पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४०

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टीका धने, चिकने और परिष्कार चमड़े वाले बच्चे के शरीरमें कर सजन पड़ जाती है और ग्यारंभ दिन बास ही सर्वोत्कष्ट नीर पाया जाता है। माश माथ वही और भी फैल जाती है, मगर मध्य भागकी सूजन कुछ नौर ले कर टोका लगाना ही प्रशस्त है। यदि उस कम जातो है। चारों ओरके फूले हुए स्थानका घेरा लग सरहका बच्चा न पाया जाय तो पन्तमें क्षित नीरसे ही भग १ इञ्चसे ३ इञ्च तक हो जाता है। पोछे सेरहवें या टीका लगाना पड़ता है। लेकिन यह जरूरी है कि अच्छा चौदहवें दिनमें वर फोड़ा सूखने लगता है और एक नोर जब तक न मिले, तब तक टोका बन्द रखना हो सभाहके भीतर एक दम मर मिट जाना है। अर्थात् उचित है । एक परिपक्क क्षतको कुछ चोर कर उससे जो पचोस दिनमे ज्यादे फोड़ा रहने नहीं पाता है। पोई म निकलता है, उनसे ५।६ मनुष्योंको टोका लगा वह स्थान गोल, भाजीवन लोमशून्य कुछ निज और मरते हैं और भविष्यमें ५।६ मनुष्योंको टीका लगानिक विन्दमय वा सूक्ष्म छिद्रयुक्त रह जाता है। लिये हायो दाँतको बनो हुई मौकके मुंहमें रस लगाटोका लेने पर प्रायःहो, चर्म को सक्षमता, पाकयन्त्र- कर ही काम चल सकता है। को विझला और बगन को शिराका फूलमा पादि उप- टोका किस तरहने लगाया जाता है, अब उपका द्रव देखे जाते हैं। यद्यपि ये मब उपद्रव उतने कष्टकर मक्षिा विवरण यहां दिया जाता है। बाहुका अपगे नहीं है, तो भो गरमें एक प्रकारको पीडा मालम भाग हो टीका लगानका उपयुक्त स्थान है। इस स्थानके पड़तो है । टीके के पानुपङ्गिक उपसर्ग के लिये चिकित्सा चमड़े को खोंच कर उसे एक परिष्कार सुतौण बोजा को जरूरत नहीं पड़तो। कभी तो टोका बहुत ममय बक्षित कुरो के मुंहसे कुछ टेढ़ा कर के चोर देते हैं। वाद तक रह जाता और कमो शोघहो सूख जाता है। जो चमड़े को छोड़ देने पर वह मीर छिव स्थान पर रुक टोका अच्छी तरहसे उठ कर नियमित रूपसे सूख जाय, जाता है। फलतः चम में बीज प्रवेश और शोधित वहो वमन्सनिवारक है, अन्यथा उस टोकेका कोई फल करामा हो टोका लगाने का उद्देश्य है। एक स्थान पर नहीं। टोका लगानिसे यदि वह न उठे, तो हम आशक्षाको दूर प्रायः देखा जाता है, कि टीका कई जगह अधिक- करने के लिये प्रत्ये क बाहु पर इसकी दूरी पर कममे सर नहीं उठता है। इसके कई एक कारण हो सकते हैं। कम तीन जगह टोका लगाना कर्तव्य है । सोकमें पहला टोका लगानेवाले विशेष अभिन्न नहीं है और उप यदि नीर सूख गया हो, तो उसे पहले उष्ण जल वा युक्त परिमाणसे नोरका प्रयोग नहीं करता दूसरा नोरको वाष्पमें डाल कर सलाई के मुँह सक लगाये रहना अनुपयोगिता, तोसरा यत्र और सतर्कताका प्रभाव । चाहिये। बहुतेरे डाकर चमड़े को समान्तर भावमें पूससे अनेक समय टोका के निष्कन्न नहीं होने पर भी पोर थोड़े आड़े करके चोर देते हैं। कोई तो केवल वह अभिप्रेत फलोत्पादन नहीं करता। चोथा बहुत टुअबो भर भागमें अमेक बार भेद कर ही उनमें नोर पुराने नौरका व्यवहार। लगा देते है। फिर अनेक डाकर ऐसे भी है जो मिद डा० सिटन साहबने परीक्षा करके कहा है, कि पूर्ण- हुए स्थान के चमड़े को आड़े करके काट डालते हैं। रूपसे टीका ले नेका फल सम्म क टोकेको अपेक्षा ३० शेषोक्त प्रकारका टोका लगाना ही डा० सिटनके मतसे गुण वसन्तनिवारक है और सबसे निशष्ट टोका भो मर्योल ट है । अच्छी तरहसे टोका लगाये जाने पर वह टोका नहीं मेनिको पपेक्षा ४७ गुण वसन्तनिवारक स्थान २।३ दिनमें सूज जाता है। ३।४ दिनमें लाल और है। पोर भी देखा गया है, कि टोका लेने के बाद भी कठिन हो जाता है और ५६ दिन में एमके मध्यभाग यदि शीतला रोग हो जाय, तो वह उतना मारामक पर कुछ सफेद फुसो निकन्न पातो हैं। इस पीप निक- नहीं होता तथा प्रारोग्य होने पर शरीरको उतना लतो है। पाठवें दिनमें टोका ठोक अवस्था पर जता विक्कत नहीं कर डालता। .. है। मवें चौर दशवें दिनमें इसके चारों ओर लाल हो एकवार टीका लिये जानेके बाद कितने दिन तक