पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०२

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उमका प्रलेप देनेसे रोगो बहुत जल्द पारोग्य हो जाता बुषिपदायक है। चार प्रकारके तिलोमैसेजतिल है। तिलका लह, तिलकुट, तिसका बड़ा आदि मिल- मबसे उत्तम, शुक्नतिन मध्यम पोर रतवर्षादि तिम्ल द्रय पर्थ रोगोका पथ्य है। तिल घोर सिम्मका तेल प्रामा. अधम माना गया है। (भावप्रकाश ) भय तथा मूत्र रोग बड़े कामको चोज है। यह सिग्ध जंगलो तिनको उपतिल कहते है। इस तेल के गुण- कारक है। रज-रोध रोगमे तितका चर्गा कमर-भर गरम अलकार, बालको हितकर, कषाय, उण, तीक्ष्ण मधुर, जम्नम डाल कर यदि उसमें रोगी खड़ा रहे, तो वह सित, बलकारक, कफ, वात, व्रण और कनड नायक, बहुत जल्द पारोग्यता प्रान कर मकता है। तिम्ल-सिद्ध । कान्तिप्रद, वस्ति, अभ्यङ्ग, पान, नस्य, कण पोर पक्षि- जनम चोनी मिला कर रखनमे खामी जातो रहता है। पूरणमें हितकर है। (राजनि० ) तिन और तोमो सिह जलसे कामोद्दीपन होता है तथा तिल तैल-सरसोको नाई तिन भो धानोमें फट कर बन्ध्यादोष भी दूर हो मकता है। पग्नि-दग्ध स्थानमें तेल निकलता है। तिलतल स्वच्छ, परिकार पोर सरल सिल पोस कर लगानमे चंगा हो जाता है। सिसका फल होता है। इसका वर्ण मलिन पोताम रखा है। इसमें गध चक्षुरोगका भव्यर्थ महोषध है । मृदु विसूचिका, पामा नहीं होती, पुराना होने पर भी यह न तो गाढ़ा होता भय, दमा, पोनस, श्वेत प्रदर और मन नालोके रोगोंमें पोर न सड़ीब हो निकलती है। भारत में तिल-तेल इसकी पत्तियों को भिगो कर जल माथ खाने से बहुत रन्धनमें, गात्र मदनमें तथा दोपौ व्यवहूत होता है। उपकार होता है। दो ताजी पूर्ण -पुष्ट पत्तियां लगभग देशो साबुन भो तिलतलसे बनाया जाता है। यूरोपमें डेद पाव जसमें डाल कर कुछ समय तक छोड़ देनेसे वह यह केवल दोप और साबुन बनाने के काम आता है। जल पोने योग्य हो जाता है। यदि पत्तियां सूखी हो, तो बादाम के तेल पोर घोम तिलका तेल मिला रहता है। गरम जल देना उचित है । भारतवर्ष में तिलको पत्तिया भारत में जो यूरोपीय "पलिभ आयेल" भेजा जाता छोटो होतो है, अतः वे बहुत लगती है। डाकर एमर्म है, उनमें अधिकांश राज तिलका तेल हो रहता है। कहत है (मार्च १८७५) कि 'मैंने तिलको पत्तियोंको भिगो चीनमें बादाम, तिल, पोर कुसुमफलको एक साथ पीस कर उसका पानो जितने पामाशय रोगों में प्रयोग किया कर एक प्रकारका तेल बनाया जाता है, जिसे 'गोग है, मभो पारोग्य हो गये हैं। गर्भिणौके लिये तिल तेम्स' कहते । मभी प्रकार के फुलेल तिलके नेलसे हो अपथ्य है। इससे गर्भस्राव होने की सम्भावना है। बनते हैं। तोन गुण फल और सोन गुण तेलको एक तिलका पत्तियोंको अन्नमें भिगो कर यदि वह अल बाल में साथ मिला कर बोतल में भर रखें और बोतल के मुंहको लगाया जाय, तो बालको बोधि होती है। भुने हुए कागसे बन्द कर धूपमें कुछ काल तक छोड़ दें, तो एक तिलमे पन्त में शिथिलता आ जाती है। प्रकारका सुन्दर पुलिल तैयार हो जाता है। अथवा एक कलमें चीनी प्रस्तुत करते समय चौगोके मैल काटने के स्तर फलके अपर तिल और फिर हिगुण फूलके अपर तिल लिये तिल व्यवसहोता है। रख कर उसे फ लोसे ढके रहे, तो थोड़ी देर बाद आयुर्वेद के मतमे-तिल चार प्रकारका होता है, तिलम फलोको गन्ध पा जाता है। अब इस तिलसे जो कृष्ण, शक्ल, रतावर्ण और एक जो छोटा छोटा होता है, तेल निकलेगा, यह बहुत सुगन्धयुक्त होगा । व्यवमायो उसे जगलो तिन करते हैं। तिलके गुण-कटु, तिक्त लोग प्रतर, तिलका तेल मिलाकर प्रतरको दरमें मार कषाय-रम, गुरु, कटु, मधुर, विपाक, स्निग्ध, उषा- वीर्य, कफहन, पित्तनाशक, बलकारक, बालका, हित तिळतेलका भेषज गुण-सभी प्रकारके जलमोंमें यह सम्पादक, शीतलस्पर्श, चमके, हितकर, स्तन्यवईक, व्यवास होता है। खोट ऑयल वा पलिभ पॉयल पण हितकारक पौर दातोंका दृढ़तासम्पादक, रेषता जिस तरह व्यवत होता है, या भो उसी तरह व्यवास मूबकारक, मखयोधक, बाबुनायक पोर पनि तथा ओता। मेहरोग, तिलका तेल बहुत उपकारी है।