमको गन्ध और स्वाद अच्छा नहीं, किन्तु गुण यह तमाका गाई थी। किन्तु इस समय चौनक अधिकांश है कि यह जन्नतो बहुत कम है। एक चिलम समादू स्थानों में समाक को खेती होने लगी है। यहाँ जितनी सुलगा कर. एक पादमी उसे शायद तोन घण्टे में भी न भो तमाकू होतो है, उनमें निकोटियाना टिपोकोना निबटा सकेगा। किमान लोग इमका ज्यादा व्यवहार और निकोटियाना गष्टिका ही प्रधान है। यहॉमे रूस करते हैं। खान तमाकू भी गरोगों में अधिक गज्यमें चुरुटके लिए तमाकूको रतनी होती है। प्राज प्रचलित है। कल कलकत की सरफ "बाउंस आई" नाममे जिस सूत्र. तमाकूका वहार बङ्गाल में "गुडक" नस्य, "दोहा" वत् छेदित समाकूका प्रचार अधिकतामे एभा है, चीनमें वा सुरती तथा चुरुट, सभी तरहसे समाकू व्यवात होती यही समाकू उम तरह मूत्रकाररूपमे छेदी जाती है। इस- है। 'गुडुक" ! या पोनो तमाकू का हो ज्यादा व्यव- के साथ में को और 'पवड़ी' भी कुक कुछ मिलाई जाती हार है। तम के पत्तों के छोटे छोटे टुकर बना कर है, कभी कभी इसे पफीम के पाना भी भिगोते हैं। गुड़ ( सौरा) और पानोके माथ पोखम्लोमें कूटमेसे जापान--इस देयके अपने काम लायक ही तमाकू पिण्डोसा बन जाती है, मामान्यतः इसे को "गुहुक" को खेती करते हैं। नागामिक, सिड, सासमा प्रादि वा पोनी तमाकू करत रसके बाद इसे मीठो, स्वादिष्ट Vol Ix.74