पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/५८७

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देखता हो। विरोभूत- तिजोतर पदर्शन, लोप । २ पाच्छादन। ३ गुमभाव, शिपाय। तियना (स. स्त्रो. नियंच-भाव सल । बनत्व, तिरका. तिरोभूत ( म. वि. ) तिरस भूत। पन्तहित, गुप्त, पन, पाड़ापन । छिपा इमा। तिर्यकत्व (स' को० ) तियं च भावत्व । १ वक्रत्व, तिगेग-मध्य-प्रदेशकै भण्डारा जिलेको उत्तगेय तहसोल। तिरछापन। यह प्रक्षा० २११ और २१४७० तथा देशा. तिय गति ( स. स्त्रो.) तिरचौ गतिः कर्मधा । वक- ७८.४३ और ८०.४० पू०के मध्य अवस्थित है। भूपरि• गति. तिरछो चाल । माण १३२८ वर्ग मील और लोकमख्या प्रायः २८१५२४ तिर्यक पातो (म त्रि०) तिय क् पमति पस पिनि । है। इस तहमोलमें ५७१ ग्राम और ११ जमोदारियों ।। १ वक्र प्रमारित. पाड़ा फैलाया हुपा।२ कुटिलत्तिा , अमोदारोष्टेटका रकवा ७६८ वर्ग मोल है, जिसमें १६३ जो कुटिन्न हत्तिका हो। वर्ग मोल जंगल है। तिर्यक प्रमाण ( म० क्लो. ) नियंक प्रमाणः कर्मधा । तिरोवर्ष (म. वि. ) तिर: तिरोहितः वर्षाः यत्र । वृष्टि- विस्तार-प्रमाण, चोड़ाई। से रक्षित, जिसका बरमासे बचाव हुआ हो। तिय कक्षा (सवि०) तिर्यक प्रेक्षण'यस्थ, बहो । तिरोहित (म त्रि. ) तिरम्-धा- । १ अन्तहित, अदृष्ट, वक्रदृष्टिकारी, तिरको नजरमे देखनेवाला । छिपा हुा । २ पाच्छादित, ढका हुमा। तिर्यक प्रक्षो (सं० त्रि.) तिय क् धक् यथा तथा तिगेला-तिरोत्राला देखो। प्रेक्षते प्रईस णिनि । वक्रदृष्टिकारो, जो तिरको नजरसे सिरोदा ( हि पु० ) तिरेंदा देखो। निय क भेद (म• पु० ) दा प्राधार पर रक्खो हुई वस्तुका तिरौर-पञ्जाबके कर्नाल तहसोल और जिले का एक बीचमें दबाव पड़नेसे टूटना। ग्राम । यह अक्षा० २०४८ उ० और देशा: ७६ ५८ पू.. तिर्यक लोक (म० पु. ) जैनमतानुमार वह लोक जहां के मध्य पानसेर से १४ मोल दक्षिण अवस्थित है। - मनुष्य, देव और नारकियों का अस्तित्व न हो । यह लोक- ११८१ई में अजमेरक चौहान राजा पृथ्वोराजी महमद __ स्थित नाडोके बाहर है। 'जैनधर्म' शब्दमें लोवर चना' देखें।। घोरको इसो स्थान पर परास्त किया था और फिर तिर्यक व्यतिक्रम (म० पु०) जैनमतानुमार दिग्वतका एक १९८२९ में आप भो यहीं पर परास्त हुए थे। इसका अतोचार। तिर्यगतिकम देखेंगे। प्राचीन नाम अज़माबाद है, क्योंकि यहां औरणजेवक । यहा आशावक तिय क स्रोतम (म• पु० ) तिय क वक्र स्रोतः पाहार- पुत्र श्राज़मशाहका जन्म हुआ था । १७३८ ईमें नादिर सञ्चारो यम्य, बहनो। पर पनो प्रभृति । भागवत में शाने इसे जोता था । पहले यह ममृद्धशालो शहर था, इनकै विषयमें इस प्रकार लिखा है-तिर्यस्रोताओं आज कल इसको अवस्था शोचनीय है। अर्थात् पशुपक्षियांक सृष्टि अष्टम है। ये २८ प्रकारके तिय । म त्रि०) तिल-निर्मित, जो तिलका बना हो। मान गये हैं। ये ज्ञानशून्य तथा तमोगुणविशिष्ट है, तिर्यक् ( म. वि. ) वक्र, टेढा, पाड़ा, तिरछा । मनुषा- ममि प्राधादिमान-परायण हैं। ये कंवल नाणेन्द्रिय को छोड़ पृथिवोके समस्त जीव तिर्यक् कहलाते हैं। वारा ही अपने अर्थ को मिवि करते हैं, इनके अन्तः कारण क्योंकि खड़े होनमें उनके शरीरका विस्तार अपरको में किसी प्रकारका ज्ञान नहीं बतलाया गया है। तिर्य- और नहीं रहता, पाड़ा हो जाता है। इनका खाया क स्रोताओं के नाम-(दो खुरवाले) गाय, बकरी, भैम, हुधा पत्र पेटमें सीधे जपरसे नोचको पोर नहीं जा कर कृष्णसारमृग, सूपर, नोलगाय, रुरु नामक मृग, भड़ भाड़ा जाता है (पु.)। र चञ्चल धातु, पारा। और जंट; (एक खुरवाले-) गदहा, घोड़ा, खच्चर, गौर तिय क बिल (स. त्रि०) तिय क वक्रभावेन चिल बक्र मृग, शरभ, सुरागाय ; ( पक्षन) कुत्ता, गीदड़, भाव पिल, जो तिरका. मिरा हो। भेडिया, बाघ, बिल्ली, खरहा, सिंह, बदर, हाथो, कछुवा,