पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४६३

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तारकासुर-पारपर ४५६ उदय होते थे, वायु पनुकूल हो कर सर्वदा मन्द मन्द करतो हुई स्वस्थानको खोटो। बाद पार्वतीजी शिवजीको बहतो थो। तीनों भुवन तारकको पानी प्रधान हो पति बनाने के लिये घोर तपस्वामें महत्त । बहुत दिन गये थे। देवगण उमको सेवा करते थे। जिसने ऋषि तपस्या करने के बाद पार्वतीने महादेवको पतिरूपमें थे, वे उसके दूतका काम करते थे। देवतापोंके हव्यको पाया। अन्त में विवके साथ पार्वतीका विवाह हो गया। तारकासुर हो ग्रहण करता था। विवाह हो जाने के बाद जब शिवजीके पार्वतोसे कोई अन्त में जब देवगण इस दुःखको मह न सके, तब पुत्र न एमा, सब देवगण फिर भी घबरा छठे। महा- एक दिन मब कोई मिल कर ब्रह्मा के पास गये और देव और पार्वती कोड़ामें पासत थे, इस कारण उनके अपना अपना दुखड़ा रोया । ब्रह्मान कहा "शिवके पुत्रके पास कोई जा नहीं सकते थे। इधर तारकासुर दिनों अतिरिता तारकको और कोई मार नहीं सकता । हिमाः दिन अधिक अधम मचाने लगा. देवगण लाचार हो लयके शिखर पर शिवजी तपस्याकर रहे हैं और पार्वती दो किकत्तव्य विमूढ़को नाई रहने लगे। बाद पग्नि सखियों के साथ उनको परिचर्या कर रही है। तुम लोग कपोत कारूप धारण करके महादेवके पास उपस्थित जा कर ऐसा उपाय रचो कि उनका मयोग विवके साथ हुई। शिवजोने न्यौहों कपोतरूप धारो पम्निको देखा, हो जाय। शिवजीके पुत्र के बिना तारकको मारमेका त्यों ही उसे कहा, "हे कपटरूपधारो कपोत, तुम कौन कोई दूसरा उपाय नहीं है। हो ? तुम्हों हमारे वीर्य को धारण करो।" इतना कह इन्द्रादि देवगण रतिके साथ कन्दप को लेकर शिवजी- कर उन्होंने वोर्य को अम्निक अपर डाल दिया। उसो का तप भङ्ग करने के लिए हिमालय पहाड़ पर उपस्थित वीर्य मे कात्तिक य उत्पन्न हुए। कात्ति केय देगे। हुए। कन्दप के यहां पहुंचने पर वसन्त पूर्ण भावसे कार्तिक उत्पन होने पर देवताओं ने उन्हें अपना विराज करने लगा । शिवजी अकालमें वसन्तका भावि- मेनापति बनाकर तारकासुरको मारने के लिए शोणित. र्भाव देख कर तपश्चर्या में तन-मनसे लग गये। पर भेजा। इस ममय पावती पुष्पक पाभरणसे भूषित हो कर हम पुरमें तारकासुरके माथ धममान युद्ध हुपा, दश शिवपूजाके निमित्त महादेव ममीप पहुंची। दिन तक बराबर लड़ाई होती रही। उसके बाद तारका. कन्दप के प्रभावसे पाव तो विक्षत भावापन हो गई। सुरको मैन्य क्षीण होने लगो, बाद कार्तिक कठिन महादेवको भो चित्तविकति उपस्थित हुई। शरसे तारकासुर मारा गया। इस समय महादेव क्षणकाल विचार कर बोले 'क्या ! । (शिवपु. १.२०१० और देवीभागवत) ईखर हो कर दूगरको स्त्रोका अङ्ग स्पर्श करना तारकित (मलो० ) सारका सञाता प्रस्थ तारकादि मुझे उचित है ? जब मेरे हो चित्तमें ऐसी विकति जाग त्वात् उतच् । नक्षत्रयुक्त, वह जो तारीसे शोभित हो। उठेगी तो क्या क्षुद्र मनुष्य दुष्कर्म नहीं कर सकते ! तारकिन् ( मं० त्रि०) तारकाः सम्यत्र पनि । तारकायुक्ता, एमा मोच कर वे फिर तपश्चर्या में नियुक्त हो गये। तागेमे भरा। शिवजो पासमवद हो कर भो चित्त स्थिर न कर तारकिनो (सं. स्त्री० ) तारविन डी । नक्षत्रयुक्त रात्रि, सके । अनुसन्धान करके इसका कारण देखा कि कन्दर्प सारोंसे परिपूर्ण रात । रति के साथ उनका तप भङ्ग' करने के लिये पास हो, सारकूट (हि.पु.) एक प्रकारको धात जो चाँदी पौर खड़ा है। इसे देख कर शिवजीने ऐसो क्रोधभरी दृष्टि पोतलके योगसे बनी है। उसको पोर डालो कि कन्दपं उनके नेत्रोंसे निकली हुई तारक सर ( स० पु. ) पौषधविशेष, एक प्रकारको दवा। अग्निसे उसो समय ढेर हो गया। इसको प्रस्तुत प्रणाली-पारा, गन्धक, लोहा, बा, अनक, मदन ( कन्दर्प) के भस्म हो जाने पर शिवजीने वह जबासा, अबधार, गोखरूक बोज पोर हड़ न सबको खान छोड़ दिया। पाव तो भो अपने आपको निन्दा बराबर देकर घिसते बाद फिर पेठेके पानो, पक्षमूल