पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/४६५

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वारसम्पपोष-वारमाक्षिक उत्तरोत्तर न्य नाधिक्य के अनुसार व्यवस्था, कमोबे शोके पेड़से निकलता है। जमीनसे दो हाथ जपर चोड़के हिमावरे सिलसिला। २ गुण, पग्मिाण प्रादिका परम्पर पड़में एक खोखला गड्ढा काट कर बनाया जाता है मिलान । और उसे नोचेको ओर कुछ गहरा बना दिया जाता है। तारतम्यबोध ( स० पु. ) कई वस्तौम भरे वुर पादिको इसी गडं में चोड़ का पसेब निकल कर गोदके रूपमें जमा पहचान। होता है, जिसे गन्दाविरोजा कहते हैं। इस गोंदसे तारतार ( स० लो० ) तारयतोति तार तत्प्रकारः प्रकारे भवका द्वारा जो तेन्न निकाल लिया जाता है, वही तार हित्व। मांख्यशास्त्रोक्त गौण टतोय सिद्धिभेद, मांख्यके पोनका तेल कहलाता है। यह ओषध के काममें प्राता अनुसार गौशकी तोमरो सिद्धि । आगमक अविरोधी है। दर्द के लिये यह गमवाण है । न्यायद्वारा अर्थात् युक्तियुक्त तर्क द्वारा आगमके अर्थ को : तारपुष्प ( सं• पु० ) तारं रजतमिव पुष्पं यस्य । कुन्दन, परीक्षा कर मशय और पूर्वपक्ष निराकरणहारा उत्तर- , कुन्दका पेड़ । पक्षका व्यवस्थापन करना हो मनन समझा गया है, इससे तारबर्की (पु.) वह तार जिममे बिमलोको शक्ति द्वारा जो मिदिमाभ होतो है, उमौका नाम तारतार है। यह समाचार पहुंचाया जाता है। गौरसिधि है। सिद्धि देखो।। तारमाक्षिक ( स० क्लो. ) तार कप्यमित्र माक्षिक। तारतार (हि. वि. ) जिसको धज्जियां अलग अलग हो उपधातुभेद, रूपमक्खो नामको एक उपधातु। उपधातु गई हो, टकडा टकड़ा, उधड़ा हुआ। ७ हैं, जिनमें तारमाक्षिक चांदो को उपधातु है, यह धातु तारतोड़ (हि० पु. ) कपड़े पर किया हुआ सुई का एक चॉदोकं ममान गुणवान्नो है। इम। कुछ चांदो मिलो सरहका काम, कारचोबी। रहने के कारण इसको तारमाक्षिक कहते हैं। चोदोको तारदो ( स० स्त्री० ) तरटो एव स्वार्थ अण-ततो डोष । अपेक्षा अप्रधानता होनके कारण हममें गुण भो कुछ कम तग्दी वृक्ष, एक प्रकारका कांटेदार पेड। हैं। ताग्माधिक सिर्फ चांदोका गुण हो नहीं, बल्कि तारन (हिं पु०)१ वतको ढाल, छाजन को ढाल। अन्चान्य द्रव्यों के मिश्रित रहनसे अन्य गुण भी मौजद है। २ छप्परका व बांस जो कड़ियों के नीचे रहता है। विशुद्ध तारमाक्षि॥ किञ्चित् तिक्तम युक्त मधुररस, मधुर ३ तारण देखे।। विपाक, शक्रवईक, रमायन, चक्षुझ लिये हितकारक, तारमा (हिं क्रि०)१पार लगाना। २ उहार करना, क्षय, कण्ड और शिदोषनाशक है । अविशुद्ध तारमाक्षिक मुक्त करना, निस्तार करना। अविशुद्ध स्वर्णमाक्षिकको तरह मन्दाग्निजनक, पतिशय तारनाथ (संपु०) तारानाथ देखो। बलनाशक, विष्टम्भो, नत्ररोग, कुष्ठरोग, गण्डमाला और तारनाद ( स० पु. ) ताराः नादः कर्मधा० । उच्चनाद, व्रगोत्पादक है । इमलिये तारमाक्षिकका शोधन जोरकीपावाज। बहुत जरूर है। कर्णाटक, मेषशृङ्गो और जम्बोरो तारपरम-मृदङ्ग पर जो परम बजते हैं, पालाप बनातं नोबूके रमहारा तोन दिन कड़ी धूप भावना देनसे तार समय छेड़के संयोगसे ताग्म भो वे मब परम बजाये जाते माक्षि विशुद्ध होता है। हैं। सितार आदि यन्त्रां पर एक प्रकारको प्रणालोमे तारमाक्षिकका मारना - कुनथोके काथ साथ पोम गग आदिका पालाप बजाया जाता है, उसमें तालको कर तेल, मठा, अथवा बकरोक मूतसे पुटपाक करने पर नितान्त आवश्यकता होती है। उस प्रणालोके वादनको तारमाक्षिक मारित होता है। ( भावप्र.) मतान्तरमें तारपरम कहते हैं। ऐमा भी है- सूरण या जिमोकन्द के भीतर माक्षिक रख तारपानि-हिन्दोके एक कवि । इन्होंने भागीरथी लोला- कर मूत्र, कॉजी, तेल, गोदुग्ध, कदलोरस, कुलथोका क्वाथ की रचना की है। और कोदों धानका काथ, इनका स्वंद दे कर चार, प्रमा- तारपीन (हि.पु.) एक प्रकारका तेल जो चोड़के बग, पश्चलवय, तिल और घोके साथ तोन बार पुट देनसे Vol. IX. 116