पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष नवम भाग.djvu/६०७

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१९५ खिर करनेको एक प्रथा वा रिवाज जिसे टोका कहते शिक्षक थे। बादमें वे थामा पोर पूनाके शिक्षाविभागके । ममें कन्यापक्षके लोग वरके ललाट पर दधि सहवारी डिपो-नन्सपेकर नियुक्त हुए थे। शिक्षकका पक्षत पादिका तिलक लगाते और उसके साथ कुछ कार्य करते समय गाधर रामचन्द्र प्रत्यन्त लोकप्रिय द्रश्य भो देते हैं। स्त्रियों का एक गहना जो माथे पर हो गये थे। उन्होंने व्याकरण तथा त्रिकोणमिति सम्बन्धी पहना जाता है, टोका। ७ लोम, पेटको तिलो। किसो कई पुस्तके भी लिखो घौं । बालगङ्गाधरने पपने पिताके अबको पर्थसूचक टोका वा व्याख्या। पास ही गणितकी शिक्षा प्राप्त को को पोर इस विषयमें (पु.) ११ लोधक्ष, लोधका पेड़। १ महवा . वे इसने सिखास्त हो गये थे कि सोलह वर्षको समय मरुवा। १२ रोगभेद, तिलकारक रोग। १४ पक्षभेद, पिताको भी छका दिया करते थे। एक जातिका घोड़ा, घोड़े का एक भेद । १३ पावत्यक्ष पिताको मृत्यु के चार मास बाद. १८७२ के पन्नमें विशेष, एक प्रकारका पम्वत्य, पोतलके पेड़का एक भेद। पाप मैट्रिक परोक्षामें उत्तीर्ण हुए पौर फिर पूनाके १४ पुष्पवृक्षविशेष, पुबागको जातिका एक पैड़। डवन-कालेजमें अध्ययन करने लगे। १८७५ में पाप काण्ड काट कर रोपनेसे यह पुनः जीवित होता है। बी० ए में पामर हो कर पाय हुए। १८७८ में बम्बर- वसन्त ऋतुमें पुष्याटिके लगनेसे इसमें पूर्व सुन्दरता विश्वविद्यालयको पाईन-परीक्षा उत्तीर्ण होकर पापने पा जातो है। इसके पुण्य छत्त के पाकारके होते एल. एल. बी, को उपाधि प्राल को। पाईन वाला' पढ़ते । शोभाकी वृद्धिके लिए इसका पेड बगीचों में समय परलोकगत मि. पागरकारसे पापको मित्रता से लगाया जाता है। इसको छाल और लकड़ी गई। इन दोनों मित्रों ने मिल कर मिण्य किया कि पौषधके काम पातो है। पर्याय-विशेषक, मुखमण्ड- "हमसे कोई भी सरकार को नौकरी नहीं करेगा। नक, पुण्ड, पुण्डक, स्थिरपुष्यो, विवाह, दग्धरूड, मत- एक राष्ट्रीय (ब-सरकारो) विद्यालय वा महाविद्याखा जीव, तरुणोकटाक्षकाम, वासन्तसुन्दर, दुग्धक, भाल (कालेज) खोल कर उसोको उबसिके लिए पात्मसमर्पण विभषणम. पवाग. रेचक नरक. श्रीमान. पुरुष.wa करेंगे। देशके होनहार युवकोको कम खर्च में यथायोग्य पुष्पक। (राजनि० भावप्र.) शिक्षा दे कर उन्हें मनुष्य बनानका प्रयत्न करेंगे।" . गुण-यह पाकमें कटु, वात, पित्त और कफनाशका; इसो समय मि. विष्णुखण चिपलोमकार सरकारी बल, पुष्टि पोर मेद कारक; ध और लघु होता है। शिक्षा विभागके कार्य को छोड़ कर खयं स्वाधीनभावसे इसको छाल-कषाय, उष्ण, पुसत्व, दन्तदोष, अमि, शिक्षा देने के लिए उत्सुक एए । पापको साधारण जनता- शोथ, व्रण और रजादोष-नाशक है। में विष्णु शास्त्रीके मामले प्रसिद्धि यो। पाप एक प्रति- १५ ध्रुवकविशेष, ध्र वकका एक भेद। इमर्क ठावान लेखक थे। उनके सहपको बात युवक तिसक प्रत्येक चरणमें पञ्चोस अक्षर होते हैं। ( संगीतदामोदर) और पागरकरके कानमें पड़ी। दोनीने जा कर विध १६ मृत्वाधार । शास्त्रीसे मुलकात को । सो समय परलोकगत एम.बी. (वि.) १७ श्रेष्ठ, शिरोमणि, किसी समुदायका मामजोशो भो इनमें मिल गये । रस शभ योग फससे श्रेह व्यक्ति। (माघ ३६३) तथा स्वर्गीय मि. नामजोधोके उत्साह पौर मध्यवसायसे तिलक-लोकमान्य बालगङ्गाधर तिलक महाराष्ट्र-देशीय भानुप्राणित हो तिलक और चिपलोमकारने १८८०ीका सर्वजन-मान्य सुप्रसिह देशमायक। साधारण जनता २री जनवरीको "पूना-न्यू-ग्विय खान"को प्रतिष्ठा रई' 'तिलक महाराज" कहा करती थी। . को। जम मासमें मि० जी० एस. पापटे एम. ए.ने १८६६१०में पवित्र चित्पावन ब्रावणकुलमें तिलक इनके शिक्षा दाम-रूप एभकार्य में योग दिया और उसो का जन्म हुपा था। पापके पिता स्वर्गीय गङ्गाधर रामः वर्ष भागरकारने भो एम० ए० पाथ कर, उसो कसमें चन्द्र तिसक पहले रखगिरि-विद्यालयके पन्चतम सहकारो पढ़ाना शुरू कर दिया। विचा-दानके साथ साथ पांचो