पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५४४

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माय हो गई। प्रतः सोन नमन पुनः समदण्ड धारण पांच बड़े बड़े मन्दिर निर्माण कर उनके हरएका एक करने को बाध्य हुए। शेषावस्था में उन्होंने अपना समय भाग करके महायानसूत्रान्स रखा इसके सिवा उन्हों के के वन्त शास्त्रचर्चा, धर्म चिन्ता भोर मन्दिर प्रतिक्षामं यत्नमे सेरहोड़ तम्प प्रभृति कई एक शास्त्र अनुवादित विवाया। बुदाय में यथासमय वे पमिताभकं धर्म का में हुए। उस ममय भी तिब्बतमें कोई सन्यामायम ग्रहण मयुक्त हए । उनका दा प्रधान स्त्रियां भो तुषित लोकमें नहीं करता था। वे भिक्षुसङ्ग स्थापन करने के लिये नेपाल जा कर उनके माथ मिनौं । म लोकको छोड़ने के पहले (लियुन ) से बहतसे वौधमन्यामोको लाये थे। उन्होंने राजा हयग्रोव और यमपूजाविधि प्रचार कर पाये। एक अत्यन्त वृहत् व दुर्यमणिको पाया था। प्रवाद है, कि उनके बाद मन स्रोन् मन त्मन गजा हुए। इधर उम तरहका बड़ा वैय और किसोके पाम न था। उन्हों- चोनगजमे देवावतार भोटराजका मृत्य मम्बाद पाकर ने जन-गजकुमारी थि-तमुकके साथ विवाह किया। सिम्बत पर अधिकार करने के लिये बहुतमी मेनाएं भेजों। उम गमोसे उनके जोनतषा लापोन मामक एक अत्यन्त लामाके निकट धममान युद्ध इा। युद्ध में चोन-मैन्य । रूपवान् पुत्र उत्पन्न हुआ। राजाने उम पुत्र के विवाह के परास्त हुई । सिम्बतोय मेनान भो चोन राज्य पर आ लिये अपने राज्यकं चारों तरफ एक रूपवती कन्या . मण करने के लिये शवोंका पीछा किया था। किन्तु इम ढ ढनको भावमी भ जा, किन्तु उपयुक्ता कन्या कहीं भो बार वे चीना सम्म ग रूपमे पराजित हुए। इस युद्ध में न मिलो । अन्त में चोनमम्राट् बै जूनके निकट दूत भेजा वृद्ध समापति गरने प्राण त्याग किया। . . गया। उनकी कन्या काडम यन अमामान्या मन्दगे थी। चोनान पाकर लामा नगरो पर पाक्रममा किया। राजकुमारोने भो तिब्बतके राजकुमारक अनुपमरूपको सिब्बतो लोगान बहुत कष्टमे चीन गज-नन्टिनोसे लाई कथा सुन उनमें विवाह करनेको पच्छा प्रगट की। बाद औ सोनकी शाक्यमुक्ति को छिपा रखा। वह पिताकी पात्राले तिब्बतका चलो। किन्तु तिब्बत चोनाने राजभवन जला डाला। प्रक्षोभ्य मूति भो पहुंचनेक पहले हो तिब्बतके किसो सामन्ने विश्वास वे अपने साथ ले भात थ, किन्तु बहुत भारी होनेके घातकतासे राजकुमारको मार डाला था । राजा अगसषो. कारण एक दिनके पथ पर सा उसे वहीं छोड़ कर चले मने शोघहो यह निदारूण सम्वाद चीन राजकुमारीको गये। कहला भेजा। यह सुन कर राजकुमारीको शोक-सोमा २७ वष को अवस्थामें मनस्रोनको मृत्य हुई। न रहो और वह फिर चोन देशको न लौटीं। सिब्बतका पोके उनका छोटा लड़का दु-सोन् मनपो राज्यमिहामन तुषार राज्य और शाक्यमूक्ति देखने के लिये वह यहीं पर मठा। दु-मोनके गज्य कालमें ७ मावोर तिव्बतमे ठहर गई । भोटजन उन कन्याका खून सन्कार किया प्राविभूत हुए थे। ही गजकुमारीक यनसे ही तोन वर्ष के बाद पुन: दुःसोनवे पोके उनके पुत्र मेग-अगत्योम राजा हुए। पक्षोभ्य मूत्ति निकालो गई। उन्होंने अपने पितामा स्रोनसनका लिखा हुआ है उस चोनकुमारोके रूप पर भोटराज भो मोहित साम्रावासन पाया था। उसके पठनसे वे जान गये, कि हो गये। उन्होंने उससे विवाह करनेको इच्छा प्रगट उदोंके ममयमें विश्वतमें बौडधर्म ममधिक प्रबल होगा। की। पहले तो चीन राजकुमारी सहमत न हुई, लेकिन प्रभो उप अनुशामन-धाकाको सुसिद्ध करनके नियं पोछे न माल म क्या सोच कर राज से विवाह करनेको उन्होंने केलासवासी भारतीय पण्डित बुडगुह्य और राजी हो गई। म तरह पुत्र की जगह पिताने चोनराज- बुद्धशान्तिको बुला भेजा। दोनों पण्डितोन पानसे कुमारीका पाणि ग्रहण किया। अस्वीकार किया, विन्तु जो दूत उन्हें बुलाने गये थे, व नई गौमे थि-सोन दे-तसन नामक एक पुत्र पांच साग महायान-सूत्रान्त कण्ठस्थ कर पाये । पोछे उत्पन्न हुआ। सभी इस राजकुमारको मच धोका उन्होंने ही उसे तिब्बती भाषामें प्रचार किया। रामन अवतार मानने लगे। तिब्बतके इतिहासमै कोन विशेष