पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४१५

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उसमे उसके भीतरका जल बर्फ में परिणत हो जायगा जिस तरह कठिन हव्यो व वरने में समान उत्ताप एवं बर्फ होते समय उमके प्रसारणका बल इस तरह प्रयोग नहीं होता, उसी तरह द्रव द्रव्योंके वाष्य करने में प्रबल हो उठेगा कि वह लोहमय पात्र फट जायगा। भी समान उत्तापको पावश्यकता नहीं होतो। भित्र शोतप्रधान देशाम, रात्रिकालमें शोतके प्रभावमे जल- ' भिनव द्रवा भिव भिव उष्णतासे वापाकार धारण प्रणालोका जल जम जानसे कभी कभी नल फट जाते करते है। सुरासार, जल, सानिल पोर पारा इन द्रव द्रवोंको खोलाने के लिये यथासामसे फारमहोटके २७३, पर्वताक ऊपर जो दृष्टिका जल गिरता है, उसका । २१२. २१६और पंच परिमित गरम करना • कुछ अंश छिद्रादिमें प्रविष्ट होता है। पीछे शीत हारा । चाहिए। जब वह तुषाररूपमें परिणत होता है, तब प्रमारणके एक जामिको कठिन वस्तुएं जिस तरह एक प्रकारको कारण प्रस्तरखगड विदोग हो जाते हैं। उष्णताम द्रव होती है उसी तरह. एक जातिको द्रव कठिन ट्रव्य उत्तप्त होनेसे वाष्य होते हैं। कागज, काष्ठ : वस्तुएं भी ममान परिमाणमें उण होनेसे उबलने लगती प्रभृति कितने हो कठिन द्रव्योको जैसे गम्माया नहीं जा! हैं। जैसे-सब देशों और सब ममयों में १०० वा सकता, उमो प्रकार मेद और नारिकेल-तेल प्रभृति कति- ३२० फा प्रमाण अरुण होनेसे पानी खौलने लगता है। पय तरल द्रव्योंको भो वाष्यीय रूपमें परिणत नहीं किया पहले लिखा जा चुका है, कि भूतलस्य सभी पदार्थ जा सकता : उत्ताप के कारण इनके उपादान पृथक् पर वायु-गशिका दबाव है। उस दबावका प्रतिक्राम अथवा भिन्न प्रकारसे मयुक्त होते है। कपूर पायटीन बिना किये द्रव द्रव्य कभी खोल नहीं सकते । वास्तव में ( अरुणक ) प्रभृति कतिपय कठिन द्रव्य द्रव न हो कर जब किमो द्रव द्रव्य सम्म त वाष्यको प्रसारण-भक्ति वायु- एक दम वाष्य हो जाते है। मभी वाष्योय टव्य अधि- गथिक दवावक समान होती,सभी वह खौलता। कोश वण हीन और स्वच्छ होते हैं। कंवल भायदोन जब वायुराशिका दाब:३० बच पारदक्के ममान होतो प्रभृति कुछ द्रव्यांका वाष्य वर्ण विशिष्ट होता है। वाष्य है, केवल लसी समय फारनहोटके २१३ में जल और वायुमें कोई विशेष प्रभेद नहीं है। वाष्यको वायः उबल उठेगा। दाबके न्य नाधिक होने से स्फुटन-बिन्दुका व्यता नमित्तिक पार वायुको स्वाभाविक होतो है। (Boiling point ) भी न्यानाधिक्य होता है। जो पदार्थ म्वभावतः तरल होते हैं, उनके परिणामसे पर्वतोंके अपर वायुराशिका दबाव अपेक्षाहत पल्प जो वायुवत् द्रवा उत्पन्न होता है, उसे वाष्प कहते हैं। होनसे वहाँ अपेक्षाकृत पल्प उत्सापसे जल सौम्लाया जा वायवोय वस्तुओंको तरह वाष्प भी स्थिति-स्थापक हैं। मकता है। . उष्णता और दवावक तारतम्यानमार वायवीय द्रव्यों में परोक्षाके हारा निरूपित हुआ है कि जिवना जपा प्रायतन-वृद्धिका जसा तापतम्य है, वाष्य-ममुहका भी चढ़ा जायगा, उतना हो प्रति ५३० फुट में स्क टनबिन्दु ठीक वैसा हो तारतम्य हुश्रा करता है। फारनहोटका १ अंश कम होता जायगा। पर्व तो को शतांशिक में एक मश परिमाणमें उष्णताको वृद्धि उच्चता. नापनका यहो एक उपाय है। होनसे वायवीय और वाष्योय वस्तुमों का पायतन , वायुनिष्काशन-यन्त्रक पाभरण-पावके भीतर एक जन- वा ०३६६५ परिमाणमें वहित होता है, अर्थात् १ घन पूर्ण पात्र रख कर वाय निकाल देनेसे पानस्थित जल रक्ष या १ घन. फुट किसी वायु या वायको उष्णता यदि ७० फा परिभित उष्णतामे भी जोरसे खोलने लगता है। .१श बढ़ाई जाय, तो उसका आयतन २४.या००३६६५ फलतः ऐसा कोई नियम नहीं कि उष्ण होनेसे अन्न धन रस या घनफुट प्रमाण होगा। इस तरह २७३: सबलता है,यां उबलनेसे जल गरम होता है। श प्रमाण सापको सहि होनसे . ताप दुगुना हो द्रव द्रव्य जब खौलने लगी., तो उन्हें कितना ही उत्तम जायगा। बोन किया जाय, किसी तरह भी उनको उचाताको