पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४६४

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तारकेश्वर-तारतम्ब के काढ़े और गोवा के रमको भावना देकर उमे घाटते ' तारक्षिति ( स. पु. ) तारा उच्चा क्षिति यंत्र। देश भेद, चौर दो दो रत्तोको गान्नियां बना लेते हैं। इन गोलियां - एक देश जो पमिममें १८१८।२० नक्षत्रों में अवस्थित है। को शहदक माथ ग्वाना चाहिये । इसका पथा बकगेका : यहां मच्छोंका निवास है। दूध, चीनी और ईवका रम है। हम पोषधक सेवनमे : मारघर (हि. पु. ) वह स्थान जहमि तारको खबर बहुमूत्र रोग दूर हो जाता है। (भैषज्यरत्ना०) भेजी जाती है। मग नका - रममिन्दूर, लोहा,बङ्गा, अधक रन मबको तारघाट (हि. पु०। कार्यमितिका योग, व्यवस्था, प्रायो- बगबर लेकर मधुके माथ एक दिन तक धिमते हैं और जन। बाद एक माप परिमिन गोलियां बनाते है । इमका त रचरबो (हिं० पु. ) चोन, जापान प्रादि देशों में होने अनपान मधुमयुक्त पक्क यजडम्बरका च ण है। इसके बाला मोमचोना नामका पेड़ । इसके फलमें तोन बोज- मवन करनेमे बहमूत्र रोग जाता रहता है . कोण होते हैं। ये चरबोसे भरे रहते है। चीन और (भैषज्यरत्नावली प्रमेहाधिकार ) ! जापानमें मोमबत्तियो सो पेड़की चरबोसे बनती हैं। तारकेश्वर-गली जिले के अन्तर्गत एक पुण्य स्थान । यह इनके बीजोंसे भी एक प्रकारका पोला तेल निकलता है, अक्षा. २२.५३ ७० और देशा ८८४ पू० में अवस्थित ! जो दवा और रोगन के काममें अाता है । है। तारकेश्वर के लिङ्ग और उनके मन्दिरके लिये यह तारज (सं. पु० लो०) धातव ट्रयभेद । स्थान अत्यन्त प्रसिद्ध है। सारटो (म स्त्री० ) तार दी दंग्यो । ____ कालोघाटमें नकुलेखरको जिम तरह उत्पत्ति हुई। तारण (म पु० ) तारत्यनेन ल्यु । १ तेलक, तेलो । है, बहताका कहना है कि तारकेश्वरको उत्पत्ति भो उम।। कत्तरि ल्यु । २ विष्ण, । (वि० ) ३ तारयिता, तारन- रह है। किमी प्राचीन पुराण अथवा तन्त्रमें इमका । वाला, उद्दार करनेवाला । भावे ल्युट । (को०) ४ तारण विवरण नहीं रहने के कारण यह अाधुनिक प्रतोत : कारण, पार उतारने की क्रिया । ५ उद्धारण, निम्तार । ६ होता है। तब भी यह दो तोन मो वर्ष से पहलेका षष्टि मवत्सरका अष्टादश वर्ष भेद, साठ मवत्सरीमेसे है। भविष्य ब्रह्म खण्ड ( ७५८ ) में इम लिङ्गका उल्लेख है। अठारहवां वर्षे । दम तारणवर्ष में अत्यन्त वृष्टि होतो है, तारकेश्वर गढवासियों के परम भक्ति के देवता है।। जिसमे धान्य इत्यादि दूसरे दूसरे अनाज नट हो जाते है। ( ज्योतिस्तत्व ) उनके निकट सकड़ों दुःसाध्यरोगियोन प्रारोग्य लाभ चतुर्थ हुताश नामक टतोय वर्ष का नाम सारण हैं, किया है । बहतमे राढवामी अब भी बाचा तारकनायके मामसे डरते हैं। शिवरात्रि और चड़क-मंक्रान्ति दिन , , इसमें अत्यन्त दृष्टि होतो है। (वृहत्सं० ८१३५) षष्टि म्बत्सर देखो। यहाँ बहुत उत्सव होता है, जिसमें लगभग ५०६० हजार यावी एकत्र होते हैं। तावखरमें बहुत आमदनो तारगि ( म स्त्रो० ) तार्यतेऽनया ट णिच अनि । होती है जिसे वहकि महन्त उपभोग करती है। मोका, नाव। पहले तारकेश्वर जाते ममय बहुतमे मनुष्य दुर्दान्त- तारणा ( स० स्त्री० ) तारणि डोए। कश्यपको एक डकैतोंमे आक्रमण किये जाते थे। एम यात्रामें यात्रियां- पानी जो याज और उपयाजको माता की जाती है। का कितना कष्ट झेलना पड़ता था; वह अकथनीय । तारणय (सपु.) तारण्यः अपत्य ठक। तारणोक अभो तारश्वरके पास रेल-स्टेशन हो जानसे उनका वंशज । कष्ट भोर भय सदा के लिये जाता रहा । इमसे सारकेश्वर- तारतगडुल ( स• पु० ) तारं मुक्त व सभ्रस्तुण्डम्तो यस्य । के यात्रियों को संख्या भी बढ़ गई है। ___धवल यावनाल, सफेद ज्वार। तारकोपनिषद ( मं० स्त्रो० ) उपनिषद भेद, एक प्रकारका तारतम्य (म० की.) १ तरतमयोर्भावः तरतम-यम् । उपनिषद। १न्य नाधिक्य, एक दूसरेसे कमी बेशीका हिसाब । २