पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३३०

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सपेक्ष "ओं यमाय धर्मगजाय मृतवे चान्तकाय च । 'ओं अनिदग्धाश्च ये जीवाः येण्यदग्धाः कु मम । वैवस्वताय काला सर्वभूतक्षयाय च ॥ भूमौ दत्तेन वृतु दृप्ता यांतु पर्ग गति ॥' श्रौडम्बराय दनाय नीलाय परमेछिने । 5म मन्त्रको पढ़ कर एक अचन्नि जल देखें। वृकोदराय चित्राप चित्रगुप्ताय वै नमः।" "ओं ये बान्धवाबाधवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः । इम मन्त्र को तोन बार पढ़ कर पिटतीथ हारा तोन ते वृप्तिमखिला यांतु ये चास्मत्तोयकाक्षिणा" अन्ननि जन्न चढ़ावं । यदि ममर्थ हो, तो चतुर्दश इस मन्त्रको पढ़ कर एक अनलि जन्न देवे। तद- यसका प्रत्य क का नामोळख कर तोन तोन अनलि नन्तर- मन्न प्रदान करें। "ओं आब्रह्मभुवनालोका देवर्षिटिमानवाः । 3 के उपरान्त नपण ममातिपर्यन्त दक्षिणमुख तृप्यंत पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥ प्राचीनावोता हो कर पिटतीर्थ के द्वारा तिलतर्पण करं, अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वी निवासिना । कृताञ्जलि होकर- मया दत्तेन तोयेन वृगंतु भुवनत्रयम् ॥" “ओं आगच्छन्तु मे पितर इमं गृहन्त्वपोआँ।' इम मन्त्रमे तीन अञ्चलि जल देकर इस मन्त्र को पढ़ कर पिता का पावाहन कर। पीछे "ओं ब्रह्मस्तम्वपर्यतं अगतरप्यतु।" "विष्णु गे अमु गात्र पिता अमुकदेवगर्मा टप्यमितत् एम मन्यसे तोन अचन्नि जल चढ़ावें । तदपरान्त- मतिलोदक तम्म स्वधा " यह वाक्य तीन बार का "ओं ये चास्पा कुले जाता अपुत्रागोत्रिणो मृताः। कर तीन अलि जन्न पितरोंको चढावे। इस तरह ते वृष्यंतु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम ॥" पितामह, प्रपितामह, मातामह, प्रमातामह और वृद्धप्राइस मन्त्रसे मानवस्त्र निचोड़ कर भूमि पर एक बार मातामहको भी मतिल तोन अचनि जन देव । जल छोड़ना चाहिये। "विष्णगे अमु गात्रा माता अमुको देवो टप्यतामे- "ओं पिता स्वर्ग: पिता धर्म: पिता हि परमं तपः। तत् सतिलादक तस्य म्वधा।' इम प्रकार कह कर पितरि प्रीतिमापने प्रीयंते सर्वदेवताः॥" सतिल तीन अनलि जल देखें। इस मन्त्रसे पिताके चरणोंको नमस्कार करें। प्रति तत्पथात् पितामहो और प्रपितामहो को भी इस तरह- दिन तपण करनमें अशक्त होने पर- म तोन अञ्जलि जल प्रदान करें। मातामहो, प्रमाता “ओं आवह्मस्तम्बपर्यंत जगत्कृप्यतु ।" दम मन्त्रमे तीन बार जलाप्चलि दे कर तर्पण महो, हडप्रमातामहो, विम ता, पिलव्य, मातुल और सम्पव किया जा मकता है। माता प्रादि मभौको एक एक अञ्जनि जान देवे। पिततप गा समान कर भोपाष्ट नाम भोमका तपंगा संक्षेपमें तपंण मन्त्रान्तर- "आब्रह्मस्तम्ब पर्यंत देवर्षिपिमानवाः । करना विध्य है। भामाष्टमोके अलावा भोमके तर्पा कृप्यन्तु सर्वे पितरो मामातामहादयः॥ करनिकी जरूरत नहीं। अतीत कुलकोटीनां सप्तद्वीपानवासिनां । भीमतपंगा-- आब्रह्मभुवनाको कादिदमस्त तिलोदकम् ॥" "भों वयाप्रपद्यगोत्राय सांकृतिप्रवराय च । शूद्र और यजुर्वेदियोको तर्पणकालमें "तृप्यतु अपुत्राय ददाम्येतत् सलिलं भीष्मवर्मणे ॥" शब्दका प्रयोग करें, जैसे-"ब्रह्मा तृप्यतु" "मनकच इस मन्त्र को पढ़ कर एक प्रचलि जल चढ़ावें। सनन्दब" इस मन्त्रको उत्तरमुखो हो, पढ़ कर दो "ओं भीष्मः शस्तनवो वीर: मत्यवादी जितेन्द्रियः। प्रचलि जल चढावें। आमिरद्भिर वनोतु पुत्रपौत्रोचितां क्रियां।" 'कुरुक्षत्र गया गंगा प्रभास-पुष्कराणि च । इस मन्त्रके हारा भोपको नमस्कार करें। पनन्तर- तीर्थाभ्येतानि पुण्यानि तर्पणका भावह