पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/३६१

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प्राय बचीय नहीं है। ब्राह्मण सर्दार ताजिया नहीं सालदुम, पत्नी, दोघ स्कन्ध, अजठुम, पराज, मधुरस, बनात। मदाव्य, दोघं पादप, चिरायुः, तरुराज, दोघ पत्र, गुच्छ- भारतवर्ष में जूनागढ़ पादिकी तरफ ताजियाको से पत्र, पासबलु, लेख्यपत्र और महोबत है। कर हिन्दू और म सलमानों में परस्पर बड़ो भारो लड़ाई भारतकं नाना स्थानों में बरमा, सिहल, सुमात्रा, हुआ करती है। मुहर्रम देखा। जावा पादि होपोंमें, तथा फारसको खाड़ोके तटस्य प्रदे ताली (फा० वि०) १ अरब मम्बन्धी, परबका। (पु.) यौमें ताड़के पेड़ बहुत पाये जाते है । बङ्गालमें सालाबके २ अरवका घोड़ा। ३ शिकारी कुत्ता। (स्त्री०) ४ किनार हो इसके पेड़ देखे जाते हैं। हमको जंचाई परबकी भाषा। लगभग ७६० फुटको होतो हे मोर मोटाई ५। फुटसे ताज़ीम (प. स्त्री. ) सम्मान प्रदर्शन, मुक कर सलाम अधिकको नहीं होती। करना इत्यादि। तामिल भाषामें ताल-विलास नामक एक अन्य है ताजीमोसरदार ( फा• पु० ) बड़ा सरदार जिनके आने जिममें ताल-पेड़के ८०१ प्रकारके गुणांका परिचय वर्णित पर राजा या बादशाह उठ कर खड़े हो जाते है। है, इस वृक्षका प्रत्येक भाग किसो म विसो काममें माता ताटक (म० पु०) १ श्राभूषणविशेष, एक प्रकारका गहना हो है। जो कानमें पहना जाता है, करनफ ल, तरको । २ छप्पय पुराना ताड़का पेड़ ही अधिक काममें पाता है। के २४वें भेदका नाम। ३ छन्दविशेष, एक प्रकारका __यह जितना पुगना होता जायगा उतना हो यह कड़ा छन्द । रसके प्रत्येक चरणम १६ ओर १४के विरामसे और काले रङ्ग का होता जाता है। ३. मात्राएं होती है और अन्त में मगण होता है। इसको खड़ी लकड़ो मकानों में लगती है। लकड़ो ताटक (स० पु०) ताद्यते ताड़ पृषो. डसा ट: तथा भूतो. खोखलो करके एक प्रकारको छोटो नाव भो बनाई sचि बसा. बहुव्रोः। कर्णाभरणविशेष, कानमें जाती है। मिहलके जफना नामक नगरका ताड़का पहननेका एक गहना, करनफ ल, तरको। पंड़ बहुत प्रसिद्ध था। अनेक प्रकार के द्रव्य प्रस्तुत होने के साटस्थ्य ( म० लो० ) तटस्थस्य भावः ष्यत्र । १ प्रोदा- कारण इसको लकड़ो दूर दूर देशाम भेजी जाती थी। सोन्य, उदासीनता । २ ने कव्य, वह जो समीपमें है। डाकर हाइटने परोक्षा करके यह देखा था कि साड़को ताड़ (स० पु. ) चुरादि० तड़ भावे पच्। १ ताड़न, लकड़ो सालको लकड़ीसे किमो अंशमें निकष्ट नहीं है। प्रहार, चोट, पाघात। २ गुणन। कर्मणि अच। इसके पत्ते के डंठला के रेशेसे मजबूत रस्से तैयार शब्द, ध्वमि, धमाका। ४ मष्टिपरिमित वृणादि, घास, होते हैं और मत्यजोवोगण उनसे एक प्रकारका सन्दर अनाजके डंठल प्रादिको अटिया जो मुट्ठोंमें पा जाय, जाल बनाते हैं। पत्तासे पंखे बनते हैं और छप्पर छाए जुट्टी। ५ पर्वत, पहाड़। ६ हस्तका पलहारविशेष, जाते हैं । दक्षिण के देशों में बहुत जगह कागजके बदल हाथका एक गहमा। ७ मूर्ति निर्माण विद्यामें मूर्ति के इसके पत्ते को हो निवन पढ़ने के काममें लाते हैं। इससे जपरी भागका नाम । ८ सालक्ष, शाखारहित एक बड़ा बहुत पासानीसे दियामलाईके बकस तैयार होते हैं और पेड़ । यह पड़ खर्भके रूपमें अपरको घोर बढ़ता चला खर्च भी कम पड़ता है। प्राचीन कालमें ताल-पत्र जाता है। इसके केवल सिरे पर ही पतं होते है। पर ग्रन्थ लिखे जाते थे। ये पतं चिपटे मजबत डण्ठलोंमें चारों ओर इस प्रकार साल वृक्षक रससे प्रधानतः सिरका, सारो चौर मद्य फैले रहते हैं जैसे पक्षियोंके पर। इसकी लकड़ीको प्रस्तुत होता है। भीतरी बनावट सूतके ठोस लच्छोको तरस होती है। ताड़का रस तेजस्कार, मानाशक तथा ताजो अव: अपर गिरे हुए पोंके डंठसीके मुखरह जानेके कारण सा अत्यन्त मधुर होता है। यदि प्रतिदिन प्रातःकाल शस सरखरी दिखाई पड़ती है। इसके संस्नान पर्याय- नियमपूर्वक इसका रस पोया नाय, तो वह गरीरम Vol. Ix. 90